तनोटराय से जयपुर तक उठी ‘ओरण बचाओ’ की आवाज: पवित्र चरागाह भूमि के संरक्षण के लिए हजारों लोगों की पदयात्रा
जैसलमेर से शुरू हुई यात्रा पाली के जैतारण तक पहुंची; ग्रामीणों ने ओरण और गोचर भूमि को कानूनी संरक्षण देने तथा औद्योगिक आवंटन रोकने की मांग उठाई।

राजस्थान की मरुधरा में इन दिनों पर्यावरण, आस्था और पारंपरिक ग्रामीण व्यवस्था से जुड़ा एक बड़ा जनआंदोलन आकार लेता दिखाई दे रहा है। जैसलमेर के तनोटराय से शुरू हुई “ओरण बचाओ पदयात्रा” अब हजारों ग्रामीणों, पशुपालकों, संत-महात्माओं और पर्यावरण प्रेमियों की सामूहिक आवाज बनकर जयपुर की ओर बढ़ रही है। सदियों पुरानी ओरण और गोचर भूमि की परंपरा को बचाने की मांग के साथ यह यात्रा गांव-गांव से गुजरते हुए लोगों को जागरूक कर रही है और राज्य सरकार तक अपनी बात पहुंचाने का प्रयास कर रही है।
यह पदयात्रा जैसलमेर से शुरू होकर जोधपुर और बिलाड़ा होते हुए अब पाली जिले के जैतारण कस्बे तक पहुंच चुकी है। रास्ते में पड़ने वाले गांवों और कस्बों में स्थानीय लोगों ने यात्रा का स्वागत करते हुए आंदोलन को समर्थन दिया है। पदयात्रा के दौरान सभाएं और जनसंवाद आयोजित किए जा रहे हैं, जिनमें ओरण और गोचर भूमि के महत्व को लेकर ग्रामीण समाज को जागरूक किया जा रहा है।
इस आंदोलन का नेतृत्व सामाजिक कार्यकर्ता सुमेर सिंह सावंता कर रहे हैं, जो लंबे समय से राजस्थान में ओरण और गोचर भूमि के संरक्षण की मांग उठाते रहे हैं। उनके नेतृत्व में निकली यह पदयात्रा अब धीरे-धीरे एक बड़े जनजागरण अभियान का रूप लेती जा रही है।
राजस्थान के ग्रामीण समाज में ओरण की परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है। ओरण ऐसी पवित्र सामुदायिक भूमि होती है जिसे गांव के लोग देवस्थल के रूप में मानते हैं और सामूहिक रूप से संरक्षित रखते हैं। इन स्थानों पर निजी खेती, निर्माण या किसी प्रकार का व्यावसायिक उपयोग नहीं किया जाता। कई ओरण क्षेत्रों में मंदिर, धाम, तालाब, बेरियां और प्राकृतिक वनस्पतियां मौजूद होती हैं, जो न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र होती हैं बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा भी होती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, राजस्थान जैसे शुष्क और मरुस्थलीय प्रदेश में ओरण और गोचर भूमि ग्रामीण जीवन के लिए जीवनरेखा का काम करती हैं। यह क्षेत्र पशुओं के लिए प्राकृतिक चरागाह उपलब्ध कराते हैं, जल संरक्षण में सहायक होते हैं और जैव विविधता को बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि सदियों से गांवों के लोग मिलकर इन भूमि क्षेत्रों की रक्षा करते आए हैं।
हालांकि, पदयात्रा में शामिल लोगों का आरोप है कि पिछले कुछ वर्षों में राज्य के विभिन्न हिस्सों में ओरण और गोचर भूमि को बड़े पैमाने पर औद्योगिक और सोलर परियोजनाओं के लिए आवंटित किया जा रहा है। आंदोलनकारियों का दावा है कि कई स्थानों पर हजारों बीघा जमीन एक साथ निजी कंपनियों को दी जा रही है। उनके अनुसार कहीं एक लाख बीघा, कहीं पचास हजार बीघा और कहीं तीस हजार बीघा तक भूमि बड़े सोलर प्रोजेक्ट्स के लिए आवंटित किए जाने की शिकायतें सामने आई हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि कई मामलों में इन जमीनों के आवंटन के दौरान स्थानीय गांवों की राय को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता, जिससे पारंपरिक चरागाह भूमि प्रभावित हो रही है। आंदोलनकारियों के मुताबिक, यदि यह स्थिति जारी रहती है तो ग्रामीण क्षेत्रों की सामाजिक और आर्थिक संरचना पर गहरा असर पड़ सकता है।
