टोंक: सावित्रीबाई फुले जयंती पर प्रतिभाओं का संगम, संघर्ष की गाथाओं से मिली भावी पीढ़ी को प्रेरणा
टोंक में सावित्रीबाई फुले की 195वीं जयंती पर माली सैनी समाज द्वारा भव्य महोत्सव का आयोजन किया गया। महात्मा ज्योतिबा फुले छात्रावास में आयोजित इस कार्यक्रम में 50 से अधिक शैक्षणिक व प्रशासनिक प्रतिभाओं का सम्मान हुआ। समाजसेवी कमलेश सिंगोदिया और अन्य वक्ताओं ने सावित्रीबाई के कड़े संघर्ष और नारी शिक्षा के लिए झेले गए अपमान की गाथा को याद कर समाज को प्रेरित किया।

टोंक। शिक्षा की अलख जगाने वाली देश की प्रथम महिला शिक्षिका और महान समाज सुधारिका माता सावित्रीबाई फुले की 195वीं जयंती के अवसर पर टोंक जिला मुख्यालय स्थित महात्मा ज्योतिबा फुले छात्रावास में एक भव्य और गरिमामय समारोह का आयोजन किया गया। सदर माली (सैनी) समाज द्वारा आयोजित इस 'जयंती महोत्सव' में न केवल श्रद्धा के सुमन अर्पित किए गए, बल्कि समाज की उन 50 प्रतिभाओं का सम्मान भी किया गया जिन्होंने शैक्षणिक और प्रशासनिक क्षेत्रों में नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। यह आयोजन उस संघर्ष की याद दिलाने वाला रहा, जिसने भारतीय नारी की नियति बदल दी।
समारोह के मुख्य अतिथि, जाने-माने समाजसेवी एवं भामाशाह कमलेश सिंगोदिया ने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए सावित्रीबाई फुले के जीवन के उन अनछुए पहलुओं को उजागर किया, जो आज भी रोंगटे खड़े कर देते हैं। उन्होंने कहा कि सावित्रीबाई मात्र एक शिक्षिका नहीं थीं, बल्कि वे भारत में नारी मुक्ति आंदोलन की पहली प्रणेता थीं। जिस दौर में लड़कियों का स्कूल जाना पाप समझा जाता था, उस दौर में उन्होंने समाज के 'ठेकेदारों' के कड़े विरोध, पत्थरों की मार और अपमान को सहते हुए भी शिक्षा का मार्ग नहीं छोड़ा।
इसी क्रम में समाज के संरक्षक बालमुकुंद सैनी ने उन कुरीतियों पर प्रहार किया जिनसे सावित्रीबाई फुले ने लोहा लिया था। उन्होंने बताया कि आजादी से पूर्व व्याप्त छुआ-छूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह जैसी विसंगतियों के खिलाफ खड़ा होना किसी युद्ध से कम नहीं था। जब वे दलित महिलाओं के उत्थान के लिए निकलती थीं, तो उन पर गंदगी फेंकी जाती थी, लेकिन उनका साहस इतना अडिग था कि वे अपने थैले में एक अतिरिक्त साड़ी लेकर चलती थीं ताकि स्कूल पहुंचकर गंदी साड़ी बदल सकें और पुनः शिक्षण कार्य में जुट सकें।
इस प्रेरणादायी वातावरण में समाज के नवनियुक्त अधिकारियों, कर्मठ कर्मचारियों और शैक्षणिक क्षेत्र में अव्वल रहने वाली 50 प्रतिभाओं को अतिथियों द्वारा माला पहनाकर और स्मृति चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया गया। यह सम्मान न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि थी, बल्कि फुले के आदर्शों पर चलने का एक संकल्प भी था।
कार्यक्रम के दौरान सदर अध्यक्ष रमेश बागड़ी, पूर्व जिलाध्यक्ष रमेश गढ़वाल, सरपंच शंकर कच्छावा, राजेंद्र उर्फ बबलू टैंकर, पूरणमल सैनी, पार्षद राहुल सैनी, मुकेश सैनी, डॉ. सुरेश सैनी, डॉ. राम अवतार सैनी और कालूराम बागड़ी ने भी मंचासीन अतिथि के रूप में अपने विचार साझा किए। वक्ताओं ने एक स्वर में समाज के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा को एकमात्र हथियार बताया। यह महोत्सव मात्र एक जयंती आयोजन नहीं, बल्कि समाज की एकता और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक नई राह दिखाने वाला मील का पत्थर साबित हुआ, जिसने सावित्रीबाई फुले के संघर्षपूर्ण जीवन की प्रासंगिकता को आधुनिक संदर्भों में पुनः जीवित कर दिया।

