प्रतापगढ़ में अब स्कूली छात्र बनेंगे 'संजीवनी': चिकित्सा विभाग ने शुरू किया 'मिशन जीवनरक्षक', सीपीआर के जरिए बचाई जाएगी जान
प्रतापगढ़ में चिकित्सा विभाग की अनूठी पहल: स्कूलों और कॉलेजों के छात्र अब आपातकाल में बनेंगे 'जीवनरक्षक'। सीएमएचओ डॉ. जीवराज मीणा और डॉ. अंशुल दोषी के मार्गदर्शन में जिले भर में शुरू हुआ सीपीआर प्रशिक्षण अभियान। जानिए कैसे 'गोल्डन ऑवर' में विद्यार्थियों का कौशल बचाएगा लोगों की जान और कैसे मायोकार्डियल इंफार्क्शन जैसी स्थितियों से निपटेगा प्रतापगढ़।

प्रतापगढ़। राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग ने एक ऐसी मानवीय और दूरदर्शी पहल की नींव रखी है, जो आने वाले समय में अनगिनत जिंदगियों को अकाल मृत्यु से बचाने का माध्यम बनेगी। जिले के शिक्षण संस्थानों में अब केवल किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन बचाने का 'महामंत्र' भी गूंजेगा। विभाग द्वारा शुरू किए गए एक विशेष अभियान के तहत जिले के स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को आपातकालीन चिकित्सा कौशल, विशेष रूप से सीपीआर (कार्डियो पल्मोनरी रिससिटेशन) का गहन प्रशिक्षण देकर 'लाइफ सेवर' के रूप में तैयार किया जाएगा। इस मुहिम का औपचारिक आगाज शुक्रवार को मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) कार्यालय के सभागार में आयोजित जिला स्तरीय प्रशिक्षण कार्यशाला के साथ हुआ, जहां स्वास्थ्य योद्धाओं को इस पुनीत कार्य के लिए दक्ष किया गया।
इस ऐतिहासिक प्रशिक्षण कार्यक्रम के पहले चरण में जिले के विभिन्न ब्लॉकों से आए नर्सिंग ऑफिसर, सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी (सीएचओ) और एएनएम ने भाग लिया। जिला चिकित्सालय के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. अंशुल दोषी ने प्रशिक्षणार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि जब किसी व्यक्ति की सांसें अचानक थम जाएं या हृदय गति रुक जाए, तो वह क्षण जीवन और मृत्यु के बीच की सबसे बारीक रेखा होता है। उन्होंने डमी (मॉडल) के माध्यम से व्यावहारिक प्रदर्शन करते हुए बताया कि आपात स्थिति में छाती के मध्य भाग पर प्रति मिनट 100 से 120 बार कंप्रेशन देना कितना प्रभावी हो सकता है। डॉ. दोषी ने बारीकी से समझाया कि यदि एंबु बैग उपलब्ध न हो, तो माउथ-टू-माउथ ब्रीदिंग के जरिए कैसे ऑक्सीजन की आपूर्ति सुनिश्चित की जा सकती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सीपीआर शुरू करने से पहले मरीज की नाड़ी और चेतना की जांच करना अनिवार्य है।
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. जीवराज मीणा ने इस अभियान की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए 'गोल्डन ऑवर' की अवधारणा को रेखांकित किया। डॉ. मीणा के अनुसार, वर्तमान जीवनशैली में हृदयाघात और कार्डियक अरेस्ट के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, और अक्सर घटनास्थल पर मौजूद लोग जानकारी के अभाव में असहाय रह जाते हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि यदि युवाओं को इस तकनीक में पारंगत कर दिया जाए, तो अस्पताल पहुंचने से पहले के उन कीमती मिनटों में मरीज को नया जीवन दिया जा सकता है। इस मिशन को धरातल पर उतारने के लिए कार्यक्रम के नोडल अधिकारी डॉ. नीतेश मीणा ने विस्तृत योजना साझा की। उन्होंने बताया कि जिला स्तर पर तैयार किए गए ये मास्टर ट्रेनर अब अपने-अपने क्षेत्रों में जाकर अन्य स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षित करेंगे, जिसके बाद यह अभियान सीधे शैक्षणिक संस्थानों तक पहुंचेगा।
प्रशिक्षण के दौरान एपिडेमियोलॉजिस्ट सचिन शर्मा ने कार्यक्रम की रूपरेखा और इसके सामाजिक प्रभाव पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को इस प्रकार का प्रशिक्षण देने से न केवल उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा, बल्कि समाज में एक ऐसी जागरूक पीढ़ी तैयार होगी जो किसी भी चिकित्सा आपातकाल में घबराने के बजाय मजबूती से मदद के लिए आगे आएगी। इस अवसर पर जिले भर के चिकित्सा अधिकारियों और कर्मचारियों की उपस्थिति ने इस संकल्प को और भी सुदृढ़ किया कि प्रतापगढ़ का हर विद्यार्थी अब एक सजग जीवनरक्षक की भूमिका निभाने के लिए तैयार होगा। यह पहल न केवल स्वास्थ्य विभाग की एक उपलब्धि है, बल्कि जन-जन की सुरक्षा के प्रति एक बड़ी सामाजिक प्रतिबद्धता का प्रतीक भी है।

Pratahkal Bureau
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