छोटीसादड़ी: बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था के खिलाफ समाजसेवी का अनशन, अस्पताल परिसर में मचा हड़कंप
छोटीसादड़ी उप जिला चिकित्सालय में चिकित्सकों की भारी कमी और बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं के विरोध में समाजसेवी मनीष उपाध्याय ने नए साल के पहले दिन से आमरण अनशन शुरू कर दिया है। विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति और बेहतर जांच सुविधाओं की मांग को लेकर छिड़े इस आंदोलन से प्रशासन में हड़कंप मच गया है। पूरी रिपोर्ट पढ़ें।

छोटीसादड़ी। नए वर्ष के प्रथम सूर्योदय के साथ ही छोटीसादड़ी के उप जिला चिकित्सालय में जन आक्रोश की एक नई ज्वाला धधक उठी है। नगर के एकमात्र और सबसे महत्वपूर्ण चिकित्सा संस्थान में व्याप्त अव्यवस्थाओं और चिकित्सकों के रिक्त पदों को लेकर समाजसेवी मनीष उपाध्याय ने प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए आमरण अनशन का बिगुल फूंक दिया है। अस्पताल परिसर में शुरू हुआ यह अनशन न केवल स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा रहा है, बल्कि क्षेत्र के आम जनमानस के सब्र का बांध टूटने का भी प्रतीक बन गया है।
चिकित्सालय की चरमराती व्यवस्थाओं को केंद्र में रखते हुए मनीष उपाध्याय ने स्पष्ट किया कि लंबे समय से विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी के कारण यह अस्पताल केवल 'रेफरल सेंटर' बनकर रह गया है। यहाँ आने वाले गरीब और ग्रामीण मरीजों को बुनियादी जांच सुविधाओं के अभाव में अन्यत्र जाने को मजबूर होना पड़ता है, जिससे उन पर भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है। उपाध्याय की प्रमुख मांगों में अस्पताल में रिक्त पड़े विशेषज्ञ पदों को तुरंत भरना, आवश्यक दवाओं का स्टॉक सुनिश्चित करना और ठप पड़ी जांच मशीनों को अविलंब शुरू करना शामिल है। जैसे ही अनशन की खबर क्षेत्र में फैली, स्थानीय नागरिकों, जनप्रतिनिधियों और विभिन्न सामाजिक संगठनों का अनशन स्थल पर तांता लग गया, जिससे स्थिति तनावपूर्ण और संवेदनशील बनी हुई है।
प्रशासनिक गलियारों में इस अनशन ने हलचल तेज कर दी है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी और स्थानीय प्रशासन अब बैकफुट पर नजर आ रहे हैं और उन्होंने वार्ता के माध्यम से स्थिति को संभालने की बात कही है। हालांकि, समाजसेवी मनीष उपाध्याय अपने निर्णय पर अडिग हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा है कि जब तक धरातल पर सुधार की ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक उनका यह सत्याग्रह जारी रहेगा। यह आंदोलन अब केवल एक व्यक्ति का विरोध नहीं, बल्कि छोटीसादड़ी के हर उस नागरिक की आवाज बन चुका है जो बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का अधिकार रखता है। इस घटनाक्रम ने राज्य सरकार के 'निरोगी राजस्थान' के दावों पर भी स्थानीय स्तर पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

Pratahkal Bureau
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