परिसीमन विधेयक पर बढ़ा सियासी घमासान: शशि थरूर ने क्यों दिया संविधान के आर्टिकल 263 का हवाला?
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने परिसीमन मुद्दे पर राज्यों से परामर्श के लिए संविधान के अनुच्छेद 263 के तहत गठित अंतर-राज्यीय परिषद को सक्रिय करने का सुझाव दिया।

परिसीमन के मुद्दे पर अंतर-राज्यीय परिषद को सक्रिय करने की मांग करते कांग्रेस सांसद शशि थरूर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (बाएं से दाएं)।
देश की राजनीति में इन दिनों परिसीमन (Delimitation) के मुद्दे पर सरगर्मी काफी तेज हो गई है। इसी बीच, कांग्रेस पार्टी के दिग्गज सांसद और तिरुवनंतपुरम से लोकसभा सांसद शशि थरूर ने एक बेहद दिलचस्प और दूरगामी राजनीतिक दांव चला है। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की है कि देश में परिसीमन जैसे गंभीर और संवेदनशील मुद्दे पर केवल संसद के भरोसे न बैठा जाए, बल्कि इसके लिए संवैधानिक संस्था 'इंटर स्टेट काउंसिल' (अंतर-राज्यीय परिषद) को तुरंत फिर से सक्रिय (पुनर्जीवित) किया जाए। थरूर का मानना है कि हमारे संघीय ढांचे (Federal Structure) की यह मांग है कि ऐसे बड़े बदलावों के लिए राज्यों को भी विश्वास में लिया जाए।
'संसद के अकेले के भरोसे नहीं हो सकता समाधान'
शुक्रवार की सुबह कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट शेयर किया। इसमें उन्होंने एक अंग्रेजी अखबार में लिखे अपने आलेख का जिक्र करते हुए जोर दिया कि परिसीमन जैसे जटिल मामलों का हल सिर्फ संसद के जरिए नहीं निकाला जा सकता।
शशि थरूर ने अपने बयान में कहा, "परिसीमन जैसे मुद्दों का अकेले संसद से समाधान नहीं निकाला जा सकता, हमारे संघीय ढांचे में इसके लिए राज्यों से मशवरा करने की भी जरूरत है। इसे प्रभावी तरीके से करने के लिए संविधान एक तंत्र मुहैया करवाता है—अंतर-राज्यीय परिषद—जिसे सरकार नजरअंदाज करना चाहती है। हमें इसे पुनर्जीवित करना होगा।" उनका यह भी आरोप है कि मोदी सरकार परिसीमन विधेयक पर संसद की मुहर लगवाने के लिए तमाम तरह के तरीके अपना रही है, जबकि राज्यों की सहमति बेहद जरूरी है।
आखिर क्या है 'इंटर स्टेट काउंसिल'? (संविधान का आर्टिकल 263)
यह जानना बेहद दिलचस्प है कि जिस अंतर-राज्यीय परिषद की शशि थरूर मांग कर रहे हैं, वह असल में क्या है और कैसे काम करती है:
- भारतीय संविधान के आर्टिकल 263 के तहत अंतर-राज्यीय परिषद की व्यवस्था की गई है।
- इसका मुख्य उद्देश्य समान हितों से जुड़े मुद्दों पर केंद्र और राज्यों के बीच आपसी तालमेल और संवाद बनाए रखना है।
- हालांकि यह एक संवैधानिक निकाय है, लेकिन यह कोई स्थायी (Permanent) संस्था नहीं है। जनहित और जरूरत पड़ने पर राष्ट्रपति द्वारा इसका गठन किया जाता है।
- सरकारिया आयोग की सिफारिश के आधार पर साल 1990 में पहली बार इसका गठन किया गया था।
- यह मुख्य तौर पर एक सलाह देने (Advisory) वाली संस्था है।
कौन-कौन होता है इंटर स्टेट काउंसिल का हिस्सा?
