मनरेगा बचाओ संग्राम: नीतिगत बदलाव या गरीबों पर प्रहार? सड़क से संसद तक उठी आवाज़
मनरेगा बचाओ संग्राम: क्या नीतिगत बदलावों के नाम पर छीना जा रहा है गरीबों का हक? महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के सपने और वर्तमान सरकारी नीतियों के बीच छिड़ा संघर्ष। बजट कटौती और तकनीकी बाधाओं के खिलाफ सड़कों पर उतरे ग्रामीण मजदूर। जानें इस जन-आंदोलन की मुख्य वजहें और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसके गहरे प्रभाव। एक विस्तृत रिपोर्ट।

हक की लड़ाई—जब पसीने की कीमत पर मँडराने लगे सियासत के बादल।
नई दिल्ली | 30 जनवरी 2026
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जिस 'ग्राम स्वराज' की कल्पना की थी, आज उसकी सबसे मजबूत कड़ी मानी जाने वाली 'मनरेगा' (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) विवादों के भंवर में है। देश के विभिन्न हिस्सों से 'मनरेगा बचाओ संग्राम' की गूँज सुनाई दे रही है। आरोप-प्रत्यारोप के बीच यह मुद्दा अब केवल एक सरकारी योजना तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और करोड़ों मजदूरों के अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है। आंदोलनकारियों का दावा है कि वर्तमान सरकार नीतिगत बदलावों के नाम पर गरीबों के संवैधानिक हक को कुचलने की साजिश कर रही है।
मुख्य घटनाक्रम: आक्रोश की गूँज
पिछले कुछ हफ्तों में देश के ग्रामीण अंचलों से लेकर राजधानी के जंतर-मंतर तक मजदूरों और नागरिक संगठनों का जमावड़ा देखा गया है। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि डिजिटल उपस्थिति (NMMS), आधार-आधारित भुगतान प्रणाली (ABPS) और बजट में निरंतर कटौती ने इस योजना को पंगु बना दिया है।
संग्राम के मुख्य बिंदु:
- बजट में कटौती: प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि केंद्र सरकार धीरे-धीरे मनरेगा के बजट को कम कर रही है, जिससे मांग के अनुरूप काम नहीं मिल पा रहा है।
- तकनीकी बाधाएँ: ग्रामीण क्षेत्रों में कमजोर इंटरनेट के बावजूद डिजिटल हाजिरी को अनिवार्य करना मजदूरों के लिए जी का जंजाल बन गया है। हाजिरी न लग पाने के कारण उनकी दिहाड़ी मारी जा रही है।
- ग्राम स्वराज बनाम दिल्ली की नीतियां: आंदोलनकारियों का कहना है कि मोदी सरकार द्वारा किए जा रहे ये बदलाव गांधीजी के ग्राम स्वराज के उस सपने के विपरीत हैं, जिसमें सत्ता और संसाधनों का केंद्र गांव को माना गया था।
आधिकारिक पक्ष और कानूनी पेच
जहाँ एक तरफ जनता सड़कों पर है, वहीं सरकारी सूत्रों का कहना है कि ये बदलाव पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए किए गए हैं। सरकार के अनुसार, आधार लिंकेज से 'फर्जी मजदूरों' के नाम हटाए जा रहे हैं और पैसा सीधे असली लाभार्थी के खाते में पहुँच रहा है।
हालांकि, अधिनियम (MGNREGA Act, 2005) के तहत, काम मांगना एक कानूनी अधिकार है और काम न मिलने पर बेरोजगारी भत्ते का प्रावधान है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि तकनीकी कारणों से किसी मजदूर को काम या भुगतान से वंचित किया जाता है, तो यह कानून का उल्लंघन है। इसी बिंदु को लेकर 'मनरेगा बचाओ संग्राम' के बैनर तले कानूनी लड़ाई की भी तैयारी की जा रही है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
मनरेगा न केवल रोजगार का साधन है, बल्कि यह ग्रामीण संकट के समय एक सुरक्षा कवच (Safety Net) का काम करती है। सूखे या फसल बर्बादी के वक्त यही योजना लाखों परिवारों को भुखमरी से बचाती है। यदि इस योजना की पहुँच सीमित होती है, तो इसका सीधा असर ग्रामीण क्रय शक्ति पर पड़ेगा, जो अंततः देश की जीडीपी को प्रभावित कर सकता है।
'मनरेगा बचाओ संग्राम' आज उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ एक तरफ सरकारी सुधारों की दलीलें हैं और दूसरी तरफ करोड़ों हाथों का अधिकार। महात्मा गांधी के आदर्शों की कसौटी पर यह संघर्ष केवल रोजगार का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन आंदोलनों के दबाव में नीतियों पर पुनर्विचार करती है या फिर ग्राम स्वराज की यह महत्वपूर्ण कड़ी इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगी।

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