मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर जारी विवाद के बीच मृत मतदाताओं, डुप्लीकेट प्रविष्टियों और संदिग्ध नामों को हटाने की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। पूर्णिमा शर्मा के लेख के अनुसार, भारत में हर साल करीब 1 करोड़ लोगों की मृत्यु हो जाती है। ऐसे में 24 साल बाद हो रहे विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान 2.8 करोड़ मृतकों के नाम हटाए जाने पर सवाल उठता है कि मृत व्यक्तियों के नाम मतदाता सूची में बने क्यों रहने चाहिए। लेख में मतदाता सूची के शुद्धिकरण को निष्पक्ष चुनाव और लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता से जोड़ते हुए इसके सामने मौजूद चुनौतियों और राजनीतिक विवादों पर चर्चा की गई है।

भारत में मतदाता सूची को अद्यतन रखने की आवश्यकता पर जोर देते हुए लेख में कहा गया है कि देश की लगभग 45 करोड़ जनसंख्या अपना पता बदलती रहती है। ऐसे में स्थायी रूप से पता बदल चुके 6.3 करोड़ लोगों के नाम हटाना तार्किक बताया गया है। विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान देशभर में 3 करोड़ ऐसे नाम सामने आने का भी उल्लेख है, जिनके पते पर बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) कई बार पहुंचे, लेकिन वहां कोई नहीं मिला। लेख के मुताबिक, ऐसे नामों को मतदाता सूची से हटाने की जरूरत है।

डुप्लीकेट नामों का मुद्दा भी मतदाता सूची की विश्वसनीयता से जुड़ा है। यदि किसी व्यक्ति का नाम 10 साल बाद भी पुराने पते की मतदाता सूची में दर्ज है और नए पते पर भी उसका नाम शामिल है, तो पुराने पते से नाम हटाया जाना चाहिए। लेख में कहा गया है कि 148 करोड़ की आबादी वाले भारत में 1 करोड़ डुप्लीकेट नाम हटाए जाने पर हैरानी नहीं होनी चाहिए। डुप्लीकेट नामों को हटाने की मांग केवल सत्ता पक्ष ही नहीं, बल्कि विपक्षी दलों के नेता भी समय-समय पर उठाते रहे हैं।

लेख में मतदाता सूची के शुद्धिकरण को चुनाव शुरू होने के समय से चली आ रही निरंतर प्रक्रिया बताया गया है। निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनावों के लिए मृत, अनुपस्थित और डुप्लीकेट नामों के दुरुपयोग को रोकना आवश्यक बताया गया है। साथ ही, पात्र मतदाता का फॉर्म अधूरा होने या तकनीकी कारणों से नाम छूटने की स्थिति में चुनाव आयोग की ओर से समाधान उपलब्ध कराने का उल्लेख किया गया है। मसौदा मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद दावे और आपत्तियां दर्ज कराने के लिए एक महीने या उससे अधिक समय दिए जाने की बात भी कही गई है।

लेख के अनुसार, मतदाता सूची तैयार करने और उसका शुद्धिकरण करने में बीएलओ की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। बूथ लेवल ऑफिसर घर-घर जाकर मतदाता सूची को दुरुस्त करने का काम करते हैं। इनमें शिक्षक और आशा वर्कर भी शामिल होते हैं, जो इस प्रक्रिया में मेहनत करते हैं। राज्यों के सरकारी कर्मचारी भी चुनाव आयोग के लिए काम करते हैं। लेख में राजनीतिक उद्देश्यों के लिए पूरी प्रक्रिया को विवादों में घसीटने पर सवाल उठाए गए हैं।

असम में मतदाता सूची को लेकर विवाद का इतिहास भी लेख में दर्ज है। असम कैडर के पूर्व आईपीएस अधिकारी हिरण्य भट्टाचार्य ने 1982 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एसएल शकधर को पत्र लिखकर विदेशियों और संदिग्ध घुसपैठियों के नाम मतदाता सूची से हटाने की मांग की थी। असम की जनता चाहती थी कि 1979 तक फॉर्म 7 के तहत दर्ज लाखों आपत्तियों का निपटारा किए बिना चुनाव नहीं कराए जाएं। लेख के मुताबिक, इन आपत्तियों का समाधान किए बिना चुनाव कराए गए और असम की जनता ने 1980 तथा 1983 के चुनावों का बहिष्कार किया।

