पुणे के वाघोली स्थित ‘गेरा प्लैनेट ऑफ जॉय, प्रोजेक्ट 3’ में फ्लैटों का कब्जा देने में देरी गेरा डेवलपमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड को भारी पड़ी है। महाराष्ट्र रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (महारेरा) ने चार फ्लैट खरीदारों की शिकायतों को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए बिल्डर को ब्याज देने का आदेश दिया है। पुणे महानगरपालिका में वाघोली के शामिल होने और नियोजन प्राधिकरण के अधिकार पुणे महानगरपालिका को हस्तांतरित होने का हवाला देकर बिल्डर ने देरी के लिए फोर्स मेज्योर यानी अपने नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों का तर्क दिया था। हालांकि, महारेरा ने इस दलील को खारिज कर दिया। प्राधिकरण ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक अधिकारों में बदलाव से अपने आप फोर्स मेज्योर की स्थिति पैदा नहीं होती और इससे बिल्डर की कानूनी जिम्मेदारियां भी समाप्त नहीं होतीं।

महारेरा के सदस्य महेश पाठक ने हाल ही में दिए आदेश में कहा कि फ्लैटों का कब्जा देने की अनुबंधित अंतिम तारीख 31 दिसंबर 2025 थी, जबकि नियोजन प्राधिकरण के अधिकारों के हस्तांतरण से संबंधित सरकारी अधिसूचना 11 फरवरी 2026 को जारी हुई। इस प्रकार, कब्जा देने की निर्धारित समयसीमा समाप्त होने के बाद ही अधिकारों के हस्तांतरण की अधिसूचना जारी की गई। प्राधिकरण ने इस घटनाक्रम को बिल्डर की दलील पर विचार करते समय महत्वपूर्ण माना।

गेरा डेवलपमेंट्स ने 14 जनवरी 2026 को भोगवटा प्रमाणपत्र यानी ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (ओसी) के लिए आवेदन किया था। यह तारीख भी फ्लैटों का कब्जा देने की अनुबंधित समयसीमा के बाद की थी। महारेरा ने अपने आदेश में कहा कि बिल्डर यह साबित करने के लिए आवश्यक दस्तावेज पेश नहीं कर सका कि नियोजन प्राधिकरण में बदलाव के कारण वास्तव में कौन-सी बाधा उत्पन्न हुई, वह कितने समय तक बनी रही और उसका ओसी आवेदन की प्रक्रिया पर क्या प्रभाव पड़ा।

प्राधिकरण ने चारों शिकायतों को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए बिल्डर को खरीदारों द्वारा वास्तव में जमा की गई राशि पर भारतीय स्टेट बैंक की सीमांत लागत आधारित ऋण दर (एमसीएलआर) से दो प्रतिशत अधिक दर पर ब्याज देने का आदेश दिया। यह ब्याज 1 जनवरी 2026 से उस तारीख तक देना होगा, जब तक बिल्डर ओसी सहित फ्लैट का कब्जा देने का स्पष्ट और बिना किसी शर्त वाला प्रस्ताव नहीं देता। इस संबंध में आदेश में निर्धारित शर्तें लागू रहेंगी।

इन चारों शिकायतों का संबंध वाघोली स्थित गेरा प्लैनेट ऑफ जॉय, प्रोजेक्ट 3 की एच-1 और एच-2 इमारतों के फ्लैटों से है। परियोजना का पंजीकरण महारेरा में किया गया है। फ्लैटों के बिक्री समझौतों में कब्जा देने की अंतिम तारीख 31 दिसंबर 2025 निर्धारित की गई थी। चार शिकायतों में से एक में शिकायतकर्ता संदीप यादव और प्रीति सिंह की ओर से अधिवक्ता स्वप्नील भालेराव ने पक्ष रखा। ‘सिविक मिरर’ ने गेरा डेवलपमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड की प्रतिक्रिया जानने के लिए कई बार संपर्क करने का प्रयास किया, लेकिन कंपनी से संपर्क नहीं हो सका।

ओसी प्राप्त करना बिल्डर की वैधानिक जिम्मेदारी

वाघोली को पुणे महानगरपालिका की सीमा में शामिल किए जाने के बाद नियोजन प्राधिकरण के अधिकार पीएमआरडीए से पुणे महानगरपालिका को हस्तांतरित कर दिए गए थे। गेरा डेवलपमेंट्स ने दलील दी कि इस बदलाव से उसके ओसी आवेदन की प्रक्रिया प्रभावित हुई। आवेदन की प्रक्रिया जल्द पूरी कराने के लिए मुंबई उच्च न्यायालय में दायर याचिका का हवाला भी बिल्डर ने दिया। हालांकि, महारेरा ने घटनाक्रम की समयसीमा के आधार पर इस दलील की समीक्षा की।

