नई दिल्ली:

केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) के प्रशासनिक ढांचे में बड़े बदलाव लाने वाला 'केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक, 2026' बुधवार, 25 मार्च को राज्यसभा में पेश होने की संभावना है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, इस महत्वपूर्ण विधेयक पर चर्चा के लिए उच्च सदन में 8 घंटे का समय आवंटित किया गया है। हालांकि, यह बिल पहले 23 मार्च को सूचीबद्ध था, लेकिन विपक्षी दलों के विरोध और प्रक्रियात्मक कारणों से इसे टाल दिया गया था।

विवाद की जड़: पदों का आरक्षण और IPS प्रतिनियुक्ति

इस विधेयक का सबसे विवादास्पद हिस्सा उच्च पदों पर IPS (भारतीय पुलिस सेवा) अधिकारियों की नियुक्ति से जुड़ा है। बिल के प्रस्तावों के अनुसार:

  • आईजी (Inspector General): कुल पदों का 50% हिस्सा IPS अधिकारियों के लिए आरक्षित होगा।
  • अतिरिक्त महानिदेशक (ADG): कम से कम 67% पदों पर IPS अधिकारी तैनात होंगे।
  • विशेष महानिदेशक और महानिदेशक (SDG & DG): इन रैंक के सभी 100% पद केवल IPS अधिकारियों द्वारा प्रतिनियुक्ति (Deputation) के माध्यम से भरे जाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अनदेखी का आरोप

रिटायर CAPF अधिकारियों और संगठनों ने इस बिल का कड़ा विरोध किया है। उनका तर्क है कि यह विधेयक 23 मई, 2025 को आए सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले के खिलाफ है, जिसमें अदालत ने CAPF अधिकारियों को 'ऑर्गेनाइज्ड ग्रुप ए सर्विस' (OGAS) का दर्जा दिया था। अदालत ने सरकार को निर्देश दिया था कि अगले दो वर्षों में आईजी रैंक तक IPS अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति को धीरे-धीरे कम किया जाए। अधिकारियों का कहना है कि नया बिल अदालत के आदेश के ठीक उलट काम कर रहा है।

पदोन्नति में देरी और करियर का संकट

CAPF कैडर के लगभग 13,000 अधिकारी, जो CRPF, BSF, ITBP, SSB और CISF जैसे बलों में तैनात हैं, लंबे समय से करियर में ठहराव (Stagnation) का सामना कर रहे हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि:

  • एक असिस्टेंट कमांडेंट के रूप में भर्ती होने वाले अधिकारी को अपनी पहली पदोन्नति (Promotion) पाने में ही 15 से 18 साल का समय लग जाता है।
  • वरिष्ठ पदों पर IPS अधिकारियों के वर्चस्व के कारण कैडर के अधिकारियों के लिए शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचने के रास्ते लगभग बंद हो जाते हैं।
  • रिटायर अधिकारियों का कहना है कि 10 साल की लंबी कानूनी लड़ाई जीतने के बाद भी सरकार उनके साथ भेदभाव कर रही है।

संसद में विपक्ष का कड़ा रुख

विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की पूरी तैयारी कर ली है। 23 मार्च को तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सदस्य डेरेक ओ'ब्रायन ने शून्यकाल के दौरान यह मुद्दा उठाया था कि सदस्यों को बिल पेश करने के लिए अनिवार्य 48 घंटे का अग्रिम नोटिस नहीं दिया गया। विरोध स्वरूप TMC सदस्यों ने सदन से वॉकआउट भी किया था।

कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल के कई सांसदों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इस बिल का विरोध किया है। विपक्ष का तर्क है कि यह बिल उन जवानों और अधिकारियों के मनोबल को तोड़ेगा जो सीमाओं पर और आंतरिक सुरक्षा में अपनी जान जोखिम में डालते हैं।

गृह मंत्रालय की भूमिका

उल्लेखनीय है कि गृह मंत्रालय ही CAPF और IPS दोनों का 'कैडर कंट्रोलिंग अथॉरिटी' है। आलोचकों का मानना है कि मंत्रालय IPS अधिकारियों के हितों की रक्षा के लिए CAPF कैडर के संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी कर रहा है।


आज राज्यसभा में होने वाली 8 घंटे की चर्चा बेहद महत्वपूर्ण होगी। जहां सरकार इसे प्रशासनिक सुधार के रूप में देख रही है, वहीं CAPF के जवान और अधिकारी इसे अपने हक की लड़ाई मान रहे हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार विपक्ष और अधिकारियों की आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए बिल में कोई संशोधन करती है या नहीं।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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