जयपुर, 10 नवम्बर। नेशनल किरेटोकोनस फाउंडेशन द्वारा हर वर्ष की तरह इस बार भी 10 नवम्बर को ‘विश्व किरेटोकोनस दिवस’ मनाया गया। इस वर्ष की थीम ‘कॉन्स फॉर ए कॉज़’ रखी गई, जिसका उद्देश्य विश्वभर में आंखों की दुर्लभ बीमारी किरिटोकोनस के प्रति जनजागरूकता फैलाना है। विशेषज्ञों ने चेताया है कि बार-बार आंखें मसलना इस बीमारी को जन्म दे सकता है, जो धीरे-धीरे व्यक्ति की दृष्टि को प्रभावित कर देती है।

किरिटोकोनस आंख की पारदर्शी पुतली यानी कॉर्निया में होने वाली एक विशेष प्रकार की विकृति है, जिसमें कॉर्निया का आकार गोल के बजाय शंक्वाकार (कॉनिकल शेप) हो जाता है। यह परिवर्तन धीरे-धीरे दृष्टि को धुंधला बना देता है। आमतौर पर यह बीमारी 14 से 22 वर्ष की आयु के युवाओं में पाई जाती है और हर 3000 व्यक्तियों में से लगभग एक व्यक्ति इससे प्रभावित होता है। हालांकि इस रोग का कोई निश्चित कारण ज्ञात नहीं है, लेकिन नेत्र एलर्जी से पीड़ित या बार-बार आंखें मसलने वाले लोगों में इसके होने की संभावना अधिक रहती है। इसके अलावा डाउन सिंड्रोम से पीड़ित व्यक्ति या वंशानुगत प्रवृत्ति वाले लोगों में भी यह रोग पाया जा सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, किरेटोकोनस लगभग 90 प्रतिशत रोगियों की दोनों आंखों को प्रभावित करता है और यह पुरुषों एवं महिलाओं दोनों में समान रूप से पाया जाता है। इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति में चश्मे का नंबर लगातार बढ़ता रहता है और कई बार चश्मा लगाने के बाद भी स्पष्ट दृष्टि नहीं मिल पाती। प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाती है और आंखों पर अधिक दबाव डालने से तिरछी या दोहरी छवि दिखाई देने लगती है।

किरिटोकोनस के निदान के लिए कॉर्नियल टोपोग्राफी नामक विशेष जांच की जाती है, जिससे बीमारी के बढ़ने या नियंत्रण में रहने की स्थिति का पता लगाया जा सकता है। चिकित्सकों का कहना है कि इस रोग में पूरी तरह से दृष्टि लौटाना संभव नहीं है, लेकिन आर.जी.पी. कॉन्टेक्ट लेंस, कॉर्नियल कोलाजेन क्रॉस लिंकिंग (C3R), इन्ट्रास्ट्रोमल कॉर्नियल रिंग सेगमेंट (केरा रिंग), इम्प्लांटेबल कॉन्टेक्ट लेंस (ICL) या टोरिक इन्ट्राऑकुलर लेंस प्रत्यारोपण जैसी नवीनतम तकनीकों से उपचार संभव है। हालांकि किरेटोकोनस रोगियों के लिए लेसिक लेजर सर्जरी अनुशंसित नहीं है, क्योंकि इससे स्थिति और बिगड़ सकती है।

रोग की उन्नत अवस्था में फुल थिकनेस केरेटोप्लास्टी यानी कॉर्निया प्रत्यारोपण ही एकमात्र विकल्प रहता है। विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की है कि आंखों को बार-बार न मसलें और यदि चश्मे का नंबर तेजी से बढ़ रहा हो या दृष्टि धुंधली महसूस हो, तो तुरंत नेत्र चिकित्सक से परामर्श लें। समय पर कॉर्नियल टोपोग्राफी जांच कराने से रोग की प्रारंभिक अवस्था में ही पहचान संभव है और आगे होने वाले नुकसान को रोका जा सकता है।

विश्व किरेटोकोनस दिवस के अवसर पर चिकित्सा समुदाय ने एक स्वर में संदेश दिया — “आंखों को रगड़ना बंद करें और दृष्टि बचाएं”। जागरूकता और समय पर जांच से न केवल इस बीमारी के बढ़ने को रोका जा सकता है, बल्कि दृष्टि की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सकती है।a

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