अंतर-राज्यीय परिषद की संरचना काफी व्यापक होती है, जिसमें देश के शीर्ष प्रशासनिक और राजनीतिक चेहरे शामिल होते हैं:
- अध्यक्ष: देश के प्रधानमंत्री इस परिषद के पदेन अध्यक्ष (Ex-officio Chairman) होते हैं।
- सदस्य: सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और जिन केंद्र शासित प्रदेशों में विधानसभाएं हैं, उनके मुख्यमंत्री इसके सदस्य होते हैं।
- प्रशासक: अन्य केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासक भी इसके सदस्य के रूप में शामिल होते हैं।
- राष्ट्रपति शासन वाले राज्य: जिन राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू होता है, वहां का प्रतिनिधित्व वहां के राज्यपाल करते हैं।
- केंद्रीय मंत्री: प्रधानमंत्री द्वारा मनोनीत 6 केंद्रीय मंत्री गृह मंत्री समेत इसके सदस्य होते हैं।
- स्थायी आमंत्रित सदस्य: इसके अलावा प्रधानमंत्री द्वारा तय किए गए 5 अन्य केंद्रीय मंत्री या राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) इसके स्थायी आमंत्रित सदस्य होते हैं।
- सचिवालय: इसका एक अपना सचिवालय भी होता है, जिसका प्रभार भारत सरकार के एक सचिव संभालते हैं (यही सचिव क्षेत्रीय परिषदों के सचिवालय का कार्यभार भी देखते हैं)।
हालांकि इसका उद्देश्य केंद्र और राज्यों के बीच निरंतर चर्चा बनाए रखना है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि 1990 से लेकर 2016 तक अंतर-राज्यीय परिषद की केवल 11 बार ही बैठकें आयोजित की जा सकी हैं।
क्या है देश में परिसीमन की मौजूदा स्थिति और इतिहास?
भारत में पिछला बड़ा और पूर्ण परिसीमन साल 1976 में किया गया था। इसके बाद 2001-2002 में भी एक बार प्रक्रिया हुई, लेकिन उसमें लोकसभा या विधानसभाओं की सीटों की संख्या नहीं बढ़ाई गई थी, बल्कि सिर्फ संसदीय क्षेत्रों की सीमाओं और भौगोलिक बदलावों को ही तय किया गया था।
संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार साल 2026 तक नए परिसीमन पर रोक लगाई गई थी, और अब आने वाली जनगणना प्रक्रिया के आधार पर नया परिसीमन कराना एक संवैधानिक जरूरत बन चुका है।
महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक का पेच
इस पूरे विवाद की जड़ में हालिया विधाई कदम और आंकड़े जुड़े हैं:
- देश में महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 पास होने के बाद लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित की जानी हैं, जिसके चलते परिसीमन की आवश्यकता और भी ज्यादा बढ़ गई है।
- मोदी सरकार ने साल 2011 की इसी साल अप्रैल के महीने में संसद में एक बिल पेश किया था, जिसमें 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन कराने की बात थी।
- इस प्रस्ताव के तहत लोकसभा की मौजूदा 545 सीटों को बढ़ाकर लगभग 850 तक करने का प्रावधान रखा गया था।
- दक्षिण भारत के राज्यों की तरफ से किसी तरह की असंतोष या शिकायत न हो, इसलिए यह भी प्रावधान किया गया था कि सभी राज्यों की सीटों में कम से कम 50% की बढ़ोतरी की जाए।
- लेकिन लोकसभा के भीतर इस विधेयक के लिए दो-तिहाई (2/3) सदस्यों का जरूरी समर्थन नहीं जुट पाने के कारण यह विधेयक 17 अप्रैल, 2026 को गिर गया था।
संसद का बदला हुआ गणित और नई राजनीतिक हलचल
चूंकि संसद के मानसून सत्र का अभी तक आधिकारिक तौर पर सत्रावसान (Prorogation) नहीं हुआ है, इसलिए राजनीतिक गलियारों में रह-रहकर ऐसी अफवाहें उड़ती रहती हैं कि सरकार किसी भी वक्त नया संसद सत्र बुलाकर इस परिसीमन विधेयक को दोबारा पास करवाने का प्रयास कर सकती है।
लेकिन मौजूदा राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदलते दिख रहे हैं। मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और एसआईआर (SIR) के मुद्दों को लेकर कुछ गैर-इंडिया ब्लॉक पार्टियों ने भी जिस आक्रामक तरीके से सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला है, उसके बाद इस बिल को संसद से पास करवाना सरकार के लिए और अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इसी बदले हुए माहौल और गतिरोध के बीच कांग्रेस सांसद शशि थरूर को अपनी यह नई और रणनीतिक सलाह देने का मौका मिला है।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
