कोटा। “विचार तभी सार्थक हैं, जब वे भावना के साथ आत्मकल्याण की दिशा में प्रवाहित हों।” — यह प्रेरक संदेश परम पूज्य आचार्य 108 श्री प्रज्ञासागर जी मुनिराज ने शुक्रवार को नसियां दादाबाड़ी जैन मंदिर में आयोजित प्रवचन सभा में दिया। उन्होंने कहा कि सच्चा चिंतन वही है जो मनुष्य के भीतर मोक्ष की चिंता और आत्मशुद्धि का संकल्प जागृत करे।

गुरूदेव ने भरत चक्रवर्ती के जीवन उदाहरण का उल्लेख करते हुए कहा कि जैसे उन्होंने भोजन करते समय आत्ममंथन किया — “मैं कब मुनियों की तरह आहार करूंगा?” — वैसे ही प्रत्येक व्यक्ति को यह विचार अवश्य करना चाहिए कि “मैं कब आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर होऊँगा?” उन्होंने कहा कि इस जन्म में दीक्षा न भी मिले, परंतु दीक्षा की भावना प्रतिदिन मन में जाग्रत रहनी चाहिए। जब विचार और भावना एक दिशा में प्रवाहित होते हैं, तभी आध्यात्मिक उन्नति संभव है।

प्रवचन के पश्चात् प्रज्ञा अनुपम चातुर्मास के अंतर्गत प्रथम मुख्य मंगल कलश की स्थापना विधिवत रूप से सम्पन्न हुई। यह कलश मोहनलाल, कैलाश एवं यतीश खेडावाला परिवार (दादाबाड़ी, कोटा) द्वारा श्रद्धा एवं मंत्रोच्चारण के साथ स्थापित किया गया। पंचपरमेष्ठि मंत्र, नवकार मंत्र और विशेष मंगलाचरण के मध्य 48 दीपों और 48 अर्घ्यों का अर्पण किया गया।

गुरू आस्था परिवार के चेयरमैन यतीश जैन खेडावाला ने बताया कि कलश स्थापना की यह विधि पूर्ण श्रद्धा, पवित्रता और मंत्रशक्ति के वातावरण में सम्पन्न हुई, जिससे स्थल पर आध्यात्मिक ऊर्जा और शुद्धता का विशेष संचार हुआ। उन्होंने कहा कि “मंगल कलश केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि यह अंतर्मन की पवित्रता और जीवन के उत्थान का प्रतीक है।”

महामंत्री नवीन जैन दौरायाने ने जानकारी दी कि गुरुवार, 7 नवम्बर को प्रातः 7:30 बजे आचार्य श्री प्रज्ञासागर जी मुनिराज संघ पंच बालयती मंदिर, नसियांजी दादाबाड़ी से विहार कर वसंत विहार दिगंबर जैन मंदिर में मंगल प्रवेश करेंगे। उसी दिन सुबह 11 बजे गुरूधाम तीर्थ का भूमिपूजन समारोह आयोजित किया जाएगा, जिसमें गुरू आस्था परिवार के सभी सदस्य सहभागिता करेंगे।

उन्होंने आगे बताया कि आगामी 17 नवम्बर को मण्डाना में गुरूदेव प्रज्ञासागर जी के सान्निध्य में गुरूधाम तीर्थ का भव्य शिलान्यास एवं गुरूदेव का पिच्छी परिवर्तन कार्यक्रम संपन्न होगा। इस अवसर पर समाज के प्रमुख पदाधिकारी—सकल समाज अध्यक्ष प्रकाश बज, संरक्षक विमल जैन (नांता), कार्यध्यक्ष जे. के. जैन, अध्यक्ष लोकेश जैन, शैलेन्द्र जैन, त्रिलोक जैन, अर्पित सर्राफ, विनय शाह, कपिल आगम, नितेश जैन, विकास मजीतिया, अनिल दौराया, सौरभ जैन, अजय मेहरू, अजय खटकिडा, लोकेश दमदमा, राजीव पाटनी सहित सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित रहे।

समापन में आचार्य श्री ने कहा कि आत्मकल्याण की राह केवल भक्ति या ज्ञान से नहीं, बल्कि निरंतर आत्ममंथन और मोक्ष की साधना से प्रशस्त होती है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे जीवन में केवल चिंतन ही नहीं, बल्कि मोक्ष की सच्ची चिंता को भी अपनाएँ — क्योंकि “चिंतन से चिंता होना चाहिए, तभी आत्मकल्याण का मार्ग खुलता है।”

Pratahkal Bureau

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