भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर, लोकसभा में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने से जुड़ा संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पारित नहीं हो सका। 278 सांसदों ने इसके पक्ष में मतदान किया, जबकि 211 ने विरोध किया, लेकिन संवैधानिक संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत यानी 326 वोटों का आंकड़ा यह विधेयक हासिल नहीं कर पाया। इस असफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण इसका परिसीमन प्रक्रिया से जुड़ा होना रहा, जिसने राजनीतिक बहस को और जटिल बना दिया।

सरकार का तर्क था कि महिलाओं को आरक्षण लागू करने से पहले देश के संसदीय क्षेत्रों का पुनर्गठन आवश्यक है, ताकि नई जनसंख्या के आधार पर निष्पक्ष प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके। प्रस्तावित परिसीमन के तहत लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाकर लगभग 850 तक करने की संभावना जताई गई थी। लेकिन इसी बिंदु ने राजनीतिक मतभेद को जन्म दिया।



विपक्षी दलों ने महिला आरक्षण के सिद्धांत का समर्थन करते हुए भी इसे परिसीमन से जोड़ने का कड़ा विरोध किया। उनका मानना था कि परिसीमन के बाद उत्तर भारत के अधिक जनसंख्या वाले राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार को अधिक सीटें मिलेंगी, जबकि दक्षिण भारत के राज्यों जैसे तमिलनाडु और केरल का राजनीतिक प्रभाव अपेक्षाकृत कम हो सकता है। इस मुद्दे ने महिला सशक्तिकरण के साथ-साथ उत्तर-दक्षिण संतुलन और संघीय ढांचे को लेकर गंभीर बहस को जन्म दिया।

इस पूरे घटनाक्रम ने संसद में समर्थन को विभाजित कर दिया। जहां एक ओर महिला आरक्षण को व्यापक सहमति मिल रही थी, वहीं परिसीमन को लेकर गहरी आशंकाओं ने विधेयक को पारित होने से रोक दिया। परिणामस्वरूप, एक ऐतिहासिक माने जा रहे इस प्रस्ताव को बहुमत के बावजूद आवश्यक समर्थन नहीं मिल सका।



राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी इस मुद्दे पर तीखी रहीं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसे भाजपा सरकार की “कुटिल योजना” करार देते हुए कहा कि संयुक्त विपक्ष ने इस प्रयास को विफल कर दिया, जो लोकतंत्र को नुकसान पहुंचा सकता था। वहीं CPI(M) के महासचिव एम.ए. बेबी ने भी आरोप लगाया कि सरकार महिला आरक्षण के बहाने देश के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संतुलन को बदलना चाहती थी।

दूसरी ओर, सत्तारूढ़ पक्ष के नेताओं ने विपक्ष पर तीखा हमला बोला। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस दिन को “ब्लैक डे” बताते हुए विपक्ष को “महिला विरोधी” करार दिया। महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि इससे विपक्ष का “क्रूर चेहरा” सामने आया है। वहीं मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने विपक्ष पर “पाखंड” का आरोप लगाया और कहा कि महिलाओं के सशक्तिकरण की उनकी प्रतिबद्धता केवल भाषणों तक सीमित है। बिहार की भाजपा विधायक मैथिली ठाकुर ने भी विपक्ष की मानसिकता पर सवाल उठाते हुए इसे “महिला विरोधी सोच” का प्रमाण बताया।



यह पूरा घटनाक्रम केवल एक विधेयक की असफलता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय की राजनीति की दिशा भी तय कर सकता है। यदि परिसीमन और महिला आरक्षण का मुद्दा इसी तरह बना रहता है, तो 2029 के आम चुनावों में यह सीटों के वितरण, महिलाओं की भागीदारी और उत्तर-दक्षिण राजनीतिक संतुलन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को केंद्र में ला सकता है। यह बहस अब केवल प्रतिनिधित्व की नहीं, बल्कि देश के संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक संतुलन की भी बन चुकी है।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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