प्रतापगढ़ में मकर संक्रांति का सतरंगी उल्लास: पतंगों से पटा आसमान और देसी खेलों से महकीं गलियां
प्रतापगढ़ में मकर संक्रांति का पर्व पारंपरिक उत्साह और सामाजिक समरसता के साथ मनाया गया। दान-पुण्य की परंपरा के बीच गांधी चौराहा पर गौ-सेवा की गई, वहीं आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से गुलजार रहा। दशहरा मैदान में गिल्ली-डंडा और सितोलिया जैसे देसी खेलों ने पुरानी यादें ताजा कर दीं। आस्था और उल्लास से सराबोर इस उत्सव की पूरी रिपोर्ट यहाँ पढ़ें।

प्रतापगढ़। राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले में बुधवार को मकर संक्रांति का पर्व केवल एक कैलेंडर की तिथि नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सामाजिक समरसता का एक भव्य संगम बनकर उभरा। सूर्य के उत्तरायण होने के इस पावन अवसर पर समूचा जिला सुबह की पहली किरण के साथ ही आध्यात्मिक चेतना और उत्साह के सागर में डूब गया। शहर की ऊंची छतों से लेकर ग्रामीण अंचलों के खुले मैदानों तक, हर ओर रंगों का सैलाब और खुशियों की गूँज सुनाई दी, जिसने आधुनिकता के दौर में भी सनातन संस्कृति की जड़ों को जीवंत कर दिया।
उत्सव का आगाज तड़के ही पवित्र मंदिरों में गूंजते घंटों और मंत्रोच्चार के साथ हुआ। श्रद्धालुओं ने देवालयों में शीश नवाकर सुख-समृद्धि की मंगल कामना की। दान-पुण्य की अटूट परंपरा का निर्वहन करते हुए गांधी चौराहा सहित जिले के विभिन्न सार्वजनिक स्थलों और गोशालाओं में सेवा का अनूठा दृश्य देखने को मिला। यहाँ बेजुबान मवेशियों को हरा चारा खिलाकर मानवीय संवेदनाओं को पुष्ट किया गया। दान की यह सरिता केवल मंदिर-मठों तक सीमित नहीं रही, बल्कि जन-जन ने अपनी सामर्थ्य अनुसार सामाजिक सरोकारों में भागीदारी निभाई।
जैसे-जैसे सूरज चढ़ा, प्रतापगढ़ का आसमान रंग-बिरंगी पतंगों का कैनवास बन गया। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर कोई डोर और चरखी थामे अपनी पतंग को ऊंचाइयों तक पहुंचाने की होड़ में जुटा रहा। 'वो काटा' के शोर और पेच लड़ाने की प्रतिस्पर्धा ने माहौल में एक अलग ही रोमांच भर दिया। रसोई की सुगंध ने इस उत्सव को और भी जायकेदार बना दिया, जहां पारंपरिक खिचड़ा, तिल के लड्डू और गजक की मिठास ने रिश्तों की कड़वाहट को दूर कर सामाजिक सौहार्द का संदेश दिया।
इस वर्ष मकर संक्रांति पर प्रतापगढ़ की फिजाओं में अपनी मिट्टी की महक भी साफ महसूस की गई। आधुनिक खेलों की चकाचौंध को पीछे छोड़ते हुए युवाओं और बच्चों ने गिल्ली-डंडा और सितोलिया जैसे विलुप्त होते देसी खेलों में जमकर पसीना बहाया। विशेष रूप से शाम के समय दशहरा मैदान किसी विशाल मेले में तब्दील हो गया, जहां जनसैलाब ने इन पारंपरिक खेलों के जरिए अपनी विरासत को याद किया।
शाम ढलते-ढलते जिलेभर में उमंग का यह सैलाब एक सुखद स्मृति में तब्दील हो गया। मकर संक्रांति का यह पर्व प्रतापगढ़ के लिए केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक गौरव का जीवंत दस्तावेज साबित हुआ। अनुशासन और हर्षोल्लास के बीच संपन्न हुए इस उत्सव ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि सामूहिक भागीदारी और परंपराओं का सम्मान ही भारतीय समाज की असली शक्ति है।

Pratahkal Bureau
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