धरियावद के कुम्हारवाड़ा में गवरी नृत्य की धूम, राई और अन्य पात्रों ने बांधा समां
धरियावद के कुम्हारवाड़ा में 4 अक्टूबर को पारंपरिक गवरी (राई) नृत्य का आयोजन हुआ। 15 से 20 कलाकारों ने विभिन्न पात्रों के जरिए प्रस्तुति दी, जिसे देखने बड़ी संख्या में ग्रामीण उमड़े।

तस्वीर में धरियावद के कुम्हारवाड़ा क्षेत्र में पारंपरिक गवरी नृत्य प्रस्तुत करते हुए कलाकार और उन्हें देखते हुए दर्शक नजर आ रहे हैं।
धरियावद में रविवार, 4 अक्टूबर को नगर के कुम्हारवाड़ा क्षेत्र में पारंपरिक गवरी (राई) नृत्य का आयोजन हुआ। भक्ति, लोक संस्कृति और हास्य-मनोरंजन के इस संगम को देखने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण उमड़े। कार्यक्रम के दौरान दर्शकों में खासा उत्साह नजर आया।
आधुनिक और चकाचौंध भरे दौर में भी मेवाड़ के भील समुदाय के कलाकारों ने अपनी पौराणिक और सांस्कृतिक परंपरा को जीवंत बनाए रखा है। कलाकार लगातार सवा महीने तक कठोर नियमों और व्रत का पालन करते हुए गांव-गांव और ढाणी-ढाणी जाकर गवरी नृत्य की प्रस्तुतियां देते हैं।
गवरी नृत्य में मंडल के 15 से 20 कलाकार भाग ले रहे हैं। मंचन के दौरान कलाकारों की अदाकारी ने दर्शकों का ध्यान खींचा। दल में मुख्य किरदारों के रूप में दो राई, एक राई बुढ़िया, राजा, बंजारा, चोर, सिपाही, गांव के व्यापारी की भूमिका में ‘बोहरा जी’ और ‘हटिया’ जैसे पात्र शामिल रहे। अन्य सह-कलाकारों ने हास्य-व्यंग्य और मूक अभिनय से दर्शकों का मनोरंजन किया।
कलाकारों ने बताया कि गवरी नृत्य शुरू करने से पहले वे अपने आराध्य देव भगवान शिव (बूढ़िया) और मां पार्वती (राई) की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। इसके बाद सवा महीने तक बिना जूते-चप्पल पहने और सात्विक रहकर इस धार्मिक एवं सांस्कृतिक अनुष्ठान को पूरा करते हैं। कुम्हारवाड़ा में हुई प्रस्तुति में इसी परंपरा और लोक संस्कृति की झलक देखने को मिली।