हिरण्य भट्टाचार्य ने अपनी पुस्तक 'ऑपरेशन लेबंसराम' में लिखा है कि 1980 के लोकसभा चुनाव में असम की 14 में से 12 सीटों पर चुनाव नहीं हो पाए। 1983 के असम विधानसभा चुनाव में असम की 90 प्रतिशत जनता ने मतदान नहीं किया। लेख में यह भी कहा गया है कि इन चुनावों में भारतीय मुस्लिमों ने भी मतदान नहीं किया, जबकि 1983 के विधानसभा चुनाव में संदिग्ध घुसपैठियों ने बढ़-चढ़कर मतदान किया। लेख के अनुसार, 1983 में बनी असम सरकार को राज्य के मूल निवासियों यानी भारत की जनता का समर्थन और वोट नहीं मिला था।

असम में मतदाताओं की संख्या में हुई बढ़ोतरी के आंकड़े भी लेख में दिए गए हैं। वर्ष 1967 में राज्य में 54.49 लाख मतदाता थे, जो 1971 में 62.68 लाख, 1977 में 72.25 लाख और 1978 में 79.73 लाख हो गए। वर्ष 1991 में यह संख्या बढ़कर करीब 1.19 करोड़ पहुंच गई। लेख के मुताबिक, 1967 से 1978 के बीच मतदाता सूची में 25 लाख नए नाम जोड़े गए, जबकि 1967 से 1991 के बीच 24 वर्षों में 64 लाख से अधिक नाम जुड़े। वर्ष 1996 में मतदाताओं की संख्या 1.26 करोड़, 1999 में 1.43 करोड़, 2004 में 1.5 करोड़ और 2009 में 1.75 करोड़ हो गई। वर्ष 2014 तक यह आंकड़ा 1.88 करोड़ पार कर गया और 2016 तक करीब 2 करोड़ हो गया। लेख में 1970 के दशक से लाखों बांग्लादेशी घुसपैठियों के नाम मतदाता सूची में शामिल होने की शिकायतों और खबरों का भी उल्लेख किया गया है।

पश्चिम बंगाल में मतदाताओं की संख्या में वृद्धि को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। वर्ष 1952 में राज्य में 1.25 करोड़ मतदाता थे। वर्ष 1977 से 1989 के बीच यह संख्या 2.51 करोड़ से बढ़कर 4 करोड़ के पार पहुंच गई। लगभग एक दशक में 1.5 करोड़ नए मतदाता जोड़े गए। वर्ष 2004 से 2009 के बीच पांच साल में 1 करोड़ नए मतदाता शामिल किए जाने का उल्लेख है। वर्ष 2011 से 2025 के बीच मतदाता सूची में 2 करोड़ की बढ़ोतरी दर्ज होने और मतदाताओं की संख्या 5.6 करोड़ से बढ़कर 7.6 करोड़ पार पहुंचने की बात कही गई है। वर्ष 2002 से 2025 के बीच, दो विशेष गहन पुनरीक्षण अवधियों के बीच, पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची में 3 करोड़ नए मतदाता जोड़े जाने का भी उल्लेख है।

लेख में वर्ष 1995 में भारत के गृह राज्य मंत्री पीएम सईद के संसद में दिए गए बयान का हवाला दिया गया है। उन्होंने कहा था कि बांग्लादेश से बड़े पैमाने पर घुसपैठ के कारण पश्चिम बंगाल और सीमावर्ती क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी बढ़ी है। लेख के मुताबिक, बांग्लादेशी घुसपैठ के कारण स्थानीय निवासी सीमावर्ती इलाकों से दूर भीतरी क्षेत्रों की ओर पलायन करने को मजबूर हुए। इसके चलते भारत-बांग्लादेश सीमा के दोनों ओर रहने वाली आबादी के धर्म, संस्कृति, बोली और पहचान में समानता आने का उल्लेख भी किया गया है।

