हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी से जुड़े विवाद में पवन खेड़ा को लगा तगड़ा झटका, हाईकोर्ट के आदेश पर 'ब्रेक'
सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुए पवन खेड़ा को नोटिस जारी किया, असम पुलिस की एफआईआर से जुड़ा है पूरा मामला।

कांग्रेस नेता पवन खेड़ा (दाएं) और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा (बाएं) के बीच कानूनी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने अग्रिम जमानत पर रोक लगा दी है।
देश की सर्वोच्च अदालत ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा को एक बड़ा कानूनी झटका देते हुए तेलंगाना हाईकोर्ट द्वारा प्रदान की गई अंतरिम अग्रिम जमानत पर रोक लगा दी है। यह मामला असम पुलिस द्वारा दर्ज की गई उस प्राथमिकी (FIR) से संबंधित है, जिसमें उन पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए.एस. चांदुरकर की पीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए न केवल हाईकोर्ट के फैसले को स्थगित किया, बल्कि पवन खेड़ा सहित अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह के भीतर जवाब तलब किया है।
इस विवाद की जड़ें 5 अप्रैल को आयोजित पवन खेड़ा की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस से जुड़ी हैं। आरोप है कि खेड़ा ने सार्वजनिक मंच से असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिंकी भुइयां सरमा के विरुद्ध अपमानजनक और तथ्यात्मक रूप से भ्रामक दावे किए थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि रिंकी भुइयां सरमा के पास तीन अलग-अलग देशों के पासपोर्ट हैं और उनके पास विदेशों में अघोषित संपत्ति है, जिसकी जानकारी मुख्यमंत्री ने अपने चुनावी हलफनामे में नहीं दी है। इन आरोपों के बाद गुवाहाटी क्राइम ब्रांच में मामला दर्ज किया गया था, जिसके आधार पर कानूनी कार्रवाई शुरू हुई।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान असम सरकार का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि पवन खेड़ा द्वारा तेलंगाना हाईकोर्ट से जमानत मांगना 'फोरम शॉपिंग' का एक स्पष्ट उदाहरण है। उन्होंने तर्क दिया कि जब मामला असम में दर्ज है, तो तेलंगाना में क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) कैसे बनता है, इसका कोई स्पष्ट आधार याचिका में नहीं दिया गया था। सॉलिसिटर जनरल ने जोर देकर कहा कि खेड़ा की पत्नी का आधार कार्ड उन्हें दिल्ली का निवासी दर्शाता है, ऐसे में हैदराबाद में याचिका दाखिल करना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है। उन्होंने 'प्रिया इंदोरिया' मामले के ऐतिहासिक निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि कोई भी व्यक्ति अपनी पसंद की अदालत चुनने के लिए प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकता।
सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को यह भी अवगत कराया कि जिन धाराओं के तहत मामला दर्ज है, उनमें से एक में अधिकतम 10 वर्ष के कारावास का प्रावधान है। हाईकोर्ट ने इन तथ्यों की अनदेखी करते हुए केवल एक सप्ताह की ट्रांजिट जमानत प्रदान की थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी प्रारंभिक टिप्पणियों में हाईकोर्ट के रुख पर आश्चर्य व्यक्त किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में हाईकोर्ट का आदेश प्रभावी नहीं रहेगा और मामले की अगली सुनवाई अब तीन सप्ताह बाद निर्धारित की गई है।
यह कानूनी घटनाक्रम न केवल पवन खेड़ा के लिए व्यक्तिगत चुनौती है, बल्कि यह राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच कानूनी मर्यादाओं के पालन की भी याद दिलाता है। शीर्ष अदालत का यह हस्तक्षेप यह सुनिश्चित करने की दिशा में एक कदम माना जा रहा है कि आरोपी कानूनी प्रक्रिया के निर्धारित मार्ग का पालन करें और अधिकार क्षेत्र का अनुचित लाभ न उठाएं। अब सबकी नजरें तीन हफ्ते बाद होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि खेड़ा को राहत मिलेगी या उनकी मुश्किलें और बढ़ेंगी।

Lalita Rajput
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