महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे द्वारा अडानी समूह के विस्तार को लेकर हाल ही में किए गए दावों ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। ठाकरे ने एक नक्शा साझा करते हुए आरोप लगाया कि पिछले एक दशक में अडानी समूह का साम्राज्य पूरी तरह से सरकारी मदद का नतीजा है। हालांकि, आंकड़ों और तथ्यों की गहरी पड़ताल कुछ और ही कहानी बयां करती है। विश्लेषण से पता चलता है कि जहां राज ठाकरे का 'विस्फोटक विस्तार' का दावा सही है, वहीं उनके द्वारा साझा किया गया नक्शा तथ्यात्मक रूप से गलत (fake) है और सरकारी मेहरबानी की कहानी अधूरी है।

अडानी समूह के वित्तीय प्रदर्शन पर नजर डालें तो विस्तार के दावे सही साबित होते हैं। वित्त वर्ष 2013-14 से 2024-25 के बीच समूह का राजस्व 5.8 गुना बढ़ा है, जबकि मार्केट कैप में 20 से 30 गुना की भारी उछाल दर्ज की गई है। कंपनी ने अपनी संपत्ति में 4.5 गुना की वृद्धि की है और अपने पोर्टफोलियो को केवल बंदरगाहों और बिजली से आगे बढ़ाकर एयरपोर्ट, रिन्यूएबल एनर्जी, सीमेंट और डेटा सेंटर जैसे 10 से अधिक नए क्षेत्रों में विविधता प्रदान की है। बंदरगाह क्षमता भी एक प्रमुख साइट से बढ़कर अब 14 साइटों तक पहुँच गई है, जो सालाना 600 मिलियन टन से अधिक कार्गो संभालती है।

हालांकि, यह कहना कि ऐसा विकास दुनिया में कहीं और नहीं हुआ, गलत है। उदाहरण के लिए, अमेरिकी चिप निर्माता कंपनी एनवीडिया (NVIDIA) को देखें। एआई (AI) क्रांति के चलते पिछले कुछ वर्षों में एनवीडिया का मार्केट कैप आसमान छू गया है, जिसने कई स्थापित दिग्गजों को पीछे छोड़ दिया है। यह वृद्धि अडानी समूह की तुलना में कहीं अधिक तेज और व्यापक रही है। भारतीय संदर्भ में भी, रिलायंस इंडस्ट्रीज ने इसी अवधि में अपने राजस्व में 3 गुना और मार्केट कैप में 10 गुना की वृद्धि दर्ज की है। इसलिए, अडानी का विकास असाधारण जरूर है, लेकिन यह वैश्विक कॉर्पोरेट इतिहास में अनोखा नहीं है।

राज ठाकरे का यह आरोप कि यह सब केवल 'सरकारी मदद' है, आंशिक रूप से ही सही है। विश्लेषण बताता है कि अडानी समूह के विस्तार का लगभग 40-60% हिस्सा 2014 के बाद की सरकारी नीतियों, अनुबंधों और रियायतों से जुड़ा है। इसमें 2019-20 में जीते गए 6 हवाई अड्डे, 2018 में सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन के 126 लाइसेंस, और 2024 में धारावी पुनर्विकास के लिए 1,080 एकड़ भूमि आवंटन शामिल है।

लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि इस विस्तार का लगभग 40% हिस्सा पूरी तरह से गैर-सरकारी कारकों से आया है। इसमें 2022 में 10.5 बिलियन डॉलर का भारी-भरकम ऋण लेकर किया गया एसीसी (ACC) और अंबुजा सीमेंट का अधिग्रहण और डेटा सेंटर्स जैसे निजी उद्यम शामिल हैं।

इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण पहलू वह है जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है—कॉर्पोरेट क्षमता और ऐतिहासिक संदर्भ। यह तर्क दिया जाता है कि किसी भी सरकार को उस व्यवसाय के विस्तार को नहीं रोकना चाहिए जिसके पास काम करने का प्रमाणित ट्रैक रिकॉर्ड हो।

इतिहास गवाह है कि यह 'ट्रैक रिकॉर्ड' कांग्रेस के शासनकाल में ही बनना शुरू हुआ था। चाहे वह धीरूभाई अंबानी के नेतृत्व में रिलायंस का उदय हो, या फिर गुजरात में चिमनभाई पटेल की सरकार द्वारा मुंद्रा पोर्ट को बेहद कम कीमत पर अडानी को सौंपना। मुंद्रा पोर्ट के विकास ने ही अडानी को वह 'लांचपैड' प्रदान किया, जिससे वे आज यहाँ तक पहुँचे हैं। 2014 में जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आई, तब तक अडानी और अंबानी दोनों के पास परियोजनाओं को समय पर पूरा करने का अनुभव अपने प्रतिस्पर्धियों से कहीं अधिक था। यही कारण है कि पारदर्शी नीलामी प्रक्रियाओं में उन्होंने अन्य दावेदारों को पछाड़ दिया। ऐसे में, मोदी सरकार के लिए हस्तक्षेप करने की गुंजाइश न के बराबर थी।

भले ही मनसे द्वारा दिखाया गया 'फेक मैप' सही भी होता, तो भी शुरुआती दौर में मिले कुछ बिंदुओं (प्रोजेक्ट्स) का बाद में पूरे नक्शे पर फैल जाना स्वाभाविक व्यावसायिक प्रगति है, न कि केवल पक्षपात।

अंत में, इस पूरे प्रकरण में राज ठाकरे का रुख भी सवालों के घेरे में है। जनवरी 2023 की वह तस्वीर आज भी लोगों के जेहन में है, जब उद्योगपति गौतम अडानी ने दादर स्थित राज ठाकरे के आवास पर उनसे मुलाकात की थी। वह बैठक धारावी पुनर्विकास परियोजना को लेकर थी। उस समय ठाकरे को अडानी की बोली या क्षमता में कोई खोट नजर नहीं आया था। ऐसे में अब अचानक नक्शा जारी कर विरोध करना राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बुनियादी ढांचे के विकास में निजी क्षेत्र की भागीदारी अनिवार्य है, और जब तक अवैधता का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता—जैसे कि वर्तमान में सौर ऊर्जा अनुबंधों में अमेरिकी जांच चल रही है—तब तक केवल विस्तार के आधार पर किसी समूह को खारिज करना आर्थिक दृष्टिकोण से तर्कसंगत नहीं है।

Ruturaj Ravan

Ruturaj Ravan

यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।

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