लेख में यह सवाल भी उठाया गया है कि यदि किसी राज्य से बड़ी संख्या में लोग दूसरे राज्यों में जा रहे हों, तो वहां मतदाताओं की संख्या में उसी अनुपात में गिरावट आनी चाहिए। इसके विपरीत, पश्चिम बंगाल में मतदाताओं की संख्या बढ़ने का दावा किया गया है। लेख के अनुसार, खुद को पश्चिम बंगाल का निवासी बताने वाले लोग देश के दूसरे राज्यों में भी आबादी और मतदाताओं की संख्या बढ़ाते रहे।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी मतदाता सूची में बढ़ोतरी के आंकड़ों का उल्लेख किया गया है। लेख के मुताबिक, 1980 के दशक से दिल्ली में मतदाताओं की संख्या में असाधारण वृद्धि दर्ज की गई। सामान्य तौर पर राजधानी में हर साल औसतन 50 हजार से 1 लाख नए मतदाता जुड़ते थे। वर्ष 1951 में दिल्ली में 7.44 लाख मतदाता थे, जो 1957 में 9.76 लाख, 1962 में 13.45 लाख, 1967 में 16.84 लाख, 1971 में 20.16 लाख, 1977 में 25.47 लाख, 1980 में 30.69 लाख और 1984 में 34.96 लाख हो गए।

लेख में दावा किया गया है कि 1984 से 1989 के बीच केवल पांच वर्षों में दिल्ली में 22 लाख नए मतदाता जुड़े और कुल संख्या 34.96 लाख से बढ़कर 57 लाख के पार पहुंच गई। इसी तरह, 1991 में 60.73 लाख मतदाता थे, जिनकी संख्या 1996 तक बढ़कर 80.58 लाख हो गई। वर्ष 2004 से 2014 के बीच दिल्ली में 39.5 लाख नए मतदाता जोड़े जाने और 20 वर्षों में 81 लाख नए मतदाता शामिल किए जाने का भी उल्लेख है।

लेख में इन आंकड़ों को केंद्र की तत्कालीन सरकारों के कार्यकाल से जोड़ते हुए बताया गया है कि 1984-1989, 1991-1996 और 2004-2014 के दौरान केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। इन अवधियों में क्रमशः राजीव गांधी, नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे। इसके विपरीत, 1999 से 2004 के बीच पांच वर्षों में केवल 51 हजार मतदाता जुड़ने की बात कही गई है। उस समय केंद्र में भाजपा की सरकार थी और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे।

राष्ट्रीय स्तर पर लेख में कहा गया है कि भारत में 15 वर्षों के दौरान 30 करोड़ से अधिक नए मतदाता जोड़े गए। वर्ष 1984 से 1989 के बीच 11 करोड़ नए मतदाता शामिल हुए और कुल संख्या 40 करोड़ से बढ़कर 51 करोड़ हो गई। वर्ष 1989 में असम में चुनाव नहीं हुए थे, लेकिन वहां 1.1 करोड़ मतदाता मौजूद थे। वर्ष 1991 से 1996 के बीच 8.1 करोड़ और 2009 से 2014 के बीच 11.7 करोड़ नए मतदाता जोड़े गए। वर्ष 2009 से 2014 के दौरान मतदाताओं की संख्या 71.69 करोड़ से बढ़कर 83.41 करोड़ हो गई। इस तरह, लेख के मुताबिक, इन तीन अवधियों में कुल करीब 30.8 करोड़ नए मतदाता मतदाता सूची में शामिल हुए। इसकी तुलना में 1952 से 2014 के बीच सामान्य तौर पर पांच वर्षों में 2 से 5 करोड़ नए मतदाता जुड़ते थे।

लेख में इस मुद्दे पर राष्ट्रीय समाचार पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रिपोर्टों का भी हवाला दिया गया है। वर्ष 1991 में न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1971 तक बांग्लादेशी घुसपैठिए दिल्ली पहुंच चुके थे। शेख बारा नाम के एक बांग्लादेशी घुसपैठिए ने अमेरिकी समाचार पत्र को बताया था कि वह अपने परिवार के साथ दिल्ली में रहता था, जहां 1 लाख अन्य बांग्लादेशी भी मौजूद थे।

वर्ष 1998 में इंडिया टुडे में प्रकाशित रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए लेख में कहा गया है कि अल्ताफ हुसैन नाम का एक बांग्लादेशी अपने सात बच्चों के साथ 1973 में दिल्ली के सीमापुरी आ गया था, जहां 50,000 बांग्लादेशी घुसपैठियों के बसने की बात कही गई थी। लेख में जनगणना के आंकड़ों के आधार पर बताया गया है कि 1951 में दिल्ली में 99,501 मुस्लिम थे, जो राजधानी की कुल 17.44 लाख आबादी का 5.7 प्रतिशत थे। इसके बाद 1970 के दशक से हर दशक में दिल्ली की मुस्लिम आबादी में 80 प्रतिशत से अधिक वृद्धि होने और यह वृद्धि हिंदू आबादी की वृद्धि दर से करीब दोगुनी होने का दावा किया गया है। लेख में इस अवधि को बांग्लादेशी घुसपैठ बढ़ने के समय से भी जोड़ा गया है।

