पश्चिम बंगाल विधानसभा ने ओबीसी आरक्षण व्यवस्था में बड़ा बदलाव करते हुए दो संशोधन विधेयक पारित किए हैं। नए प्रावधानों के तहत ओबीसी आरक्षण 17% से घटाकर 7% कर दिया गया है और केवल 66 समुदायों को पात्र रखा गया है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। राज्य विधानसभा ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण व्यवस्था में व्यापक संशोधन करते हुए दो महत्वपूर्ण संशोधन विधेयक पारित किए हैं। इन विधेयकों के तहत ओबीसी आरक्षण को 17 प्रतिशत से घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया गया है, जबकि पात्र समुदायों की सूची का पुनर्गठन करते हुए इसे 66 आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त समुदायों तक सीमित कर दिया गया है। इसी के साथ राज्य सरकार ने समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड-यूसीसी) लागू करने की दिशा में भी औपचारिक प्रक्रिया शुरू कर दी है, जिससे राज्य में सामाजिक और कानूनी सुधारों को लेकर नई बहस छिड़ गई है।

29 जून 2026 को पारित किए गए इन संशोधन विधेयकों के माध्यम से सरकार ने ओबीसी आरक्षण व्यवस्था को पूरी तरह पुनर्गठित किया है। नई व्यवस्था के अनुसार सरकारी नौकरियों और राज्य सेवाओं में ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षण अब 7 प्रतिशत रहेगा। इसके अलावा राज्य की ओबीसी सूची का पुनरीक्षण करते हुए केवल 66 आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त समुदायों को ही आरक्षण का लाभ देने का प्रावधान किया गया है। सरकार का कहना है कि यह कदम न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप कानूनी रूप से टिकाऊ व्यवस्था सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उठाया गया है।

इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह कलकत्ता हाई कोर्ट का वह फैसला माना जा रहा है, जिसमें अदालत ने ओबीसी सूची के पहले किए गए बड़े विस्तार के कई हिस्सों को निरस्त कर दिया था। अदालत ने अपने निर्णय में कहा था कि केवल वे श्रेणियां ही कानूनी रूप से मान्य मानी जा सकती हैं, जिनका उचित सत्यापन किया गया हो और जो वर्ष 2010 से पहले की वैध संरचना का हिस्सा रही हों। अदालत ने यह भी टिप्पणी की थी कि बाद में जोड़े गए कई समुदायों को निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना शामिल किया गया था और उनके संबंध में पर्याप्त सर्वेक्षण तथा दस्तावेजी आधार उपलब्ध नहीं था।

इसी पृष्ठभूमि में राज्य सरकार ने पहले की विस्तारित व्यवस्था को संशोधित करते हुए लगभग 113 हालिया जोड़े गए समुदायों को सूची से बाहर कर दिया है। इसके स्थान पर 66 ऐसे समुदायों को बहाल किया गया है, जिन्हें पहले से विधिवत मान्यता प्राप्त थी। सरकार का दावा है कि नई व्यवस्था न्यायालय की आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है और इसका उद्देश्य आरक्षण प्रणाली को अधिक पारदर्शी तथा कानूनी रूप से मजबूत बनाना है।

नई व्यवस्था लागू होने से पहले राज्य में ओबीसी आरक्षण का कुल प्रतिशत 17 था, जिसे ओबीसी-ए और ओबीसी-बी जैसी श्रेणियों में विभाजित किया गया था तथा 100 से अधिक समुदाय इस व्यवस्था के दायरे में शामिल थे। संशोधित कानून लागू होने के बाद आरक्षण का प्रतिशत घटाकर 7 कर दिया गया है और केवल 66 समुदाय ही इसके लिए पात्र माने जाएंगे। संशोधित राज्य सूची प्रकाशित कर लागू भी कर दी गई है।

इस बदलाव का सीधा प्रभाव राज्य सरकार की नौकरियों, सार्वजनिक क्षेत्र की भर्ती प्रक्रियाओं और राज्य स्तरीय शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश पर पड़ेगा। विशेष रूप से डब्ल्यूबीजेईई (WBJEE) और डब्ल्यूबीसीएपी (WBCAP) जैसी राज्य स्तरीय प्रवेश प्रक्रियाओं में आरक्षण का लाभ अब केवल संशोधित सूची में शामिल समुदायों को ही मिलेगा। जिन 66 समुदायों को सूची में बरकरार रखा गया है, वे आरक्षण का लाभ लेते रहेंगे, जबकि वर्ष 2010 के बाद जोड़े गए अनेक समुदायों और कई उप-समूहों को इस संशोधन के बाद लाभ से बाहर कर दिया गया है।

ओबीसी आरक्षण में बदलाव के साथ-साथ पश्चिम बंगाल सरकार ने समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण पहल की है। राज्य सरकार ने यूसीसी का प्रारूप तैयार करने के लिए एक विशेष मसौदा समिति का गठन किया है। इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई को सौंपी गई है। समिति का दायित्व राज्य के लिए ऐसा कानूनी ढांचा तैयार करना है, जिसमें विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत कानूनों को एक समान नागरिक संहिता के दायरे में लाने की संभावनाओं का अध्ययन किया जा सके।

सरकार के अनुसार समिति द्वारा तैयार किया गया मसौदा जुलाई 2026 की शुरुआत में राज्य मंत्रिमंडल के समक्ष प्रस्तुत किए जाने की संभावना है। मंत्रिमंडल की मंजूरी मिलने के बाद इसे विधानसभा में विधेयक के रूप में पेश किया जा सकता है। सरकार का तर्क है कि समान नागरिक संहिता का उद्देश्य नागरिक कानूनों में एकरूपता लाना है और इस दिशा में उत्तराखंड, गुजरात तथा असम जैसे राज्यों की प्रक्रिया से प्रेरणा ली जा रही है।

हालांकि इस पहल को लेकर राजनीतिक स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया भी सामने आई है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और विभिन्न अल्पसंख्यक संगठनों ने इस प्रस्ताव का विरोध जताते हुए आशंका व्यक्त की है कि इससे धार्मिक व्यक्तिगत कानून प्रभावित हो सकते हैं और विभिन्न समुदायों की कानूनी स्वायत्तता पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर सरकार इसे समान नागरिक अधिकारों और एक समान कानूनी व्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बता रही है।

ओबीसी आरक्षण व्यवस्था में व्यापक बदलाव और समान नागरिक संहिता की दिशा में शुरू हुई यह पहल पश्चिम बंगाल की राजनीति, सामाजिक संरचना और कानूनी व्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव डाल सकती है। एक ओर जहां आरक्षण व्यवस्था में किए गए संशोधन हजारों अभ्यर्थियों और समुदायों को सीधे प्रभावित करेंगे, वहीं दूसरी ओर यूसीसी पर शुरू हुई प्रक्रिया राज्य में आने वाले समय में व्यापक राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का केंद्र बनने की संभावना रखती है।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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