क्या टूट जाएगी AAP? राघव चड्ढा समेत कई सांसद देंगे इस्तीफा, BJP में शामिल होने का किया ऐलान
राघव चड्ढा ने AAP से इस्तीफा देकर BJP में शामिल होने का ऐलान किया है, साथ ही राज्यसभा में दो-तिहाई सांसदों के संभावित विलय की खबरों से राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। एंटी-डिफेक्शन कानून के तहत यह घटनाक्रम संसद की ताकत और AAP के भविष्य पर बड़ा असर डाल सकता है।

पूर्व AAP सांसद राघव चड्ढा
भारतीय राजनीति में एक बड़ा और अप्रत्याशित घटनाक्रम सामने आया है, जिसने आम आदमी पार्टी (AAP) की आंतरिक स्थिति और संसद में उसकी ताकत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने AAP से इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने का ऐलान किया है। उनके साथ दो अन्य राज्यसभा सांसद संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने भी पार्टी छोड़ने का फैसला किया है, जिससे यह घटनाक्रम केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि एक व्यापक राजनीतिक पुनर्संरचना का संकेत देता है।
अपने फैसले को स्पष्ट करते हुए राघव चड्ढा ने AAP पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि पार्टी अपने मूल सिद्धांतों से भटक चुकी है। “पुराने AAP अब वही AAP नहीं रही,” उन्होंने कहा और पार्टी को “भ्रष्ट और समझौता कर चुकी” करार दिया। उन्होंने यह भी जोड़ा कि “मैं गलत पार्टी में सही व्यक्ति था,” जिससे यह स्पष्ट होता है कि उनके और पार्टी नेतृत्व के बीच लंबे समय से असहमति बनी हुई थी।
इस घटनाक्रम को और अधिक गंभीर बनाता है वह दावा, जिसमें चड्ढा ने कहा कि AAP के राज्यसभा सांसदों का दो-तिहाई हिस्सा BJP में शामिल हो सकता है। हालांकि अभी तक केवल तीन सांसदों के इस्तीफे की पुष्टि हुई है, लेकिन रिपोर्ट्स के अनुसार लगभग सात सांसद जो कुल संख्या का दो-तिहाई हैं, इस राजनीतिक बदलाव का समर्थन कर सकते हैं। इनमें अशोक मित्तल, संदीप पाठक, पूर्व क्रिकेटर हरभजन सिंह और राजिंदर गुप्ता जैसे नाम शामिल बताए जा रहे हैं। यदि यह संख्या पूरी होती है, तो यह AAP के लिए संसद में एक बड़ा झटका साबित होगा।
इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में पार्टी के भीतर लंबे समय से चल रहे मतभेद भी सामने आए हैं। अप्रैल 2026 में AAP ने राघव चड्ढा को राज्यसभा में डिप्टी लीडर पद से हटा दिया था, जिसे इस टकराव का सार्वजनिक संकेत माना गया। पार्टी नेतृत्व और चड्ढा के बीच बढ़ती दूरी, महत्वपूर्ण बैठकों और गतिविधियों से उनकी अनुपस्थिति, और प्रमुख राजनीतिक मुद्दों पर उनकी चुप्पी को लेकर असंतोष लगातार बढ़ रहा था। रिपोर्ट्स के अनुसार, पार्टी के कई नेताओं को यह भी महसूस हुआ कि चड्ढा BJP के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाने से बच रहे थे।
इस राजनीतिक घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू भी है, जो भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची यानी एंटी-डिफेक्शन कानून से जुड़ा है। 1985 में लागू इस कानून का उद्देश्य दल-बदल की राजनीति को रोकना था। इसके तहत यदि कोई सांसद स्वेच्छा से अपनी पार्टी छोड़ता है या पार्टी के निर्देशों के खिलाफ जाता है, तो उसकी सदस्यता समाप्त हो सकती है। हालांकि, इसमें एक महत्वपूर्ण अपवाद भी है यदि किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सांसद एक साथ किसी अन्य पार्टी में विलय का निर्णय लेते हैं, तो उन्हें अयोग्यता से छूट मिल सकती है।
राघव चड्ढा और उनके सहयोगियों के लिए यही ‘दो-तिहाई नियम’ सबसे अहम साबित हो सकता है। AAP के राज्यसभा में कुल 10 सांसद हैं, ऐसे में कम से कम 7 सांसदों का एक साथ BJP में जाना जरूरी होगा, ताकि वे अपनी सदस्यता बनाए रख सकें। यदि यह संख्या पूरी नहीं होती, तो उन्हें तत्काल अयोग्यता का सामना करना पड़ सकता है। इस पूरे मामले में अंतिम निर्णय राज्यसभा के सभापति के पास होगा, हालांकि उनके फैसले को न्यायिक समीक्षा के तहत सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
इस घटनाक्रम ने न केवल AAP के भीतर गहरे संकट को उजागर किया है, बल्कि भारतीय राजनीति में दल-बदल और रणनीतिक गठजोड़ की नई संभावनाओं को भी सामने रखा है। यदि चड्ढा अपने दावे के अनुसार दो-तिहाई सांसदों का समर्थन जुटाने में सफल होते हैं, तो यह केवल एक पार्टी के लिए झटका नहीं बल्कि संसद की शक्ति संतुलन में भी बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह कदम एक व्यक्तिगत निर्णय था या एक संगठित राजनीतिक पुनर्गठन की शुरुआत।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
