होर्मुज की नाकेबंदी ने तोड़ी दुनिया की कमर: भूखे पेट सो रहे मासूम,यूएई ने ईरान से की मुआवजे की मांग
यूएई के राजदूत ने कहा कि होर्मुज में फंसे 800 जहाजों के कारण वैश्विक महंगाई और ऊर्जा संकट बढ़ा, ईरान की जवाबदेही तय करना जरूरी।

अरब सागर में अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा के लिए निगरानी करता एक सैन्य हेलीकॉप्टर।
नई दिल्ली। होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान की सैन्य सक्रियता और जहाजों की नाकेबंदी ने संपूर्ण विश्व की वित्तीय जीवन-रेखा को एक ऐसे चौराहे पर खड़ा कर दिया है जहाँ से वैश्विक तबाही की आहट स्पष्ट सुनाई दे रही है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के राजदूत अब्दुल नासिर अलशाली ने तेहरान की इस मनमानी को वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा बताते हुए स्पष्ट संदेश दिया है कि होर्मुज को बिना किसी शर्त के तुरंत खोला जाना चाहिए। ईरान की इन हरकतों ने न केवल खाड़ी देशों के व्यापार को प्रभावित किया है, बल्कि इसकी आंच अब एशिया और यूरोप के बाजारों तक पहुँच रही है।
राजदूत अलशाली ने बताया कि दुनिया के कुल तेल का बीस प्रतिशत, एक चौथाई प्राकृतिक गैस और उर्वरकों की एक बड़ी खेप इसी संकरे समुद्री मार्ग से गुजरती है। वर्तमान में इस मार्ग पर ईरान के कब्जे ने एक अभूतपूर्व संकट पैदा कर दिया है। फरवरी के अंत से अब तक अरब सागर और उसके आसपास के जलक्षेत्र में कम से कम बाईस वाणिज्यिक जहाजों पर हमले हुए हैं, जिसमें दस निर्दोष चालक दल के सदस्यों की जान जा चुकी है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लगभग आठ सौ व्यापारिक जहाज इस क्षेत्र में फंसे हुए हैं, जिनमें से चार सौ तेल टैंकर हैं। हर फंसे हुए जहाज का अर्थ है माल ढुलाई में देरी और आपूर्ति श्रृंखला का टूटना, जिसका सीधा परिणाम वैश्विक स्तर पर बढ़ती बेतहाशा महंगाई के रूप में सामने आ रहा है।
भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच के आर्थिक संबंधों के लिए यह मार्ग एक रीढ़ की हड्डी के समान है। दोनों देशों के बीच हुआ व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) इसी विश्वास पर टिका है कि व्यापारिक मार्ग सुरक्षित और निर्बाध रहेंगे। वर्तमान में सौ बिलियन अमेरिकी डॉलर का वार्षिक द्विपक्षीय व्यापार सीधे तौर पर होर्मुज की स्थिरता पर निर्भर है। भारतीय निर्यातकों के लिए यूएई और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुँचने का यह प्रमुख रास्ता है, जबकि यूएई का निवेश भारत के बुनियादी ढांचे और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को गति दे रहा है। ईरान द्वारा फैलाई जा रही इस अव्यवस्था से रोजगार, विकास और अवसरों के उस प्रवाह पर ब्रेक लग गया है जिसे दोनों देशों ने बरसों की मेहनत से सींचा था।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस संकट के विरुद्ध एक स्वर मुखर होने लगा है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव संख्या 2817 का पुरजोर समर्थन किया है, जो ईरान से इन हमलों को तुरंत रोकने की मांग करता है। मानवाधिकार परिषद और अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) ने भी समुद्री सुरक्षा पर बढ़ते खतरों की कड़े शब्दों में निंदा की है। राजदूत अलशाली के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय नागर विमानन संगठन ने भी चेतावनी दी है कि यह तनाव केवल समुद्र तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक विमानन सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा है। अब केवल युद्धविराम से बात नहीं बनने वाली, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय एक ऐसे समाधान की मांग कर रहा है जहाँ जवाबदेही वास्तविक हो।
संयुक्त अरब अमीरात ने दोटूक शब्दों में कहा है कि ईरान को उन सभी आर्थिक नुकसानों और संपत्तियों की क्षति के लिए मुआवजा देना होगा जो उसकी नाकेबंदी के कारण हुए हैं। ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं, मिसाइल और ड्रोन कार्यक्रमों के साथ-साथ उससे जुड़े संगठनों की विनाशकारी गतिविधियों पर निर्णायक फैसला लेने का समय आ गया है। वैश्विक अर्थव्यवस्था अब किसी और अनिश्चितता को झेलने की स्थिति में नहीं है। यह अनिवार्य है कि होर्मुज स्ट्रेट को फिर से सुरक्षित और स्वतंत्र नौवहन के लिए बहाल किया जाए, ताकि विश्व के अरबों लोगों का कल्याण सुनिश्चित हो सके और आपूर्ति श्रृंखला फिर से पटरी पर लौट सके।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
