TMC में बड़ी बगावत: ममता बनर्जी का साथ छोड़ बागी खेमे में शामिल हुईं सांसद सायोनी घोष, पत्र पर दस्तखत उजागर|
तृणमूल कांग्रेस की फायरब्रांड नेता सायोनी घोष का नाम और हस्ताक्षर 19 बागी सांसदों की सूची में सामने आया है, जिन्होंने लोकसभा में अलग गुट की मांग की है।

तृणमूल कांग्रेस की सांसद सायोनी घोष (बाएं) और उनके द्वारा लोकसभा अध्यक्ष को सौंपे गए दस्तावेज पर किए गए हस्ताक्षर (दाएं) को दर्शाता एक संयुक्त चित्र|
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर बहुत बड़ा भूचाल आ गया है, जिसने सत्ताधारी दल तृणमूल कांग्रेस (TMC) की आंतरिक स्थिरता को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को साल 2029 में देश का प्रधानमंत्री बनाने का सार्वजनिक रूप से दम भरने वाली और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की सबसे भरोसेमंद सिपहसालार मानी जाने वाली फायरब्रांड नेता सायोनी घोष ने आधिकारिक तौर पर बगावत का रास्ता चुन लिया है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर उभरे बागी सांसदों के गुट ने एक सनसनीखेज कदम उठाते हुए लोकसभा अध्यक्ष को सौंपे गए पत्र पर दस्तखत करने वाले नेताओं की सूची जारी कर दी है, जिसमें जादवपुर संसदीय क्षेत्र से पहली बार चुनकर आईं सांसद सायोनी घोष के हस्ताक्षर साफ तौर पर दिखाई दे रहे हैं। इस नए खुलासे के बाद राजनीतिक गलियारों में यह तीखा सवाल उठ रहा है कि आखिर ममता दीदी की सबसे वफादार रहने का दावा करने वाली सायोनी इतनी जल्दी क्यों पलट गईं।
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब तृणमूल कांग्रेस की वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई में लोकसभा के 19 बागी सांसदों ने एकजुट होकर संसद के निचले सदन में एक बिल्कुल अलग गुट के तौर पर मान्यता देने की औपचारिक मांग की। इन बागी सांसदों द्वारा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंपे गए आधिकारिक पत्र में सायोनी घोष का नाम और उनके हस्ताक्षर शामिल होने की पुष्टि हो चुकी है। बंगाली फिल्मों की जानी-मानी अभिनेत्री से राजनीतिक पटल पर टीएमसी की मुख्य आवाज बनकर उभरीं सायोनी घोष का नाम इस सूची में आने के बाद उनके कई पुराने वीडियो और तीखे राजनीतिक बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। हाल ही में जब आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्ढा को लेकर राजनीतिक चर्चाएं गर्म थीं, तब सायोनी घोष ने बेहद आक्रामक अंदाज में तंज कसते हुए कहा था कि वह चड्ढा नहीं हैं जो 'चड्डी' बदल लेंगी, घोष हमेशा घोष ही रहेगा। इसके अतिरिक्त, उन्होंने पिछले चुनाव प्रचार के दौरान भारतीय जनता पार्टी के नेता शुभेंदु अधिकारी पर बेहद तीखा हमला बोलते हुए उन्हें 'बी-ग्रेड' या 'सी-ग्रेड' का नेता करार दिया था और उन पर ममता बनर्जी के साथ गद्दारी करने का सीधा आरोप मढ़ा था। अब खुद बागी खेमे में खड़े होने के बाद सायोनी को अपने उन्हीं बयानों के चलते भारी राजनीतिक विरोध और तीखी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।
राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि सायोनी घोष के इस अप्रत्याशित कदम के पीछे गहरी रणनीतिक और व्यक्तिगत असुरक्षा की भावनाएं छिपी हुई हैं। राजनीति की मुख्यधारा में प्रवेश करने से पहले, साल 2015 में किए गए उनके एक पुराने ट्वीट को लेकर भारी विवाद खड़ा हुआ था, जिसमें उन्होंने हिंदू पौराणिक कथाओं और पवित्र शिवलिंग पर कथित रूप से आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। हालिया चुनावों के दौरान विपक्षी दलों, विशेषकर भाजपा द्वारा इस मुद्दे को बेहद आक्रामक ढंग से उठाया गया था, जिसके बाद सोशल मीडिया पर उन्हें व्यापक स्तर पर ट्रोलिंग का शिकार होना पड़ा था। चुनावों में विपरीत परिस्थितियों और लगातार मिल रही धमकियों के बीच सायोनी घोष ने खुद को पार्टी के भीतर अलग-थलग पाया। हालांकि उस समय महुआ मोइत्रा जैसी नेताओं ने उनके पक्ष में बयानबाजी जरूर की थी, लेकिन सांगठनिक स्तर पर पार्टी आलाकमान की रहस्यमयी चुप्पी ने सायोनी को गहरे संशय में डाल दिया था।
संसदीय नियमों और कानूनी पहलुओं के दृष्टिकोण से देखें तो लोकसभा में एक अलग गुट के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए दलबदल विरोधी कानून के तहत निर्धारित संख्या बल और औपचारिक प्रक्रियाओं का पालन करना अनिवार्य होता है। काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई वाले इस 19 सदस्यीय गुट ने कानूनी पेचीदगियों से बचने के लिए ही सामूहिक रूप से हस्ताक्षर युक्त पत्र लोकसभा अध्यक्ष को प्रेषित किया है। इस पूरे सियासी घटनाक्रम और ममता बनर्जी का साथ छोड़ने के फैसले के बाद सायोनी घोष पर भी अब 'राजनीतिक अवसरवादिता' और 'गद्दारी' के गंभीर आरोप लग रहे हैं, जिसके कारण उन्होंने वर्तमान में सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों से पूरी तरह से दूरी बना ली है। राजनीतिक हलकों में यह साफ तौर पर चर्चा है कि चुनावों के बाद जिस तेजी से तृणमूल कांग्रेस के भीतर संगठनात्मक बिखराव हुआ है, उसे देखते हुए जादवपुर की इस नवनिर्वाचित सांसद ने बागी खेमे के साथ जाना ही अपने राजनीतिक भविष्य के लिए सबसे अधिक सुरक्षित और व्यावहारिक विकल्प समझा है। बहरहाल, ममता बनर्जी के इस मजबूत गढ़ में लगी यह सेंध आगामी दिनों में पश्चिम बंगाल की पूरी राजनीतिक दिशा और दशा को बदलने का सामर्थ्य रखती है।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
