जैसलमेर: रामगढ़ में महात्मा ज्योतिबा फुले की 200वीं जयंती पर भव्य आयोजन
अंबेडकर पार्क में सामाजिक कार्यकर्ताओं ने महात्मा फुले को दी श्रद्धांजलि, शिक्षा और समानता के संकल्प के साथ मनाया गया क्रांतिसूर्य का जन्मोत्सव।

सीमांत क्षेत्र रामगढ़ स्थित अम्बेडकर पार्क में महान समाज सुधारक, सामाजिक क्रांति के अग्रदूत एवं समानता के प्रणेता महात्मा ज्योतिराव फुले की 200वीं जयंती अपार श्रद्धा, उत्साह और गरिमापूर्ण वातावरण में मनाई गई। कार्यक्रम का औपचारिक शुभारंभ क्षेत्र के गणमान्य नागरिकों, समर्पित सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं प्रबुद्ध बुद्धिजीवियों द्वारा महात्मा फुले के तैल चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर भावभीनी श्रद्धांजलि देने के साथ हुआ, जिसके पश्चात वक्ताओं ने उनके जीवन संघर्ष और सामाजिक परिवर्तन में दिए गए अतुलनीय ऐतिहासिक योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला।
इस गरिमामयी अवसर पर तगाराम चौहान, सुरेश कुमार गाड़ी तथा बाबूराम चौहान ने अपने ओजस्वी विचार व्यक्त करते हुए कहा कि महात्मा ज्योतिबा फुले ने सामाजिक समानता, शिक्षा के व्यापक प्रसार और महिला अधिकारों की रक्षा के लिए वे ऐतिहासिक कार्य किए जो युगों तक याद रखे जाएंगे। उन्होंने तत्कालीन समाज में व्याप्त कट्टर जातिवाद, छुआछूत, अंधविश्वास और अमानवीय भेदभाव के विरुद्ध निर्भीक होकर आवाज उठाई तथा शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे सशक्त और अनिवार्य माध्यम घोषित किया। वक्ताओं ने रेखांकित किया कि फुले ने समाज के दलितों, वंचितों और महिलाओं के लिए बंद शिक्षा के द्वार खोलकर उस सामाजिक क्रांति की नींव रखी, जिसका सकारात्मक प्रभाव आज भी आधुनिक समाज में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।
परिवर्तन की इस धारा पर चर्चा करते हुए वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान चुनौतीपूर्ण समय में महात्मा फुले के विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो चुके हैं। समाज में वास्तविक समानता, अटूट भाईचारे और शिक्षा के सतत प्रसार के लिए उनके आदर्शों को आत्मसात करना आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उपस्थित युवाओं से विशेष आह्वान करते हुए उन्होंने प्रेरित किया कि वे शिक्षा को अपना अमोघ हथियार बनाकर सामाजिक कुरीतियों को समूल समाप्त करने का संकल्प लें और राष्ट्र में सकारात्मक परिवर्तन के वास्तविक वाहक बनें।
महात्मा ज्योतिराव फुले को भारतीय समाज में समानता, शिक्षा और सामाजिक न्याय की अभेद्य नींव रखने वाले 'क्रांतिसूर्य' के रूप में स्मरण किया जाता है। उन्होंने अक्षरों को शस्त्र बनाकर सदियों से व्याप्त अज्ञानता, जातिगत ऊंच-नीच और लैंगिक असमानता के घोर अंधकार को खुली चुनौती दी। असमानता के मूल कारण के रूप में शिक्षा के अभाव को पहचानते हुए उन्होंने वर्ष 1848 में बालिकाओं के लिए प्रथम विद्यालय की स्थापना की थी। उस दौर में जब महिला शिक्षा का प्रखर विरोध हो रहा था, तब फुले दंपति ने समाज की रूढ़िवादी सोच को पराजित किया और सावित्रीबाई फुले ने स्वयं शिक्षिका बनकर इस आंदोलन को वह गति प्रदान की, जो भारतीय समाज में स्त्री शिक्षा की क्रांतिकारी शुरुआत सिद्ध हुई।
महात्मा फुले ने शूद्र, अतिशूद्र और वंचित वर्गों के मौलिक अधिकारों के लिए निरंतर संघर्ष किया और 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना कर जाति आधारित भेदभाव की जड़ों पर प्रहार किया। उनके वैचारिक दर्शन में सामाजिक समानता, मानवीय गरिमा और न्याय सदैव सर्वोपरि रहे। उनका स्पष्ट मत था कि किसी भी समाज का वास्तविक और सर्वांगीण विकास तभी संभव है जब उसके सभी वर्गों को बिना किसी भेदभाव के समान अवसर प्राप्त हों। महिला सशक्तिकरण के प्रबल पैरोकार रहे फुले ने विधवाओं के लिए सुरक्षित आश्रय गृह स्थापित किए और अनाथ बच्चों के समुचित पालन-पोषण की व्यवस्था भी सुनिश्चित की। उन्होंने दृढ़तापूर्वक प्रतिपादित किया था कि महिला सम्मान और शिक्षा के बिना किसी भी समाज का विकास सदैव अधूरा ही रहेगा।
समारोह के अंत में उपस्थित जनसमूह ने महात्मा ज्योतिबा फुले द्वारा दिखाए गए सत्य के मार्ग पर चलने, शिक्षा के निरंतर प्रसार, सामाजिक समानता और सामाजिक न्याय की स्थापना हेतु पूर्ण निष्ठा से कार्य करने का सामूहिक संकल्प लिया। वक्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि एक जाति-भेद मुक्त समाज, महिला सम्मान और समावेशी विकास की दिशा में फुले के कालजयी विचार आज भी मानवता के लिए मार्गदर्शक बने हुए हैं। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रहित एवं समाजहित में समर्पित होकर कार्य करने की शपथ के साथ हुआ, जिसमें क्षेत्र के अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और स्थानीय नागरिकों ने अपनी सक्रिय सहभागिता निभाई।

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