पश्चिम बंगाल में टीएमसी के बागी गुट द्वारा एनडीए को समर्थन देने की चर्चाओं के बीच सांसद सायोनी घोष का पुराना बयान सोशल मीडिया पर चर्चा में आया।

कोलकाता/नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय एक बेहद संवेदनशील और अप्रत्याशित मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है। सत्तारूढ़ अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के भीतर गहराते आंतरिक मतभेदों के बीच राजनीतिक गलियारों में बड़े उलटफेर की सुगबुगाहट तेज है। ताजा घटनाक्रम में टीएमसी की फायरब्रांड सांसद सायोनी घोष का नाम पार्टी के उन कथित बागी नेताओं की सूची में शामिल होने की चर्चा है, जो केंद्रीय नेतृत्व के खिलाफ लामबंद हो रहे हैं। इस संभावित बगावत ने न केवल पश्चिम बंगाल बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीतिक तापमान को बढ़ा दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह राजनीतिक फेरबदल हकीकत का रूप लेता है, तो राज्य के समीकरण पूरी तरह बदल जाएंगे।

इस पूरे राजनीतिक ड्रामे की शुरुआत तृणमूल कांग्रेस के भीतर एक मजबूत बागी धड़े के उभरने की खबरों से हुई है। राजनीतिक हलकों में चल रही पुख्ता चर्चाओं के अनुसार, टीएमसी की वरिष्ठ नेता काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में पार्टी सांसदों और विधायकों का एक गुट संसद और राज्य स्तर पर भारतीय जनता पार्टी नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को समर्थन देने की रणनीति बना रहा है। इस बागी खेमे की सक्रियता के बीच रिपोर्ट्स में लगातार दावा किया जा रहा है कि युवा सांसद सायोनी घोष भी इसी गुट के संपर्क में हैं और कूटनीतिक स्तर पर बैठकों का दौर जारी है। हालांकि, बागी गुट या सायोनी घोष की तरफ से इस संबंध में अभी तक कोई भी आधिकारिक या लिखित घोषणा नहीं की गई है, लेकिन राजनीतिक घटनाक्रम इसी ओर इशारा कर रहे हैं।

इस अनिश्चितता के माहौल में सायोनी घोष का एक पुराना और विवादित बयान सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक बहसों के केंद्र में आ गया है। दरअसल, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने आम आदमी पार्टी छोड़कर बीजेपी का दामन थामने वाले नेता राघव चड्ढा पर बेहद आक्रामक और सीधा व्यक्तिगत तंज कसा था। उस वक्त चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए सायोनी घोष ने कहा था कि वह सायोनी घोष हैं, राघव चड्ढा नहीं जो राजनीतिक फायदे के लिए अपनी विचारधारा बदल लें। उनका यह तंज उस समय राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में रहा था। अब जबकि खुद सायोनी घोष के एनडीए के सहयोगी बागी गुट में शामिल होने की खबरें आ रही हैं, तो विपक्ष और आम जनता उनके इसी पुराने रुख को लेकर उन पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगा रही है।

कानूनी और तकनीकी दृष्टिकोण से देखा जाए तो भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दलबदल विरोधी कानून के तहत किसी भी सांसद के लिए बिना सदस्यता गंवाए सीधे तौर पर दूसरी पार्टी को समर्थन देना या पाला बदलना आसान नहीं होता। यदि टीएमसी का यह बागी धड़ा सदन में पार्टी व्हिप का उल्लंघन करता है या किसी अन्य गठबंधन को समर्थन देता है, तो उन पर अयोग्यता की तलवार लटक सकती है। यही वजह है कि काकोली घोष दस्तीदार और सायोनी घोष सहित पूरा बागी खेमा फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है और किसी भी औपचारिक घोषणा से पहले कानूनी पहलुओं को मजबूत करने में जुटा है।

इस बड़े राजनीतिक घटनाक्रम का समापन किस करवट होगा, यह तो आने वाला वक्त ही तय करेगा। फिलहाल सभी की निगाहें तृणमूल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की जवाबी कार्रवाई और इन बागी नेताओं के अगले कदम पर टिकी हुई हैं। यदि सायोनी घोष और बागी गुट खुलकर एनडीए के पाले में जाने का फैसला करते हैं, तो यह ममता बनर्जी के किले में एक बड़ी सेंधमारी होगी। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि राजनीति में कोई भी रुख स्थाई नहीं होता और समय चक्र के साथ बयानबाजियां और वफादारियां दोनों ही बदल जाती हैं।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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