जैसलमेर: आदिवासी समाज ने पृथक धर्म कोड की मांग को लेकर सौंपा ज्ञापन
आदिवासी कांग्रेस कमेटी ने कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन कर राज्यपाल के नाम एसडीएम को ज्ञापन दिया, जनगणना में अलग पहचान और संवैधानिक अधिकारों की मांग उठाई।

जैसलमेर। स्वर्ण नगरी जैसलमेर की धरती आज आदिवासी समाज के बुलंद नारों और अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाने के संकल्प से गुंजायमान हो उठी। सीमावर्ती जिले में आदिवासी कांग्रेस कमेटी के तत्वाधान में समाज के सैकड़ों लोगों ने अपनी दशकों पुरानी मांग—पृथक धर्म कोड—को लेकर हुंकार भरी। जिला अध्यक्ष चेलू राम भील के नेतृत्व में आयोजित इस विरोध प्रदर्शन ने न केवल प्रशासन का ध्यान खींचा, बल्कि आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई को एक नई धार दे दी है। कलेक्ट्रेट परिसर में एकत्रित हुए प्रदर्शनकारियों ने अपनी एकजुटता का परिचय देते हुए उपखंड अधिकारी (एसडीएम) को राज्यपाल के नाम एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा।
इस आंदोलन का मुख्य केंद्र बिंदु आदिवासी समुदाय की वह विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान है, जिसे वे आधुनिक जनगणना की जटिलताओं में खोते हुए देख रहे हैं। ज्ञापन के माध्यम से समाज के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि आदिवासी समुदाय भारत का आदि-निवासी है, जिसकी परंपराएं, पूजा पद्धति और जीवन दर्शन प्रकृति से ओत-प्रोत और अनूठा है। वक्ताओं ने जोर देकर कहा कि एक अलग धर्म कोड का न होना केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं है, बल्कि यह उनकी मौलिक पहचान पर एक संकट है। वर्तमान जनगणना प्रणालियों में आदिवासियों को अन्य श्रेणियों में शामिल करना उनकी ऐतिहासिक विरासत के साथ अन्याय है।
ज्ञापन में इस मांग के पीछे ठोस ऐतिहासिक और कानूनी तर्कों को भी प्रस्तुत किया गया। समाज ने याद दिलाया कि वर्ष 1950 में भारतीय संविधान के लागू होने से पूर्व, आदिवासियों की धार्मिक स्वायत्तता को ब्रिटिश कालीन कानूनों में भी मान्यता प्राप्त थी। शेड्यूल जिला एक्ट 1874, भारत सरकार अधिनियम 1919 और 1935 जैसे महत्वपूर्ण वैधानिक प्रावधानों के तहत आदिवासी समाज को एक पृथक धर्म कोड प्रदान किया गया था। दुर्भाग्यवश, 1950 के बाद जनगणना की प्रक्रियाओं में इस विशेष दर्जे को समाप्त कर दिया गया, जिससे समाज अपनी साख और अधिकारों के लिए हाशिए पर आ गया।
प्रदर्शन को संबोधित करते हुए चेलू राम भील ने बेहद संजीदगी के साथ अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि यह प्रदर्शन केवल एक औपचारिक ज्ञापन सौंपना नहीं है, बल्कि उस लंबी लड़ाई का हिस्सा है जिसे आदिवासी समाज अपनी अगली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए लड़ रहा है। उन्होंने सरकार से अपील की कि वे इस विषय की संवेदनशीलता को समझें और आदिवासियों की भावनाओं का सम्मान करते हुए जल्द से जल्द सकारात्मक निर्णय लें। जैसलमेर की सड़कों पर दिखा यह जनसैलाब इस बात का गवाह है कि अब आदिवासी समाज अपने संवैधानिक अधिकारों और सांस्कृतिक अस्तित्व की रक्षा के लिए किसी भी हद तक संघर्ष करने को तत्पर है।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