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद के अलावा मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे पहले हिंदू-बहुल जिलों के मुस्लिम-बहुल होने का भी लेख में उल्लेख है। कई जिलों की कुल आबादी में मुस्लिम आबादी का हिस्सा 15-20 प्रतिशत बढ़ने और हिंदू आबादी का हिस्सा 15-20 प्रतिशत घटने का दावा किया गया है। असम के सीमावर्ती जिलों में भी बांग्लादेशी घुसपैठ का प्रभाव बताया गया है। पूर्व आईएएस अधिकारी त्रिभुवन प्रसाद तिवारी कमिटी की रिपोर्ट में घुसपैठ और अतिक्रमण के बीच करीबी संबंध का उल्लेख किया गया है। लेख के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने आईएमडीटी एक्ट को रद्द करते हुए असम में लाखों बांग्लादेशी घुसपैठियों की मौजूदगी को राज्य पर हमला बताया था।

लेख में जानकारों के हवाले से कहा गया है कि 1971 तक ईस्ट पाकिस्तान से मुख्य रूप से हिंदू शरणार्थी भारत आते थे, लेकिन बांग्लादेश बनने के बाद, विशेषकर 1977 से, बड़ी संख्या में बांग्लादेशी मुस्लिमों के भारत में घुसपैठ करने की बात सामने आई। तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री और सीपीआई के वरिष्ठ नेता इंद्रजीत गुप्त ने 6 मई, 1997 को संसद में देश में 1 करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठियों के मौजूद होने की बात कही थी। लेख में उस समय प्रकाशित रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा गया है कि गृह मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार वास्तविक संख्या इससे दोगुनी थी।

पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु के बयान का भी उल्लेख किया गया है। लेख के मुताबिक, ज्योति बसु ने 1992 में सीपीएम के मुखपत्र गणशक्ति में प्रकाशित एक लेख में माना था कि 1979 से बांग्लादेशी मुस्लिम भारत में घुसपैठ करने लगे थे। वर्ष 1977 से अप्रैल 1992 के बीच सीमा सुरक्षा बल ने घुसपैठ करते हुए 2,35,529 बांग्लादेशियों को पकड़ा और वापस भेजा। इनमें 68,472 हिंदू और 1,64,132 मुस्लिम थे। इसी अवधि में मोबाइल टास्क फोर्स ने भी 2,16,985 बांग्लादेशियों को वापस भेजा, जिनमें 1,69,795 मुस्लिम और 56,342 हिंदू थे।

लेख में दावा किया गया है कि 15 वर्षों में 4.5 लाख बांग्लादेशियों ने भारत में प्रवेश करने का प्रयास किया, जिनमें 73 प्रतिशत मुस्लिम थे। एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि भारत में घुसपैठ करने वाले पांच बांग्लादेशियों में से केवल एक पकड़ा जाता है और चार गायब हो जाते हैं। यदि पकड़े गए लोगों की संख्या कुल घुसपैठ का 20 प्रतिशत मानी जाए, तो वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है।

लेख के अंतिम हिस्से में मतदाता सूची और घुसपैठ के मुद्दे को राजनीतिक जवाबदेही तथा संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता से जोड़ा गया है। इसमें आरोप लगाया गया है कि कुछ राजनीतिक दल पिछले 50 वर्षों से बने घुसपैठिया वोट बैंक को बचाने के लिए राजनीतिक उद्देश्यों के तहत मतदाता सूची के शुद्धिकरण का विरोध कर रहे हैं। लेख में यह भी दावा किया गया है कि देश में करोड़ों घुसपैठिए और उनकी तीन पीढ़ियां मौजूद हैं तथा भ्रष्ट नेताओं ने दशकों से उन्हें देशभर में मतदाता बनाया है। लेखक के अनुसार, किसी संवैधानिक संस्था पर इस तरह दबाव डालना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। लेख का केंद्रीय सवाल यही है कि यदि अपात्र लोग मतदान करेंगे, तो भारत के नागरिकों के मतों का मूल्य और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता कैसे सुरक्षित रह पाएगी।

लेख के साथ अमर उजाला ने स्पष्ट किया है कि इसमें व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं और आलेख में शामिल सूचना तथा तथ्यों की सटीकता और संपूर्णता के लिए प्रकाशन उत्तरदायी नहीं है।

Pratahkal Bureau

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