कोलकाता/नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर बहुत बड़े उलटफेर के संकेत मिल रहे हैं, जिसने राष्ट्रीय राजनीति के गलियारों में भी हलचल तेज कर दी है। अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस में पुनर्विलय होने की अटकलें बेहद तेज हो गई हैं। इन उभरती संभावनाओं के बीच, तृणमूल कांग्रेस की सर्वोच्च नेता ममता बनर्जी राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में दो दिनों का महत्वपूर्ण राजनीतिक दौरा पूरा कर वापस कोलकाता लौट आई हैं। हालांकि, उनके भतीजे और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी अभी भी दिल्ली में ही डटे हुए हैं, जिससे राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। दिल्ली में शीर्ष कांग्रेस नेतृत्व के साथ बनर्जी परिवार की बैक-टू-बैक मुलाकातों को इस संभावित विलय की कवायद से जोड़कर देखा जा रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत नई दिल्ली में हुई सिलसिलेवार बैठकों से हुई, जिसने कूटनीतिक कयासों को हवा दी। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के आवास पर जाकर उनसे अत्यंत महत्वपूर्ण मुलाकात की थी। इसके ठीक अगले दिन, तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से 10 जनपथ पर अलग से मुलाकात की। इन दोनों शीर्ष नेताओं के बीच हुई इस बैठक के बाद ही टीएमसी के कांग्रेस में पुनर्विलय की खबरों को भारी बल मिला है। दो दिनों तक चले इस गहन विचार-विमर्श के बाद जब ममता बनर्जी कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरीं, तो वहां पहले से मौजूद मीडियाकर्मियों ने उनसे कांग्रेस में पार्टी के विलय की संभावनाओं पर सीधे सवाल किए। हालांकि, उन्होंने इस विषय पर पूरी तरह चुप्पी साधे रखी और बिना कोई प्रतिक्रिया दिए अपनी गाड़ी में बैठकर हवाई अड्डे से रवाना हो गईं।

इस संभावित विलय की खबरों के बीच तृणमूल कांग्रेस के भीतर ही आंतरिक दरार और बगावत के सुर भी खुलकर सामने आने लगे हैं। पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस विधायक दल के नवगठित लेकिन बहुमत वाले गुट के नेता और सदन में विपक्ष के आधिकारिक नेता ऋतब्रत बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के पुनर्मिलन की किसी भी संभावना को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया है। ऋतब्रत बनर्जी ने कड़ा रुख अपनाते हुए तंज कसा कि दिल्ली में कौन किससे मुलाकात कर रहा है, यह उनका व्यक्तिगत मामला हो सकता है, लेकिन इसका पार्टी के मूल संगठन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। उन्होंने दावा किया कि टीएमसी के अधिकांश विधायक, सांसद, जिला नेता और स्थानीय निकायों के प्रतिनिधि किसी भी कीमत पर कांग्रेस में शामिल होने के पक्ष में नहीं हैं।

ऋतब्रत बनर्जी ने संगठन की जमीनी हकीकत को स्पष्ट करते हुए कहा कि उनका गुट ही पश्चिम बंगाल विधानसभा में वास्तविक और मुख्य तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि उनके गुट ने शुरुआत में 58 विधायकों के साथ कदम आगे बढ़ाए थे, और वर्तमान में यह संख्या बढ़कर 64 तक पहुंच चुकी है। उन्होंने यह भी संकेत दिए कि जल्द ही एक और विधायक के जुड़ने से यह संख्या 65 के पार हो सकती है। इसके साथ ही उन्होंने दावा किया कि तृणमूल कांग्रेस के 28 लोकसभा सदस्यों में से अधिकांश सदस्य अब बागी गुट के साथ खड़े हैं। ऐसे में जब असली तृणमूल कांग्रेस उनके पास है, तो किसी भी अन्य धड़े द्वारा पार्टी के कांग्रेस में विलय किए जाने का कोई वैधानिक या व्यावहारिक आधार नहीं रह जाता है।

दूसरी तरफ, पश्चिम बंगाल के स्थानीय कांग्रेस नेतृत्व ने भी इस संभावित पुनर्विलय को लेकर अत्यंत सतर्क और संशयवादी दृष्टिकोण अपनाया है। पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार ने साफ किया है कि तृणमूल कांग्रेस के कांग्रेस में वापस आने की राह इतनी आसान नहीं होगी और इसके लिए दो प्रमुख वैधानिक और राजनीतिक शर्तें अनिवार्य रूप से लागू होंगी। शुभंकर सरकार के अनुसार, पहली शर्त यह है कि जो भी नेता या धड़ा कांग्रेस परिवार में वापस आना चाहता है, उसे राहुल गांधी को बिना किसी शर्त के अपना सर्वोच्च राष्ट्रीय नेता स्वीकार करना होगा। दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि यदि कोई राजनीतिक दल या नेता यह सोचकर कांग्रेस में आ रहा है कि वह अपने पुराने कथित भ्रष्टाचार के मामलों और कानूनी पेचीदगियों से बचने के लिए कांग्रेस का इस्तेमाल एक सुरक्षा कवच या ढाल के रूप में करेगा, तो इसे किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम का ऐतिहासिक संदर्भ भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। गौरतलब है कि ममता बनर्जी ने तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व पर पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ कड़ा आंदोलन न खड़ा करने का आरोप लगाते हुए 1 जनवरी, 1998 को कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी। अब करीब तीन दशकों के बाद, ममता बनर्जी नीत तृणमूल के एक धड़े और कांग्रेस नेतृत्व के बीच बढ़ती नजदीकियां और दिल्ली की रणनीतिक बैठकें यह संकेत दे रही हैं कि दोनों दल एक बार फिर साथ आ सकते हैं। हालांकि, पार्टी के भीतर ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट के कड़े विरोध और प्रदेश कांग्रेस की सख्त शर्तों के कारण इस संभावित विलय की अंतिम परिणति क्या होगी, इस पर पूरे देश की राजनीतिक नजरें टिकी हुई हैं।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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