मुसलमानों की गरबा में एंट्री को लेकर छिड़ी बहस के बीच पूर्व बीजेपी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने एक बड़ा सवाल उठाया है। उन्होंने कहा है कि यदि हज और उमरा का धार्मिक स्वरूप और उसकी पवित्रता पूरी तरह कायम रखी जाती है, तो फिर हिंदू त्योहारों और विशेषकर गरबा को सिर्फ एक 'डांस पार्टी' बताकर उसके धार्मिक स्वरूप को क्यों बदला जा रहा है?

दिल्ली में नवरात्रि और गरबा आयोजनों के दौरान गैर-हिंदुओं या विशेष रूप से मुसलमानों के प्रवेश को लेकर चल रही तीखी बहस पर अपनी राय रखते हुए शहजाद पूनावाला ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर यह बात कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि गरबा को महज एक साधारण डांस पार्टी नहीं माना जा सकता है, क्योंकि यह मूल रूप से मां अम्बे की आराधना और उनकी दिव्य शक्ति की पूजा का एक पवित्र पर्व है। उन्होंने इसके धार्मिक आधार को समझाते हुए बताया कि गरबा शब्द संस्कृत से आया है और इसमें एक मिट्टी के बर्तन में पवित्र दीप जलाकर उसके आसपास पूरी श्रद्धा के साथ अनुष्ठान व पूजा-अर्चना की जाती है। भले ही इसमें नृत्य और संगीत शामिल होता है, लेकिन इसकी मूल आत्मा पूजा और आराधना ही है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए पूनावाला ने इस्लाम धर्म का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार हज और उमरा इस्लाम की पवित्र धार्मिक इबादत की प्रक्रियाएं हैं और यदि कोई हिंदू भी इनका सम्मान करता है, तो भी वह उन धार्मिक स्थलों या प्रक्रियाओं में शामिल नहीं हो सकता। इसी तर्ज पर उन्होंने सवाल उठाया कि जो व्यक्ति मूर्ति पूजा में विश्वास ही नहीं रखता, वह किसी हिंदू धार्मिक पूजा और अनुष्ठान की पूरी प्रक्रिया में किस प्रकार शामिल हो सकता है?

इसके अलावा, उन्होंने गरबा आयोजनों के दौरान गलत पहचान के साथ प्रवेश करने की मंशा पर भी गंभीर चिंता जताई। उन्होंने 'रहीम के राहुल बनने' जैसे मामलों का जिक्र करते हुए कहा कि महिलाओं को अपने जाल में फंसाने के लिए कुछ लोग गरबा आयोजनों को सही जगह मानते हैं और गलत पहचान के साथ वहां प्रवेश करना चाहते हैं। उन्होंने सवाल किया कि यदि किसी की मंशा गलत है और वह उस पूजा पद्धति में विश्वास ही नहीं रखता, तो उसे ऐसे आयोजनों में जाने की आवश्यकता ही क्यों है?

अपने बयान के अंत में पूनावाला ने हिंदू त्योहारों को लगातार 'सेक्युलराइज' (धार्मिक पहचान से दूर करने) की प्रक्रिया पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि दिवाली को 'जश्ने चिराग' और होली या गरबा को केवल 'डांस पार्टी' के रूप में पेश करने की कोशिशें रुकनी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि सभी हिंदू त्योहारों के मूल धार्मिक स्वरूप और उसकी पवित्रता से खिलवाड़ नहीं होना चाहिए तथा इसके चरित्र को यथावत बनाए रखा जाना चाहिए।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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