प्रतापगढ़। राजस्थान के प्रतापगढ़ की गलियों में आज एक ऐसा मंजर देखा गया जिसने हर आंख को श्रद्धा से नम और गर्व से सराबोर कर दिया। भौतिकता की चकाचौंध और आधुनिक सुख-सुविधाओं को तिलांजलि देकर जब मुमुक्षु राहुल मेहता के कदम संयम की राह पर बढ़े, तो पूरा शहर इस ऐतिहासिक पल का साक्षी बनने उमड़ पड़ा। श्वेतांबर मूर्ति पूजक संघ द्वारा आयोजित यह भव्य वरघोड़ा केवल एक जुलूस नहीं, बल्कि एक उच्च शिक्षित युवा के आध्यात्मिक पुनर्जन्म का उद्घोष था। प्रतापगढ़ के धार्मिक इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज होने जा रहा यह आयोजन इसलिए भी खास है क्योंकि करीब पांच दशक के लंबे अंतराल के बाद शहर ने ऐसा भव्य दीक्षा महोत्सव देखा है।

ढोल-नगाड़ों की थाप, गूंजते धार्मिक जयघोष और हवा में तैरते अबीर-गुलाल के बीच राहुल मेहता का वरघोड़ा जिस मार्ग से भी गुजरा, वहां श्रद्धा का सैलाब उमड़ पड़ा। पिता स्वर्गीय निर्मल कुमार मेहता और माता संतोष मेहता के संस्कारों की छांव में पले-बढ़े राहुल ने अपनी उच्च शिक्षा के दौरान दुनिया को बहुत करीब से देखा, लेकिन उनका मन हमेशा आत्मिक शांति की तलाश में रहा। आदर्श स्कूल से 10वीं, सेफिया स्कूल से 12वीं, एपीसी कॉलेज से बीबीए और उदयपुर के बीएन कॉलेज से एमकॉम (अकाउंटिंग) जैसी डिग्रियां हासिल करने वाला यह मेधावी युवक अब सांसारिक लेखा-जोखा छोड़कर मोक्ष के मार्ग का राही बन गया है। इस यात्रा में उनकी बहनें प्रिया मेहता (प्रिया संघवी) और हिमानी भी उनकी इस दृढ़ इच्छाशक्ति की संबल बनीं।

राहुल के भीतर वैराग्य की लौ वर्ष 2017 में मंदसौर में आचार्य श्री की निश्रा में उपधान तप के दौरान प्रज्वलित हुई थी। इसके बाद करीब चार वर्षों तक गुरु चरणों में रहकर उन्होंने साधु जीवन की कठोरता और उसकी दिव्यता को समझा। मुंबई और इंदौर में हुए चातुर्मास ने उनके संकल्प को फौलादी बना दिया। आगामी 24 जनवरी को जब राहुल मेहता जैन दीक्षा अंगीकार करेंगे, तो वे प्रतापगढ़ जिले से दीक्षित होने वाले 21वें संत बन जाएंगे। वरघोड़े के दौरान उमड़ी महिलाओं, पुरुषों और युवाओं की भारी भीड़ इस बात का प्रमाण थी कि आज के युग में भी त्याग और तपस्या की महिमा सर्वोपरि है।

अपने विदाई संदेश में युवाओं को झकझोरते हुए राहुल मेहता ने कहा कि संसार के भौतिक आकर्षण क्षणभंगुर हैं और स्थायी सुख केवल संयम व धर्म के मार्ग पर ही संभव है। उन्होंने समाज से साधु-साध्वियों की सेवा और सुरक्षा को अपना सामूहिक उत्तरदायित्व समझने का आह्वान किया। राहुल मेहता का यह कदम न केवल उनके परिवार के लिए गौरव की बात है, बल्कि आधुनिक समाज के लिए एक जीवंत संदेश भी है कि सच्ची सफलता संचय में नहीं, बल्कि त्याग में निहित है।

Pratahkal Bureau

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