श्रीलंका, मालदीव और हिंद महासागर के अन्य द्वीपीय देशों से लेकर भारतीय मुख्य भूमि के राजनीतिक गलियारों तक हमेशा अपनी बेबाक और अकादमिक शैली के लिए पहचाने जाने वाले कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ सांसद एवं लेखक डॉ. शशि थरूर ने एक बार फिर देश की भाषाई विविधता, अस्मिता और राष्ट्रीय एकता के संवेदनशील मुद्दे पर बेहद मुखर होकर अपनी बात रखी है। हाल ही में एक प्रमुख मंच पर लिखे गए अपने विस्तृत आलेख के माध्यम से उन्होंने स्पष्ट शब्दों में यह रेखांकित किया है कि भारत जैसे विशाल, बहुसांस्कृतिक और बहुभाषी लोकतांत्रिक गणराज्य में किसी एक विशेष भाषा को थोपने की प्रवृत्ति न केवल संघीय ढांचे के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है, बल्कि यह देश की अंतर्निहित एकता के लिए भी एक बड़ा खतरा बन सकती है। उनके इस वैचारिक आलेख के सार्वजनिक होने के बाद से ही देश भर के राजनीतिक और बौद्धिक हलकों में भाषा को लेकर एक नई और गहरी बहस छिड़ गई है, जिसमें विभिन्न पक्षों की ओर से लगातार प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

अपनी बात की शुरुआत करते हुए डॉ. थरूर ने सबसे पहले इस बात पर जोर दिया कि उन्हें हिंदी भाषा या उसके समृद्ध साहित्य से किसी भी प्रकार की कोई व्यक्तिगत आपत्ति या द्वेष नहीं है। उन्होंने हिंदी को एक बेहद शानदार, व्यापक और विशाल वक्ता वर्ग वाली भाषा के रूप में स्वीकार किया है, जिसकी ऐतिहासिक और साहित्यिक विरासत अत्यंत गौरवशाली रही है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि दक्षिण भारत या देश के अन्य गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों के नागरिकों को भी हिंदी से परहेज नहीं करना चाहिए, बल्कि व्यावहारिक दृष्टिकोण से संवाद को सुगम बनाने के लिए इस भाषा को सीखना फायदेमंद हो सकता है, विशेषकर तब जब उत्तर भारत से बड़ी संख्या में लोग पर्यटन, व्यापार या रोजगार के सिलसिले में दक्षिण के राज्यों का रुख करते हैं। हालांकि, उनके पूरे तर्क का केंद्रीय बिंदु यह है कि किसी भी भाषा के प्रति आदर और उसे स्वेच्छा से अपनाने में और उस भाषा को प्रशासनिक या राजनीतिक बल के माध्यम से जबरन नागरिकों पर थोपने में जमीन-आसमान का फर्क होता है।

अपने आलेख में उन्होंने 'एक राष्ट्र, एक भाषा' की उस अवधारणा पर भी कड़ी आपत्ति जताई है, जिसे अक्सर राजनीतिक और सांस्कृतिक मंचों पर आक्रामक रूप से आगे बढ़ाने का प्रयास किया जाता है। उन्होंने इतिहास और समाजशास्त्र के उदाहरण देते हुए समझाया कि भारत जैसे उपमहाद्वीप में, जहां दर्जनों लिपियां, सैकड़ों भाषाएं और हजारों की संख्या में स्थानीय बोलियां मौजूद हैं, वहां कृत्रिम रूप से एकरूपता थोपने का प्रयास करना देश की मूल प्रकृति के विपरीत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की ताकत उसकी विविधता में निहित है और हमारी राष्ट्रीय एकता किसी एक भाषा को दबाकर या मिटाकर नहीं, बल्कि सभी क्षेत्रीय भाषाओं और संस्कृतियों को साथ लेकर चलने पर आधारित है। उनके अनुसार, उन्नीसवीं सदी के यूरोपीय 'रोमांटिक राष्ट्रवाद' से उपजी इस अवधारणा को भारतीय संदर्भों में लागू करना खतरनाक साबित हो सकता है, जहां यह मान लिया गया था कि एक राष्ट्र के गठन के लिए एक ही भाषा, एक ही इतिहास और एक ही संस्कृति का होना अनिवार्य है। भारत का राष्ट्र-राज्य का विचार यूरोपीय अवधारणा से पूरी तरह भिन्न है, क्योंकि यहां विविधता में एकता ही हमारा सबसे बड़ा संवैधानिक और दार्शनिक आधार रहा है।

