मतदाता सूची से 91 लाख नाम गायब ; अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना बनाने के आरोपों में कितनी सच्चाई?
पश्चिम बंगाल में 2026 विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची से 91 लाख नाम हटाए जाने पर विवाद गहराया। चुनाव आयोग के SIR अभियान, हटाए गए वोटरों के आंकड़े, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और चुनावी पारदर्शिता पर उठते सवालों की पूरी रिपोर्ट।

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण
पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में हलचल मचा दी है। चुनाव आयोग द्वारा किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) के तहत करीब 91 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने का मामला अब देशभर में चर्चा का विषय बन गया है।
इस व्यापक पुनरीक्षण प्रक्रिया की शुरुआत पिछले वर्ष नवंबर में हुई थी, जिसका उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक और अद्यतन बनाना बताया गया। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 28 फरवरी तक ही लगभग 63.66 लाख मतदाताओं, यानी करीब 8.3 प्रतिशत नाम, पहले ही हटाए जा चुके थे। इसके चलते कुल मतदाता संख्या लगभग 7.66 करोड़ से घटकर 7.04 करोड़ रह गई थी। संशोधित आंकड़ों में 60.06 लाख से अधिक मतदाता “अंडर एडजुडिकेशन” श्रेणी में रखे गए, जिनमें से जांच के बाद 27.16 लाख नाम हटा दिए गए, जबकि 32.68 लाख मतदाताओं को अंतिम सूची में बरकरार रखा गया।
चुनाव आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्पष्ट किया कि यह पूरी प्रक्रिया चरणबद्ध और पारदर्शी तरीके से की गई है, और जिला-वार आंकड़े सार्वजनिक कर दिए गए हैं ताकि जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके। आयोग के अनुसार, हटाए गए नामों के पीछे प्रमुख कारणों में मृत्यु, स्थानांतरण, दोहराव या अयोग्यता जैसे कारक शामिल हैं, हालांकि इन आंकड़ों का विस्तृत ब्योरा अभी भी बहस का विषय बना हुआ है।
इस बीच, अंतिम मतदाता सूची को चुनाव से पहले “फ्रीज” कर दिया गया है, जिसका मतलब है कि जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, वे इस चुनाव में मतदान करने से वंचित रह सकते हैं। यही पहलू इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक संवेदनशील बनाता है।
राजनीतिक मोर्चे पर यह मुद्दा तीखी बहस का कारण बन गया है। विपक्ष, विशेष रूप से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, ने आरोप लगाया है कि इस प्रक्रिया के तहत अल्पसंख्यक और कुछ विशेष समुदायों को निशाना बनाया गया है, जिससे मतदाता दमन (voter suppression) की आशंकाएं उठ रही हैं। वहीं, भाजपा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि यह कार्रवाई केवल अवैध घुसपैठियों और गैर-योग्य व्यक्तियों को सूची से हटाने के लिए की गई है।
राज्य के विभिन्न हिस्सों में लोगों द्वारा अपने नाम सूची से गायब पाए जाने के बाद विरोध प्रदर्शन भी सामने आए हैं, जिससे स्थिति और तनावपूर्ण हो गई है। मामला अब न्यायालयों तक पहुंच चुका है, जहां न्यायिक अधिकारियों और ट्रिब्यूनल के माध्यम से विवादित मामलों की सुनवाई की जा रही है।
पश्चिम बंगाल में अप्रैल 2026 में होने वाले विधानसभा चुनाव के ठीक पहले सामने आया यह घटनाक्रम न केवल राज्य की राजनीति को प्रभावित कर रहा है, बल्कि चुनावी पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने की यह प्रक्रिया भारतीय चुनावी इतिहास की सबसे बड़ी पुनरीक्षण कार्रवाइयों में से एक मानी जा रही है, जिसके दूरगामी प्रभाव चुनाव परिणामों और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर पड़ सकते हैं।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
