धौलपुर: श्रीमद्भागवत कथा में संत लोकेशानंद ने बताए धर्म के चार स्तंभ
धौलपुर के अधन्नपुर में आयोजित भागवत कथा के तीसरे दिन संत लोकेशानंद ने कुंती के त्याग, हयग्रीव अवतार और मोक्ष के रहस्यों पर विस्तार से चर्चा की।

धौलपुर के अधन्नपुर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान मंच पर विराजमान कथावाचक पूज्य संत बाल ब्रह्मचारी अवधूत श्री लोकेशानंद जी महाराज।
धौलपुर। ग्राम अधन्नपुर में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ के तीसरे दिन का वातावरण माता कुंती के त्याग, सृष्टि की उत्पत्ति और भगवान हयग्रीव के दिव्य अवतार प्रसंगों से भावविभोर हो उठा। व्यासपीठ पर विराजमान शुकदेव जी के रूप में कथावाचक पूज्य संत बाल ब्रह्मचारी अवधूत श्री लोकेशानंद जी महाराज, गुफाधाम जारौली टीला वालों ने मानव जीवन के चार महत्वपूर्ण स्तंभों—मोक्ष, राज धर्म, स्त्री धर्म और दान धर्म—पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए श्रद्धालुओं को धर्म के गूढ़ रहस्यों से अवगत कराया।
कथा के मुख्य प्रसंग में महाराज श्री ने महाभारत युद्ध के पश्चात माता कुंती द्वारा भगवान श्रीकृष्ण से मांगे गए उस अनोखे वरदान का वर्णन किया, जिसमें उन्होंने राजसुख के स्थान पर सदा विपत्ति में रहने की कामना की थी। महाराज श्री ने इसका रहस्य स्पष्ट करते हुए कहा कि वैभव और सुख में मनुष्य अक्सर अहंकार के वश में होकर परमात्मा को विस्मृत कर देता है, जबकि विपत्ति के समय उसका पल-पल ईश्वर का स्मरण बना रहता है। उन्होंने कहा कि यदि दुख के माध्यम से साक्षात हरि की स्मृति बनी रहे, तो वह दुख करोड़ों सुखों से कहीं अधिक मूल्यवान है।
सृष्टि की उत्पत्ति और ब्रह्मांड की रचना की वैज्ञानिक व आध्यात्मिक प्रक्रिया पर चर्चा करते हुए कथाव्यास ने जोर देकर कहा कि सनातन संस्कृति का सृष्टि रचना सिद्धांत पूर्णतः वैज्ञानिक है। इसी क्रम में उन्होंने भगवान के हयग्रीव अवतार की दिव्य गाथा सुनाई। जब हयग्रीव नामक असुर ने ब्रह्मा जी से वेदों को चुराकर समुद्र की गहराइयों में छिपा दिया, तब संसार अज्ञान के अंधकार में डूब गया था। तब भगवान विष्णु ने हयग्रीव रूप धारण कर उस असुर का संहार किया और वेदों की पुनः स्थापना की। यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि ज्ञान ही जगत की वास्तविक पूंजी है, जिसकी रक्षा स्वयं ईश्वर करते हैं।
ज्ञान यज्ञ के दौरान मोक्ष की परिभाषा को स्पष्ट करते हुए महाराज श्री ने कहा कि केवल मृत्यु के उपरांत स्वर्ग जाना ही मोक्ष नहीं है, अपितु जीवित रहते हुए मोह-माया और 'मैं व मेरा' के अहंकार से मुक्ति ही सच्चा मोक्ष है। भीष्म पितामह और युधिष्ठिर के संवाद के माध्यम से राजधर्म पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि शासक या समाज के मुखिया का प्राथमिक धर्म प्रजा को भयमुक्त वातावरण प्रदान करना है। वहीं, माता देवहूति और सती अनसूया के आदर्शों के माध्यम से स्त्री धर्म की महिमा का बखान करते हुए उन्होंने कहा कि नारी परिवार की धुरी और शक्ति है, जो अपनी संस्कारों से घर को वैकुंठ बना सकती है। राजा बलि और राजा रंतिदेव के प्रसंगों के माध्यम से दान की महत्ता को भी रेखांकित किया गया।
इस आध्यात्मिक आयोजन में परीक्षित सोबरन सिंह अरेला और भगवंत प्रसाद अरेला सहित भारी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। कथा के पश्चात सभी ने भागवत जी की महाआरती की और प्रसाद ग्रहण किया। पूरा पंडाल भगवान के जयकारों से गुंजायमान रहा, जो इस ज्ञान यज्ञ के भक्तिमय प्रभाव को प्रदर्शित कर रहा था।

Uttam Dixit, Dholpur
नाम: उत्तम दीक्षित
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