इस संदर्भ में उन्होंने 1960 के दशक के उस ऐतिहासिक 'त्रि-भाषा सूत्र' (Three-Language Formula) का विशेष रूप से उल्लेख किया, जिसे उस समय देश की भाषाई चिंताओं को दूर करने के लिए एक बेहद संतुलित, परिपक्व और संघीय ढांचे के अनुकूल समाधान के रूप में स्वीकार किया गया था। उस फार्मूले के तहत यह व्यवस्था की गई थी कि गैर-हिंदी भाषी राज्यों के छात्र अपनी क्षेत्रीय मातृभाषा और अंग्रेजी के अलावा हिंदी का अध्ययन करेंगे, जबकि इसके विपरीत हिंदी भाषी राज्यों के छात्र हिंदी और अंग्रेजी के साथ-साथ किसी अन्य आधुनिक भारतीय भाषा—विशेष तौर पर दक्षिण भारत की किसी भाषा—को सीखेंगे। लेकिन थरूर ने बड़े अफसोस के साथ इस बात को रेखांकित किया कि इस समझौते का पालन ईमानदारी के साथ केवल एक ही पक्ष द्वारा किया गया। तमिलनाडु को छोड़कर दक्षिण भारत के अधिकांश राज्यों के लोगों ने पूरी निष्ठा और सद्भावना के साथ हिंदी को अपनाया और सीखा, जबकि इसके एवज में उत्तर भारत के किसी भी राज्य ने दक्षिण भारतीय भाषाओं को सीखने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की।

उन्होंने तंज कसते हुए लिखा कि जब किसी समझौते का पालन सिर्फ एकतरफा रूप से किया जाए, तो वह समझौता नहीं बल्कि एकतरफा कर या लेवी बनकर रह जाता है। दशकों तक अपनी इस जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने के बाद अब प्रशासनिक स्तर पर अचानक दबाव बनाना और हिंदी भाषी वर्चस्व को बढ़ावा देना आपसी भरोसे की नींव को कमजोर करता है। उन्होंने आगाह किया कि इस पूरी बहस के परिणाम केवल सांस्कृतिक या भावनात्मक स्तर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसका सीधा और गहरा भौतिक असर देश के युवाओं के भविष्य और करियर पर पड़ता है। जब केंद्रीय स्तर की भर्ती परीक्षाएं, उच्च न्यायालयों की न्यायिक कार्यवाही, तकनीकी शिक्षा और प्रशासनिक कामकाज तेजी से केवल एक भाषा की ओर झुकने लगते हैं, तो तिरुवनंतपुरम, कोयंबटूर, कोच्चि या गुवाहाटी जैसे दूरदराज के क्षेत्रों के युवाओं को स्वाभाविक रूप से एक गंभीर संरचनात्मक नुकसान और भेदभाव का सामना करना पड़ता है।

इस व्यवस्था पर गहरी चिंता जताते हुए उन्होंने इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 का सीधा उल्लंघन करार दिया। उन्होंने तर्क दिया कि बिना किसी अपनी गलती के, केवल जन्म स्थान और मातृभाषा के आधार पर देश के एक बहुत बड़े हिस्से के युवाओं को ऐसी भाषा में शीर्ष राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं और परीक्षाओं का सामना करना पड़ता है, जो उनकी अपनी मातृभाषा नहीं है। इसके विपरीत, हिंदी भाषी राज्यों के उम्मीदवारों को यह सुविधा मिल जाती है कि वे अपनी बाल्यावस्था से बोली जाने वाली भाषा में ही अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकते हैं। यह स्थिति गैर-हिंदी भाषी नागरिकों पर अवसरों को लेकर एक प्रकार के स्थायी कर की तरह है, जो संविधान में प्रदत्त समान नागरिकता और समानता के मूल सिद्धांतों की भावना पर सीधी चोट करती है। उन्होंने याद दिलाया कि विवाह या निवास के बाद भी कोई नागरिक अपने मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं होता, ठीक उसी प्रकार विभिन्न राज्यों के नागरिक अपनी क्षेत्रीय पहचान के साथ देश के विकास में समान भागीदार हैं।

अपने आलेख के अंत में डॉ. थरूर ने देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल के दौरान बनाए गए ऐतिहासिक प्रावधानों का भी हवाला दिया। उन्होंने 1963 के 'राजभाषा अधिनियम' (Official Languages Act) और 1968 के संशोधनों का जिक्र करते हुए कहा कि यह कानून इस बात की स्पष्ट कानूनी गारंटी देता है कि केंद्र सरकार के कामकाज में हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी का प्रयोग अनवरत रूप से जारी रहेगा। यह प्रावधान किसी औपनिवेशिक मानसिकता के आगे झुकना नहीं था, बल्कि यह गैर-हिंदी भाषी राज्यों के लिए एक संवैधानिक सुरक्षा कवच था ताकि केंद्र तक उनकी पहुंच हमेशा सुगम बनी रहे। उन्होंने मांग की कि सरकार को त्रिभाषा फार्मूले की नए सिरे से समीक्षा करनी चाहिए और यह अनिवार्य बनाना चाहिए कि उत्तर भारत के स्कूलों में भी दक्षिण या अन्य क्षेत्रों की भारतीय भाषाएं पढ़ाई जाएं, जिसमें संस्कृत को केवल एक आसान विकल्प के रूप में चुनकर औपचारिकता पूरी करने के रास्ते को बंद किया जाना चाहिए। साथ ही, उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि सभी केंद्रीय भर्ती परीक्षाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल सभी 22 भाषाओं में आयोजित किया जाना चाहिए ताकि देश का प्रत्येक युवा बिना किसी भाषाई भेदभाव के पूरी निष्पक्षता के साथ प्रतिस्पर्धा कर सके।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

Next Story