प्राधिकरण ने रेखांकित किया कि फ्लैटों का कब्जा देने की समयसीमा 31 दिसंबर 2025 को समाप्त हो गई थी। इसके बाद 14 जनवरी 2026 को ओसी के लिए आवेदन किया गया और फिर 11 फरवरी 2026 को नियोजन प्राधिकरण के अधिकार हस्तांतरित करने वाली सरकारी अधिसूचना जारी हुई। महारेरा ने स्पष्ट किया कि आवश्यक भोगवटा प्रमाणपत्र प्राप्त करना प्रवर्तक यानी बिल्डर की वैधानिक जिम्मेदारी है।

केवल नियोजन प्राधिकरण बदलने के आधार पर फोर्स मेज्योर की स्थिति साबित नहीं होती। इसी तरह, ओसी के लिए आवेदन करने से लेकर प्रमाणपत्र प्राप्त होने तक की पूरी अवधि को देरी की जिम्मेदारी से छूट के रूप में नहीं माना जा सकता। बिल्डर को यह प्रमाणित करना आवश्यक था कि ओसी हासिल करने के दौरान कौन-सी वास्तविक बाधा आई, वह कितने समय तक रही और आवेदन की प्रक्रिया पर उसका क्या असर पड़ा। लेकिन इस संबंध में आवश्यक दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए।

ओसी की प्रक्रिया तेज कराने के लिए बिल्डर ने उच्च न्यायालय का रुख किया था। अंततः 29 मई 2026 को ओसी मिला और 22 जून 2026 को फ्लैटों का कब्जा देने के लिए पत्र जारी किए गए। महारेरा ने ओसी प्राप्त करने की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए बिल्डर द्वारा किए गए प्रयासों पर ध्यान दिया। हालांकि, प्राधिकरण ने स्पष्ट किया कि निर्धारित 60 दिनों की अवधि पूरी होने की प्रतीक्षा किए बिना आवेदन पर प्रक्रिया करने के निर्देश दिए जाने से अनुबंध में तय कब्जे की अंतिम तारीख नहीं बढ़ जाती। इससे स्थावर संपदा (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2016 की धारा 18 के तहत बिल्डर की जिम्मेदारी भी समाप्त नहीं होती। प्राधिकरण के अनुसार, मंजूरी हासिल करने के लिए बाद में किए गए प्रयासों से पहले ही हो चुकी देरी समाप्त नहीं मानी जा सकती।

खरीदारों की किस्तों में देरी से नहीं खत्म होगा ब्याज का अधिकार

गेरा डेवलपमेंट्स ने यह मुद्दा भी उठाया कि कुछ फ्लैट खरीदारों ने किस्तों का भुगतान करने में देरी की थी। इस पर महारेरा ने स्पष्ट किया कि खरीदारों की ओर से किस्तों के भुगतान में देरी होने मात्र से उन्हें फ्लैट का कब्जा देने में हुई देरी के लिए ब्याज मांगने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

प्राधिकरण ने यह भी कहा कि बिल्डर यह साबित नहीं कर सका कि खरीदारों की ओर से कथित रूप से किस्तों के भुगतान में हुई देरी के कारण फ्लैटों का निर्माण पूरा होने या ओसी प्राप्त करने में विलंब हुआ। इस प्रकार, खरीदारों के भुगतान में देरी का तर्क कब्जा देने में हुई देरी की जिम्मेदारी से बचने के लिए पर्याप्त नहीं माना गया।

बकाया राशि पर ब्याज वसूलने का बिल्डर का अधिकार बरकरार

महारेरा ने दूसरी ओर रेरा कानून की धारा 19(7) के तहत फ्लैट खरीदारों से बकाया राशि पर नियमानुसार ब्याज वसूलने के बिल्डर के अधिकार को भी बरकरार रखा। इसके तहत संबंधित परिस्थितियों में दोनों पक्षों को एक-दूसरे से मिलने वाले ब्याज के दावों का आपस में समायोजन करने की अनुमति दी गई है।

प्राधिकरण ने उन खरीदारों के स्वतंत्र मुआवजे के दावों को खारिज कर दिया, जिन्होंने परियोजना में बने रहने और अंततः फ्लैटों का कब्जा स्वीकार करने का निर्णय लिया था। महारेरा ने यह भी कहा कि कब्जा स्वीकार किए जाने के बाद कब्जा देने का आदेश प्राप्त करने या वैकल्पिक रूप से जमा की गई राशि वापस मांगने संबंधी अनुरोध निष्प्रभावी हो गए। हालांकि, प्राधिकरण ने स्पष्ट किया कि अनुबंध में तय समयसीमा बीतने के बाद फ्लैट का कब्जा स्वीकार करने से खरीदार का पहले से उत्पन्न ब्याज पाने का अधिकार समाप्त नहीं होता। यानी, कब्जा मिलने के बावजूद खरीदार निर्धारित समयसीमा के बाद हुई देरी की अवधि के लिए ब्याज पाने का हकदार बना रह सकता है।

Pratahkal Newsroom

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