पशुपालकों का कहना है कि बड़े पैमाने पर जमीन कंपनियों को दिए जाने से गांवों के आसपास की चराई भूमि तेजी से कम हो रही है। इससे पशुओं के लिए चारा और चरागाह का संकट खड़ा हो गया है। कई क्षेत्रों में लोगों का यह भी कहना है कि पारंपरिक भूमि के खत्म होने से ग्रामीणों के सामने अपने गांव छोड़ने की स्थिति तक बन सकती है।
पदयात्रा में शामिल लोग राजस्थान सरकार से मांग कर रहे हैं कि राज्य की सभी ओरण और गोचर भूमि को राजस्व रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से दर्ज कर उन्हें कानूनी संरक्षण दिया जाए, ताकि भविष्य में इन जमीनों का किसी भी प्रकार से गलत उपयोग न हो सके। इसके साथ ही आंदोलनकारियों की यह भी मांग है कि ओरण और गोचर भूमि को औद्योगिक या सोलर परियोजनाओं के लिए आवंटित करने पर रोक लगाई जाए तथा पहले से हुए आवंटनों की निष्पक्ष जांच करवाई जाए।
तनोटराय से शुरू हुई यह पदयात्रा अब जैतारण तक पहुंच चुकी है और आगे जयपुर की ओर बढ़ रही है। यात्रा के साथ जुड़ते लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, जिससे यह आंदोलन धीरे-धीरे एक व्यापक जनजागरण अभियान का रूप लेता जा रहा है।
ग्रामीण समाज को उम्मीद है कि उनकी यह शांतिपूर्ण पदयात्रा केवल विरोध का माध्यम नहीं बनेगी, बल्कि ओरण और गोचर जैसी पारंपरिक धरोहरों के संरक्षण को लेकर सरकार और समाज दोनों को गंभीरता से सोचने के लिए प्रेरित करेगी। आने वाले दिनों में जब यह पदयात्रा जयपुर पहुंचेगी, तब आंदोलनकारी राज्य सरकार के सामने अपनी मांगों को मजबूती से रखने का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहे हैं।

Jagdish Mali, Raipur
नाम: जगदीश माली
वर्तमान पद: संवाददाता (रायपुर मारवाड़)
कार्यक्षेत्र: जिला पाली और जिला ब्यावर (विशेष रूप से रायपुर तहसील, जैतारण तहसील एवं इनके अंतर्गत आने वाले क्षेत्र)
बीट: स्थानीय समाचार, राजनीति, क्राइम, प्रशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, और बिज़नेस
परिचय
जगदीश माली राजस्थान के पाली और ब्यावर जिलों के क्षेत्रीय संवाददाता हैं। वह मुख्य रूप से रायपुर मारवाड़, रायपुर तहसील और जैतारण तहसील सहित इसके अंतर्गत आने वाले सभी ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों की खबरों को कवर करते हैं। जगदीश माली स्थानीय प्रशासन, पुलिस थाना, अस्पताल, राजनीति, शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यापार से जुड़ी सभी प्रकार की महत्वपूर्ण खबरों की ग्राउंड रिपोर्टिंग करते हैं।
पत्रकारिता का अनुभव
जगदीश माली को क्षेत्रीय धरातल पर समाचार संकलन और मीडिया रिपोर्टिंग का 5 साल का अनुभव है। इस दौरान उन्होंने स्थानीय जनसमस्याओं, प्रशासनिक बैठकों और विकास कार्यों को निरंतर रिपोर्ट किया है।
शैक्षणिक योग्यता (Education)
उन्होंने अपनी माध्यमिक शिक्षा (12वीं पास) पूरी की है।
