अरावली के 100 मीटर दायरे पर घमासान, अजमेर जनसुनवाई में समाजसेवी-खनन कारोबारी आमने-सामने
अरावली के 100 मीटर दायरे पर अजमेर में जनसुनवाई के दौरान समाजसेवी और खनन कारोबारी आमने-सामने आए, कमेटी की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठे।

तस्वीर में बाएं से चार पुरुष खड़े दिखाई दे रहे हैं। बीच में खड़ा व्यक्ति हाथ से इशारा कर रहा है, जबकि पीछे सरकारी प्रतीक वाला बोर्ड दिखाई दे रहा है।
राजसमंद-अजमेर। अरावली पर्वतमाला के 100 मीटर दायरे की परिभाषा को लेकर चल रहे विवाद और इससे जुड़े पर्यावरणीय मुद्दों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित हाई पावर कमेटी रविवार को राजस्थान के दौरे पर रही। कमेटी ने अजमेर और राजसमंद का दौरा किया, जिसके बाद टीम उदयपुर पहुंची। अजमेर में हुई जनसुनवाई के दौरान कमेटी की कार्यप्रणाली पर ही सवाल खड़े हो गए। जनसुनवाई के दौरान समाजसेवी, पर्यावरण कार्यकर्ता और खनन कारोबारी आमने-सामने आ गए। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगाए और विरोध प्रदर्शन भी किया।
कमेटी ने सुबह करीब 9 बजे से साढ़े 10 बजे तक अजमेर के जवाहर रंगमंच में जनसुनवाई की। इसमें जयपुर, दौसा, बूंदी, कोटा, अजमेर, ब्यावर सहित आसपास के जिलों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। लोगों ने अरावली की परिभाषा, पहाड़ों की कटाई, खनन और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े अपने पक्ष कमेटी के सामने रखने का प्रयास किया। सुनवाई के दौरान खनन कारोबारियों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं के बीच तीखी नोकझोंक हुई, जिससे सभागार का माहौल तनावपूर्ण हो गया।
जनसुनवाई में खनन कारोबारी भी मौजूद रहे। उन्होंने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि खनन पूरी तरह बंद करना उचित नहीं है। उनका तर्क था कि खनन से हजारों लोगों का रोजगार जुड़ा है और इससे राजस्थान के साथ देश के विकास को गति मिलती है। खनन कारोबारियों ने पर्यावरण कार्यकर्ताओं के आरोपों का विरोध करते हुए कहा कि उन्हें बेवजह निशाना बनाया जा रहा है।
दूसरी ओर, पर्यावरण प्रेमियों और अरावली संरक्षण से जुड़े लोगों ने खनन गतिविधियों के दूसरे पहलू को कमेटी के सामने रखा। उनका आरोप है कि अरावली क्षेत्र में अंधाधुंध खनन हो रहा है, पहाड़ों को काटा जा रहा है और कई जगह अवैध निर्माण व होटल गतिविधियां संचालित हो रही हैं। पर्यावरण प्रेमियों ने कहा कि अरावली केवल पहाड़ों की श्रृंखला नहीं, बल्कि राजस्थान के पर्यावरण और मानव जीवन की महत्वपूर्ण जीवनरेखा है। इसके लगातार विनाश के गंभीर परिणाम आने वाले समय में आमजन को भुगतने पड़ सकते हैं। इसी मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस हुई और जनसुनवाई के बाद बाहर भी विरोध प्रदर्शन देखने को मिला।
जनसुनवाई समाप्त होने के बाद पर्यावरण प्रेमियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कमेटी की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए। बाहर मौजूद लोगों ने आरोप लगाया कि कमेटी पर खनन कारोबारियों का प्रभाव इतना अधिक रहा कि उनकी बातों को ज्यादा तवज्जो दी गई, जबकि पर्यावरण प्रेमियों और आम लोगों की चिंताओं को अपेक्षित महत्व नहीं मिला।
पर्यावरण प्रेमियों का आरोप था कि जयपुर सहित कई जिलों से लोग अपनी बात रखने के लिए अजमेर पहुंचे थे, लेकिन उनकी बात पूरी तरह सामने नहीं आ सकी। उनका कहना था कि यदि कमेटी वास्तव में अरावली की जमीनी हकीकत जानना चाहती है तो केवल सभागार में बैठकर जनसुनवाई करने से काम नहीं चलेगा।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कहा कि अरावली की वास्तविक स्थिति कागजों और सभागारों में बैठकर समझना संभव नहीं है। कमेटी को उन इलाकों में खुद जाकर स्थिति देखनी चाहिए, जहां पहाड़ काटे जा रहे हैं, खनन हो रहा है और निर्माण गतिविधियां संचालित होने के आरोप हैं।
कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाया कि यदि प्रभावित लोगों की आवाज ही पूरी तरह कमेटी तक नहीं पहुंच पाएगी और मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति का निरीक्षण नहीं किया जाएगा, तो अरावली को लेकर तैयार होने वाली रिपोर्ट कितनी जमीनी होगी।
अजमेर की जनसुनवाई के बाद सामने आए आरोपों और दोनों पक्षों के बीच हुए विरोध प्रदर्शनों ने हाई पावर कमेटी की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब कमेटी के आगामी दौरों में पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय लोगों की आपत्तियों को कितनी गंभीरता से लिया जाता है और अरावली के संरक्षण तथा खनन से जुड़े हितों के बीच किस तरह संतुलन कायम किया जाता है, इस पर नजर रहेगी।

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