नई दिल्ली/वॉशिंगटन। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति, स्थिरता और समावेशी विकास की वकालत करने वाले चार प्रमुख लोकतांत्रिक देशों के समूह 'क्वाड' का भविष्य एक बार फिर अनिश्चितता के भंवर में फंस गया है। भारत की मेजबानी में आयोजित होने वाले आगामी क्वाड शिखर सम्मेलन को लेकर छाई धुंध छंटने का नाम नहीं ले रही है। ताज़ा रणनीतिक घटनाक्रम और राजनयिक सूत्रों के हवाले से आ रही खबरें संकेत दे रही हैं कि इस साल भी राष्ट्राध्यक्षों के स्तर की यह बड़ी बैठक टल सकती है। विडंबना यह है कि पिछले साल भी इस सम्मेलन का आयोजन नहीं हो सका था और अब लगातार दूसरे साल इस महत्वपूर्ण रणनीतिक मंच की सक्रियता पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

वर्तमान गतिरोध के केंद्र में अमेरिका की क्वाड के प्रति दिख रही बेरुखी को माना जा रहा है। वॉशिंगटन से मिल रहे संकेतों के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की नई और आक्रामक विदेश नीतियों के चलते क्वाड की प्राथमिकताओं में बदलाव आया है। यही कारण है कि भारत ने अब तक समूह के तीन अन्य सदस्य देशों—अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान—के शीर्ष नेताओं को कोई औपचारिक न्योता नहीं भेजा है। द प्रिंट की एक विस्तृत रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज़ या जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची को आमंत्रित करने की प्रक्रिया को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है। भारत को इसकी अध्यक्षता 2025 में ही करनी थी, लेकिन वैश्विक परिस्थितियों और ट्रंप प्रशासन के रुख को देखते हुए इसे 2026 तक खींचा गया, जहाँ अब भी संभावनाएं क्षीण नज़र आ रही हैं।

क्वाड, जिसे औपचारिक रूप से 'चतुर्भुज सुरक्षा संवाद' कहा जाता है, का गठन 2007 में तत्कालीन जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे की पहल पर हुआ था। हालांकि यह एक अनौपचारिक रणनीतिक मंच है, लेकिन इसकी महत्ता इस बात से समझी जा सकती है कि चीन इसे अपने खिलाफ बना एक सैन्य गठबंधन और 'एशियाई नाटो' करार देता रहा है। 2008 के बाद लंबे समय तक निष्क्रिय रहने वाले इस समूह को स्वयं डोनाल्ड ट्रंप ने ही अपने पहले कार्यकाल के दौरान 2017 में पुनर्जीवित किया था। बाद में जो बाइडेन के कार्यकाल में इसे राष्ट्राध्यक्षों के स्तर तक पहुँचाया गया, जिससे इस समूह की वैश्विक साख में भारी वृद्धि हुई थी। अब जब ट्रंप पुनः सत्ता में हैं, तो उनके द्वारा पूर्व में सक्रिय किए गए इस मंच के प्रति वर्तमान उदासीनता रणनीतिक विशेषज्ञों को चौंका रही है।

हालांकि, राष्ट्राध्यक्षों के स्तर पर बैठक न होने का यह अर्थ कदापि नहीं है कि क्वाड पूरी तरह से निष्क्रिय हो गया है। कूटनीतिक हलकों में चर्चा है कि विदेश मंत्रियों के स्तर पर संवाद का सिलसिला जारी है। पिछले साल अमेरिका ने दो बार विदेश मंत्रियों की बैठकें आयोजित की थीं और संभावना जताई जा रही है कि अगली बैठक मई 2026 के अंत में भारत में हो सकती है। इसके लिए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के 26 मई के आसपास भारत दौरे की अटकलें लगाई जा रही हैं। भारत ने भी अब तक क्वाड को लेकर कोई नकारात्मक टिप्पणी नहीं की है और न ही कोई आधिकारिक बयान जारी किया है, जिससे स्पष्ट है कि नई दिल्ली अभी भी अमेरिका की ओर से किसी ठोस दिलचस्पी के इंतजार में है।

क्वाड की इस सुस्ती का सीधा असर ऑस्ट्रेलिया पर पड़ रहा है, जिसकी अध्यक्षता की बारी भारत के बाद आनी है। जैसे-जैसे भारत की मेजबानी का समय खिंच रहा है, ऑस्ट्रेलिया का इंतजार भी लंबा होता जा रहा है। रणनीतिक रूप से यह देरी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभुत्व को चुनौती देने के वैश्विक प्रयासों को कमजोर कर सकती है। यदि यह शिखर सम्मेलन इस साल भी रद्द होता है, तो यह क्वाड की प्रासंगिकता और सदस्य देशों के बीच के तालमेल पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा देगा। अंततः, इस रणनीतिक अवरोध का समाधान केवल वॉशिंगटन की मंशा और भारत के कूटनीतिक कौशल पर निर्भर करता है, जो आने वाले महीनों में वैश्विक पटल पर स्पष्ट होगा।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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