लोकसभा में गिरा महिला आरक्षण बिल ; क्या ये निर्णय बदल के रख देगा 2029 चुनाव की दिशा?
लोकसभा में 33% महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक पारित नहीं हो सका, क्योंकि इसे परिसीमन से जोड़ने पर तीखा राजनीतिक विवाद हुआ। इस फैसले ने उत्तर-दक्षिण संतुलन, महिला प्रतिनिधित्व और 2029 चुनावों की राजनीति पर गहरा प्रभाव डालने के संकेत दिए हैं।

महिला आरक्षण विधेयक के पक्ष में नारेबाजी और प्रदर्शन करती हुई महिलाएं
भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर, लोकसभा में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने से जुड़ा संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पारित नहीं हो सका। 278 सांसदों ने इसके पक्ष में मतदान किया, जबकि 211 ने विरोध किया, लेकिन संवैधानिक संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत यानी 326 वोटों का आंकड़ा यह विधेयक हासिल नहीं कर पाया। इस असफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण इसका परिसीमन प्रक्रिया से जुड़ा होना रहा, जिसने राजनीतिक बहस को और जटिल बना दिया।
सरकार का तर्क था कि महिलाओं को आरक्षण लागू करने से पहले देश के संसदीय क्षेत्रों का पुनर्गठन आवश्यक है, ताकि नई जनसंख्या के आधार पर निष्पक्ष प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके। प्रस्तावित परिसीमन के तहत लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाकर लगभग 850 तक करने की संभावना जताई गई थी। लेकिन इसी बिंदु ने राजनीतिक मतभेद को जन्म दिया।
The nefarious ploy of the Modi government and the Sangh Parivar to execute the delimitation of constituencies under the guise of implementing women's reservation has been defeated in the face of opposition unity.
— M A Baby (@MABABYCPIM) April 17, 2026
It should be remembered that the BJP revised to pay heed to the…
विपक्षी दलों ने महिला आरक्षण के सिद्धांत का समर्थन करते हुए भी इसे परिसीमन से जोड़ने का कड़ा विरोध किया। उनका मानना था कि परिसीमन के बाद उत्तर भारत के अधिक जनसंख्या वाले राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार को अधिक सीटें मिलेंगी, जबकि दक्षिण भारत के राज्यों जैसे तमिलनाडु और केरल का राजनीतिक प्रभाव अपेक्षाकृत कम हो सकता है। इस मुद्दे ने महिला सशक्तिकरण के साथ-साथ उत्तर-दक्षिण संतुलन और संघीय ढांचे को लेकर गंभीर बहस को जन्म दिया।
इस पूरे घटनाक्रम ने संसद में समर्थन को विभाजित कर दिया। जहां एक ओर महिला आरक्षण को व्यापक सहमति मिल रही थी, वहीं परिसीमन को लेकर गहरी आशंकाओं ने विधेयक को पारित होने से रोक दिया। परिणामस्वरूप, एक ऐतिहासिक माने जा रहे इस प्रस्ताव को बहुमत के बावजूद आवश्यक समर्थन नहीं मिल सका।
आज लोकसभा में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ नामंजूर होना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है!
— Eknath Shinde - एकनाथ शिंदे (@mieknathshinde) April 17, 2026
कांग्रेस और इंडी गठबंधन ने गरीब, आदिवासी, पिछड़े, अनुसूचित जाति-जनजाति की माताओं और बहनों को संसद में आने से रोकने के लिए महिला-विरोधी रुख अपनाया। शिवसेना इसका तीव्र शब्दों में निषेध करती है!
देश के… https://t.co/V9EDjQCXJe
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी इस मुद्दे पर तीखी रहीं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसे भाजपा सरकार की “कुटिल योजना” करार देते हुए कहा कि संयुक्त विपक्ष ने इस प्रयास को विफल कर दिया, जो लोकतंत्र को नुकसान पहुंचा सकता था। वहीं CPI(M) के महासचिव एम.ए. बेबी ने भी आरोप लगाया कि सरकार महिला आरक्षण के बहाने देश के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संतुलन को बदलना चाहती थी।
दूसरी ओर, सत्तारूढ़ पक्ष के नेताओं ने विपक्ष पर तीखा हमला बोला। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस दिन को “ब्लैक डे” बताते हुए विपक्ष को “महिला विरोधी” करार दिया। महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि इससे विपक्ष का “क्रूर चेहरा” सामने आया है। वहीं मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने विपक्ष पर “पाखंड” का आरोप लगाया और कहा कि महिलाओं के सशक्तिकरण की उनकी प्रतिबद्धता केवल भाषणों तक सीमित है। बिहार की भाजपा विधायक मैथिली ठाकुर ने भी विपक्ष की मानसिकता पर सवाल उठाते हुए इसे “महिला विरोधी सोच” का प्रमाण बताया।
Absolute shame❗️
— Devendra Fadnavis (@Dev_Fadnavis) April 17, 2026
The entire nation watched the opposition’s hypocrisy today.
They had a historic chance to stand with our #NariShakti, and they failed.
Women empowerment, for them, exists only in speeches and slogans.
They chose politics over progress. Their resistance to the…
यह पूरा घटनाक्रम केवल एक विधेयक की असफलता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय की राजनीति की दिशा भी तय कर सकता है। यदि परिसीमन और महिला आरक्षण का मुद्दा इसी तरह बना रहता है, तो 2029 के आम चुनावों में यह सीटों के वितरण, महिलाओं की भागीदारी और उत्तर-दक्षिण राजनीतिक संतुलन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को केंद्र में ला सकता है। यह बहस अब केवल प्रतिनिधित्व की नहीं, बल्कि देश के संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक संतुलन की भी बन चुकी है।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
