अन्नकूट आरती में उमड़ा श्रद्धा का सागर: 108 दीपों से आलोकित हुआ कोटा, ओम बिरला बोले—“अन्नकूट हमारी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा”
कोटा में हाड़ौती सर्व ब्राह्मण समाज द्वारा आयोजित अन्नकूट महोत्सव में 108 दीपों की भव्य आरती से शहर आलोकित हो उठा। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा—“अन्नकूट हमारी आध्यात्मिक व सांस्कृतिक परंपरा है।” भक्ति, एकता और संस्कृति का यह आयोजन समाज को नई दिशा देने वाला साबित हुआ।

कोटा। हाड़ौती की धरती रविवार रात भक्ति और एकता के अद्भुत संगम की साक्षी बनी, जब 108 दीपों की महाआरती से संपूर्ण कोटा भक्तिभाव से आलोकित हो उठा। हाड़ौती सर्व ब्राह्मण समाज अन्नकूट महोत्सव समिति, कोटा के तत्वावधान में सीएडी ग्राउंड, दादाबाड़ी रोड पर आयोजित द्वितीय विशाल अन्नकूट महोत्सव में भगवान परशुराम की महाआरती का दिव्य दृश्य उपस्थित जनसमूह को आस्था और आनंद से अभिभूत कर गया।
जैसे ही 108 दीपों की आरती प्रारंभ हुई, चारों ओर ‘जय परशुराम’ और ‘हर हर महादेव’ के उद्घोष गूंज उठे। लगभग दस हजार श्रद्धालुओं ने एक साथ करबद्ध होकर भगवान परशुराम की आराधना की। दीपमालिका से जगमगाते वातावरण में श्रद्धा और एकता की अद्भुत अनुभूति हुई।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में वर्चुअल माध्यम से संबोधित करते हुए कहा कि हाड़ौती में इस प्रकार के आयोजन समाज के संस्कारों को सुदृढ़ करते हैं। उन्होंने कहा, “ब्राह्मण समाज सदैव ज्ञान, अध्यात्म, सेवा और संस्कृति के माध्यम से समाज को दिशा देता आया है। अन्नकूट हमारी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का जीवंत प्रतीक है।” उन्होंने समिति को समाज में समरसता और एकता का उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए शुभकामनाएं दीं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता रेडक्रॉस के स्टेट चेयरमैन राजेश कृष्ण बिरला ने की, जबकि लोकसभा अध्यक्ष के ओएसडी राजेश डागा विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
आयोजन की आत्मा बना संतों-महंतों का सान्निध्य
बनखंडी बालाजी के महंत सत्यप्रकाश जी, कबीर आश्रम के संत प्रभाकर, कथा वाचक अनिल दीक्षित, थेगड़ा महादेव आश्रम और नीलकंठ महादेव मंदिर के महंत शिव बाबा सहित अनेक संतों ने अपनी वाणी से सभा को प्रेरित किया। महंत सत्यप्रकाश जी ने ब्राह्मण समाज से राष्ट्र निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाने का आह्वान किया, जबकि संत प्रभाकर ने कहा कि समाज को ज्ञान और विज्ञान के साथ संस्कारों से भी जुड़ना चाहिए। पंडित शिव बाबा ने कहा, “अन्नकूट महोत्सव केवल प्रसाद वितरण नहीं, बल्कि यह ब्राह्मण समाज की एकता और सामूहिक श्रद्धा का उत्सव है।”
मंच पर ब्राह्मण समाज के अनेक गणमान्य प्रतिनिधि उपस्थित रहे जिनमें डॉ. के.के. पारीक, कुंज बिहारी गौत्तम, कांग्रेस नेता अनूप ठाकुर, डॉ. सुरेश पाण्डेय, भाजपा नेता अनुसूया गोसावमी, पार्षद सुनील गौत्तम, चिकित्साधिकारी रवि गौत्तम, समाजसेवी उर्मिला शर्मा, विजय शर्मा, अरुण भार्गव और पूर्व सरपंच कैलाश पंचोली शामिल थे। सभी ने समाज में संस्कार और एकता की भावना को जीवन में उतारने का संदेश दिया।
भक्ति, सेवा और व्यवस्था का उत्कृष्ट समन्वय
शाम 7 बजे गणेश वंदना से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ, जिसके बाद भगवान परशुराम की चालीसा का सामूहिक पाठ किया गया। साढ़े सात बजे शुरू हुई 108 दीपों की आरती का दृश्य अद्भुत था। दीपों की लौ से सजा पंडाल आस्था की सौंधी आभा से भर गया। इसके उपरांत महाप्रसाद वितरण प्रारंभ हुआ, जिसमें समाज के युवाओं और महिलाओं ने तन-मन-धन से सहयोग दिया।
समिति अध्यक्ष एवं कार्यक्रम संयोजक भगवती शर्मा ने बताया कि लगभग 90,000 वर्ग फीट क्षेत्र में 300x300 फीट का विशाल पंडाल और 120x22 फीट का मंच तैयार किया गया। रंगीन रोशनी, पुष्प सज्जा और धार्मिक झांकियों ने पूरे स्थल को आध्यात्मिक वातावरण में परिवर्तित कर दिया।
रात्रि 8 बजे से दिल्ली के प्रसिद्ध ‘चिराग ग्रुप’ द्वारा प्रस्तुत महारास और भजन संध्या ने श्रद्धालुओं को भक्ति में डूबो दिया। राधा-कृष्ण, हनुमानजी, माताजी और भगवान परशुराम की झांकियों ने पंडाल को जीवंत बना दिया।
समारोह में शिक्षा, चिकित्सा, खेल और प्रशासनिक क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले समाजबंधुओं को सम्मानित किया गया। साथ ही कक्षा 10वीं और 12वीं के मेधावी विद्यार्थियों को भी मंच पर सम्मानित किया गया।
मुख्य अन्नकूट प्रसाद के लिए विशाल मात्रा में भोजन तैयार किया गया, जिसमें 1500 किलो सब्जी, 160 किलो दाल, 1000 किलो बाफले, 400 किलो कढ़ी, 85 किलो घी और अन्य सामग्री का उपयोग हुआ। इस रसोई सेवा में समाज की महिलाओं और युवाओं ने बड़ी श्रद्धा से भाग लिया।
भगवती शर्मा ने कहा, “अन्नकूट महोत्सव केवल आयोजन नहीं, बल्कि यह हमारी संस्कृति, एकता और सेवा का जीवंत प्रतीक है। हमारा उद्देश्य समाज को एक सूत्र में जोड़ना और युवाओं में भगवान परशुराम के आदर्शों को जागृत करना है।”
अन्नकूट महोत्सव का यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का पर्व बना, बल्कि इसने ब्राह्मण समाज में एकता, संस्कृति और सेवा के मूल्यों को पुनर्जीवित करने का संदेश भी दिया।
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