बिहार में एक बार फिर शराबबंदी कानून को लेकर राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज हो गई है। राज्य में इस कड़े कानून की समीक्षा और इसके भविष्य को लेकर तमाम तरह की चर्चाएं चल रही हैं। एक तरफ जहां जनता दल यूनाइटेड (JDU) की ओर से इस कानून के समर्थन में लगातार बयान दिए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आर्थिक तर्कों और नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) की सिफारिशों ने इस बहस को एक नया मोड़ दे दिया है। इन तमाम परिस्थितियों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या राज्य के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी इस मामले पर नीतीश कुमार के पारंपरिक और दृढ़ स्टैंड के खिलाफ कोई रुख अपनाएंगे या फिर राजनीतिक मजबूरियों के चलते इस कानून को यथावत बनाए रखेंगे।

इस पूरी बहस के केंद्र में एनसीएईआर की वह सिफारिश है, जिसमें पूर्ण शराबबंदी कानून को समाप्त कर बिहार सरकार को आबकारी शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) दोबारा शुरू करने की बात कही गई है। इस सच से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि बिहार की तत्कालीन आर्थिक स्थिति में आई गिरावट को देखते हुए यह कदम एक बड़ा वित्तीय सहारा साबित हो सकता है। आंकड़े गवाह हैं कि शराबबंदी लागू होने से पहले बिहार को अपनी कुल कमाई का लगभग 14 प्रतिशत हिस्सा एक्साइज ड्यूटी के रूप में प्राप्त होता था। भले ही यह तर्क दिया जा रहा हो कि वर्तमान में शराबबंदी पूरी तरह से एक सफल प्रयोग साबित नहीं हो पाई है, लेकिन इसके सामाजिक और राजनीतिक निहितार्थ इतने गहरे हैं कि राज्य के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के लिए इस कानून का खात्मा करना आसान नहीं होगा।

शराबबंदी कानून के खात्मे से जुड़ा सबसे बड़ा राजनीतिक पहलू यह है कि इससे मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी सीधे तौर पर नीतीश कुमार के विरुद्ध खड़े नजर आएंगे। बिहार की राजनीति में एक खास वर्ग पहले से ही अप्रत्यक्ष रूप से यह मानता रहा है कि नीतीश कुमार को सत्ता से दूर करने या राजनीतिक समीकरणों को बदलने में सम्राट चौधरी की भूमिका एक बड़े फैक्टर के रूप में रही है। इस दबी हुई नाराजगी या कोफ्त का इजहार करने का तात्कालिक मौका हाल ही में बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के दौरान देखने को मिला, जहां एक बड़े वर्ग ने एनडीए से इतर जनसुराज के पक्ष में मतदान कर अपने गुस्से का इजहार किया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कुर्मी और अति पिछड़ा वर्ग का एक बड़ा हिस्सा जनसुराज को वोट कर अपनी नाराजगी जता चुका है। यदि ऐसे समय में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी नीतीश कुमार के इस महत्वाकांक्षी शराबबंदी कानून को समाप्त कर देते हैं या इसमें कोई ऐसा बड़ा संशोधन करते हैं जिससे यह कमजोर पड़े, तो नीतीश कुमार को पसंद करने वाला वह विशाल वर्ग जो शराबबंदी को समाज सुधार की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम मानता है, वह सीधे तौर पर सम्राट चौधरी के खिलाफ खड़ा हो जाएगा।

इसके अलावा, इस पूरे समीकरण का सबसे अहम हिस्सा राज्य की आधी आबादी यानी महिलाएं हैं। शराबबंदी कानून को लागू करने की जिद्द और दृढ़ इच्छाशक्ति मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तब दिखाई थी जब उन्हें किसी शराबी के प्रताड़ित परिवार की महिलाओं की लगातार शिकायतें मिल रही थीं। यह वही नीतीश कुमार थे जिन्होंने अपने शासनकाल के शुरुआती दौर में पंचायतों तक शराब की दुकानें खुलवाने का निर्णय लिया था, लेकिन महिलाओं की पीड़ा को समझते हुए उन्होंने 1 अप्रैल 2016 को शराबबंदी लागू की और फिर जनता के भारी समर्थन को देखते हुए 5 अप्रैल 2016 से राज्य में विदेशी शराब सहित सभी प्रकार की बिक्री और सेवन पर पूर्ण प्रतिबंध घोषित कर दिया था। राज्य की आधी आबादी तब से लगातार इस फैसले के समर्थन में खड़ी रही है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी कदापि यह जोखिम नहीं उठाना चाहेंगे कि इस वर्ग को नाराज कर अपने राजनीतिक अस्तित्व के सामने कोई नया संकट खड़ा किया जाए।

शराबबंदी के पक्ष में एक और मजबूत पहलू इसके नैतिक मूल्य और सामाजिक सुधार से जुड़ा हुआ है। जब नीतीश कुमार ने इस कानून को लागू किया था, तब पूरी दुनिया में इसे समाज सुधार की दिशा में एक मिसाल के तौर पर देखा गया था। यह अपने आप में एक अनूठा उदाहरण था कि आर्थिक संकट से जूझ रहा एक राज्य अपनी आय के एक बड़े साधन को राष्ट्रहित और समाजहित में ठुकरा रहा है। विभिन्न संगठनों द्वारा जारी किए गए आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि शराबबंदी के बाद परिवारों के बीच होने वाली घरेलू हिंसा और आपसी झगड़ों में उल्लेखनीय कमी आई है। कमाई का जो हिस्सा पहले शराब पर बर्बाद होता था, वह अब बच्चों की बेहतर पढ़ाई, उनके पोषण और परिवार की बुनियादी जरूरतों पर खर्च हो रहा है, जिससे समाज में एक सकारात्मक माहौल बना है। शांति, आपसी सौहार्द और पारिवारिक सुकून हासिल करने वाला यह बड़ा समूह यदि शराबबंदी खत्म होती है, तो सरकार के खिलाफ लामबंद हो जाएगा। यही वजह है कि तमाम आर्थिक दबावों और तर्कों के बावजूद यह कानून फिलहाल राजनीतिक और सामाजिक संतुलन का एक ऐसा केंद्र बना हुआ है, जिसे छेड़ना आसान नहीं है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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