क्यों बीच बारात मां का दूध पीने लगे IPS बिश्नोई? आखिर क्या है राजस्थान की 'दूध पिलाई' रस्म?
उत्तर प्रदेश कैडर के आईपीएस कृष्ण कुमार बिश्नोई की शादी से पहले 'दूध पिलाई' की पारंपरिक रस्म के वीडियो ने इंटरनेट पर नई बहस छेड़ दी है। राजस्थान के बिश्नोई समाज की इस भावनात्मक और प्रतीकात्मक परंपरा को लेकर समाज दो गुटों में बंट गया है। जानिए क्या है इस रस्म का असल महत्व और क्यों एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का यह वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा और विवाद का विषय बना हुआ है।

भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के दो अधिकारियों का विवाह इन दिनों अपनी भव्यता के बजाय एक प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा के कारण चर्चा के केंद्र में बना हुआ है। राजस्थान के बाड़मेर में आयोजित होने वाले विवाह समारोह से पूर्व, उत्तर प्रदेश कैडर के आईपीएस अधिकारी कृष्ण कुमार बिश्नोई का अपनी माता के साथ 'दूध पिलाई' की रस्म निभाते हुए एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। इस वीडियो ने न केवल बिश्नोई समाज की परंपराओं को सुर्खियों में ला दिया है, बल्कि आधुनिकता और रूढ़िवादिता के बीच एक नई बहस को भी जन्म दे दिया है।
बारात प्रस्थान से ठीक पहले निभाई जाने वाली यह रस्म राजस्थान के बिश्नोई और कुछ अन्य समुदायों में गहरे भावनात्मक महत्व रखती है। वायरल दृश्य में देखा जा सकता है कि आईपीएस बिश्नोई की माता उन्हें अपने पल्लू से ढंककर प्रतीकात्मक रूप से दुग्धपान करा रही हैं। यह कोई वास्तविक क्रिया नहीं, बल्कि पूर्णतः एक प्रतीकात्मक अभिनय है, जो पुत्र के प्रति माता के असीम त्याग, उसके द्वारा सींचे गए संस्कारों और उस ऋण की याद दिलाता है जिसे बेटा वैवाहिक जीवन की नई जिम्मेदारियों के बीच कभी न भूले। यह रस्म इस बात का उद्घोष है कि एक व्यक्ति चाहे समाज में कितने ही ऊंचे पद पर क्यों न आसीन हो जाए, अपनी जननी के लिए वह सदैव वही अबोध बालक रहता है।
आईपीएस कृष्ण कुमार बिश्नोई और उनकी होने वाली जीवनसंगिनी, आईपीएस अंशिका वर्मा, दोनों ही प्रतिष्ठित पदों पर कार्यरत हैं, जिसके कारण इस निजी अनुष्ठान को सार्वजनिक पटल पर तीखी प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ा। जहां एक ओर समाज का एक बड़ा वर्ग इसे भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़ाव और मातृ-शक्ति के प्रति सम्मान का उत्कृष्ट उदाहरण मान रहा है, वहीं दूसरी ओर आलोचकों ने इसे सार्वजनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के लिए 'असंगत' और 'पुरानी सोच' का प्रतीक बताया है। समर्थकों का तर्क है कि अपनी जड़ों और रीति-रिवाजों का पालन करना किसी भी व्यक्ति का व्यक्तिगत अधिकार है, जिसे प्रशासनिक ओहदे के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।
यह विवाद सांस्कृतिक अस्मिता और आधुनिक जीवनशैली के अंतर्विरोधों को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है। एक तरफ यह रस्म बेटे के बचपन से पुरुषत्व की ओर संक्रमण और वैवाहिक जीवन की दहलीज पर खड़े युवक को माता के आशीर्वाद से सुसज्जित करने का माध्यम है, तो दूसरी तरफ यह पितृसत्तात्मक ढांचे में रस्मों की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े करती है। बहरहाल, राजस्थान की रेतीली धरती से उठा यह भावनात्मक सैलाब इंटरनेट पर वैचारिक मतभेदों की लहरें पैदा कर रहा है। यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या आधुनिकता के इस दौर में परंपराएं केवल निजी कमरों तक सीमित रहनी चाहिए या उन्हें सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना साहस का परिचायक है।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
