पश्चिम बंगाल की राजनीति से उठी एक सियासी आंधी ने नई दिल्ली के सत्ता प्रतिष्ठानों में भी जबर्दस्त हलचल पैदा कर दी है। एक ऐसा अप्रत्याशित और बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है, जिसकी शायद ही किसी ने कल्पना की होगी। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को आधिकारिक रूप से यह सूचित किया है कि उनके समूह का विलय 'नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया' (NCPI) नामक एक गैर-मान्यता प्राप्त दल के साथ हो गया है। यह घटना केवल एक पार्टी के भीतर की बगावत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय राजनीति के समीकरणों को पूरी तरह से बदलने की क्षमता रखती है। इस विलय के बाद 20 सांसदों के साथ यह नवगठित गुट अब सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का समर्थन करेगा, जिससे सत्ता पक्ष की ताकत और रणनीतिक बढ़त में भारी इजाफा होना तय है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प और चौंकाने वाला पहलू एनसीपीआई की पृष्ठभूमि और उसकी राजनीतिक हैसियत है। राजनीति की गहरी समझ रखने वाले बड़े विश्लेषकों के लिए भी 'नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया' का नाम काफी नया और अनजाना है। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार, एनसीपीआई उन 2,049 गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियों की लंबी सूची का एक छोटा सा हिस्सा है, जो चुनावी सफलता के उस न्यूनतम स्तर तक कभी नहीं पहुंच सकीं जिससे उन्हें मान्यता मिल सके। जनवरी 2023 में भारत के निर्वाचन आयोग में पंजीकृत हुई यह पार्टी मूल रूप से पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के संकराइल इलाके में रजिस्टर्ड है। हालांकि, अपनी स्थापना के बाद से इस पार्टी ने अपना राजनीतिक ध्यान मुख्य रूप से पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा पर केंद्रित रखा था। 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनावों में एनसीपीआई ने ऊनाकोटी ज़िले के कैलाशहर से जहांगीर अली, चावमानु से बरजेदा त्रिपुरा और अंबासा से कृष्ण कुमार देबबर्मा के रूप में तीन उम्मीदवार मैदान में उतारे थे, लेकिन उन्हें वहां कोई जनसमर्थन हासिल नहीं हो सका। एनसीपीआई का आधिकारिक चुनाव चिह्न सात स्ट्रोक वाला इंक पेन का निब है। इस पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्वेली कुंडू हैं, जबकि हावड़ा में पार्टी का समूचा कामकाज तरुण कुमार रॉय देखते हैं।

एक ऐसी पार्टी, जिसका अपना कोई मजबूत चुनावी आधार या अस्तित्व नहीं था, वह आज 20 लोकसभा सांसदों के साथ भारतीय जनता पार्टी (240), तेलुगु देशम पार्टी (16) और जनता दल यूनाइटेड (12) के बाद एनडीए की दूसरी सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी बनने की कगार पर आ खड़ी हुई है। यह एक बड़ी राजनीतिक विडंबना ही है कि जिस एनसीपीआई का एक मुख्य नारा 'राजनीतिक दल बदलने वालों को नकारें' हुआ करता था, आज वही दल तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए दिग्गजों का सबसे बड़ा और सुरक्षित ठिकाना बन गया है। इस शक्तिशाली बागी गुट में सायोनी घोष, शताब्दी रॉय, रचना बनर्जी, जून मालिया, काकोली घोष दस्तीदार और माला रॉय जैसी छह दिग्गज महिला सांसद शामिल हैं। इसके साथ ही मुर्शिदाबाद क्षेत्र से खलीलुर रहमान, अबू ताहिर और पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान जैसे तीन मुस्लिम सांसद भी इस बड़े राजनीतिक उलटफेर का प्रमुख हिस्सा बने हैं।

इस बगावत के पीछे की कानूनी और संवैधानिक रणनीति बेहद पुख्ता और सोची-समझी नजर आती है। छह बार के अनुभवी सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय के नेतृत्व में इस बागी गुट ने दलबदल विरोधी कानून (संविधान की दसवीं अनुसूची) का बहुत ही बारीकी से लाभ उठाया है। यह कानून किसी राजनीतिक दल में केवल कुछ सदस्यों के विभाजन को मान्यता नहीं देता है, जैसा कि 2022 में महाराष्ट्र के शिवसेना विवाद के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था। हालांकि, कानून में यह स्पष्ट अपवाद मौजूद है कि यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई सदस्य एक साथ किसी अन्य दल में विलय करते हैं, तो उनकी संसद सदस्यता सुरक्षित रहती है। वर्तमान में लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के कुल 28 सदस्य हैं। ऐसे में दलबदल कानून की अयोग्यता से बचने के लिए आवश्यक दो-तिहाई का आंकड़ा 19 बैठता है। 20 सांसदों का एक साथ अलग होना इस कानूनी आवश्यकता से एक अधिक है, जिससे इन सभी बागियों की सदस्यता अब पूरी तरह से सुरक्षित मानी जा रही है।

इस अभूतपूर्व राजनीतिक खेल की पटकथा केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के दिल्ली स्थित आवास पर लिखी गई बताई जाती है। इन गुप्त बैठकों के दौर में भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की सक्रिय भागीदारी रही, जिन्हें तृणमूल कांग्रेस के भीतर इस विशाल विभाजन को अंजाम देने का अहम रणनीतिकार माना जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, अंतिम बैठक में 19 सांसद व्यक्तिगत रूप से उपस्थित थे, जबकि एक सांसद ने अपना लिखित समर्थन पत्र भेजा था। बात सिर्फ लोकसभा तक सीमित नहीं है; ऐसा माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में राज्यसभा के भी कई सदस्य इस बगावत का हिस्सा बन सकते हैं, जिनमें से तीन सदस्य पहले ही अपना इस्तीफा सौंप चुके हैं।

अब सभी की निगाहें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के अगले फैसले पर टिकी हैं। बागी सांसदों ने ट्रेज़री बेंच यानी सत्ता पक्ष की सीटों पर बैठने की व्यवस्था करने का औपचारिक अनुरोध किया है। इसके साथ ही, सुदीप बंद्योपाध्याय ने चुनाव आयोग में जाकर स्वयं के गुट को ही असली 'तृणमूल कांग्रेस' के रूप में मान्यता दिलाने का कानूनी विकल्प भी खुला रखा है। यदि लोकसभा अध्यक्ष इस विलय को वैधानिक मान्यता दे देते हैं, तो एनडीए के पास 313 सांसदों का एक बेहद मजबूत आंकड़ा हो जाएगा। यह संख्या लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत (361) के जादुई आंकड़े के बेहद करीब पहुंच जाएगी। भारतीय जनता पार्टी के लिए यह बढ़ा हुआ संख्या बल बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि 'सुपर मेजॉरिटी' न होने के कारण पूर्व में महिला आरक्षण कानून में संशोधन और संभावित परिसीमन (जिसके तहत लोकसभा सीटों की अधिकतम संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव था) जैसे महत्वपूर्ण बिल लटक गए थे। कुल मिलाकर यह घटनाक्रम महज एक पार्टी की अंदरूनी टूट नहीं है, बल्कि भारतीय राजनीति की दिशा बदलने वाला एक ऐतिहासिक क्षण है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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