नई दिल्ली: देश में छात्र आंदोलनों और शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। इसी बीच शिवसेना (यूबीटी) की नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने वर्ष 1990 के मंडल विरोध आंदोलन को याद करते हुए उस दौर के छात्र प्रदर्शनों, उनके सामाजिक प्रभाव और भारतीय राजनीति पर पड़े असर का उल्लेख किया है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें 1990 के एंटी-मंडल आंदोलन की घटनाओं और उसके बाद देश में हुए बदलावों का जिक्र किया गया है।

प्रियंका चतुर्वेदी ने अपने पोस्ट में लिखा कि वर्ष 1990 के मंडल विरोध प्रदर्शनों के दौरान देशभर में बड़े पैमाने पर छात्र आंदोलन हुए थे। उन्होंने कहा कि उस समय हुए प्रदर्शनों में 60 छात्रों की मौत हुई थी और 200 से अधिक छात्रों ने आत्मदाह का प्रयास किया था। उनके अनुसार यह आंदोलन भारतीय छात्र राजनीति और शिक्षा व्यवस्था के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय बन गया।

वीडियो में प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि 1990 का एंटी-मंडल आंदोलन भारत के छात्र आंदोलनों के इतिहास का एक बड़ा मोड़ था। उन्होंने बताया कि उस समय देशभर के अनेक कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्र विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे। उनके अनुसार इस आंदोलन ने युवाओं के शिक्षा, अवसर और सरकारी नीतियों को देखने के नजरिए पर गहरा प्रभाव डाला।

उन्होंने अपने परिवार से जुड़ा एक व्यक्तिगत अनुभव भी साझा किया। प्रियंका चतुर्वेदी ने बताया कि उस समय उनके पति भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) दिल्ली में पढ़ाई कर रहे थे। उन्होंने कहा कि उनके पति भी उस आंदोलन में शामिल हुए थे और इसी दौरान उन्हें हिरासत में लिया गया था। उन्होंने इस घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि उस दौर में छात्र आंदोलन व्यापक स्तर पर फैल चुके थे और कई शिक्षण संस्थान विरोध प्रदर्शनों का केंद्र बन गए थे।

प्रियंका चतुर्वेदी ने वीडियो में वर्ष 1990 की राजनीतिक पृष्ठभूमि का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि 7 अगस्त 1990 को तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा की थी। इस निर्णय के तहत केंद्र सरकार की नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू किया गया।

उन्होंने कहा कि इस फैसले के बाद देशभर में व्यापक बहस शुरू हो गई थी। एक पक्ष ने इसे सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना, जबकि दूसरे पक्ष ने इसका विरोध करते हुए इसे योग्यता आधारित अवसरों पर प्रभाव डालने वाला निर्णय बताया। उनके अनुसार इसी मुद्दे ने उस समय देश को अलग-अलग विचारधाराओं में बांट दिया था।

प्रियंका चतुर्वेदी ने मंडल आयोग के गठन का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 1979 में तत्कालीन जनता पार्टी सरकार ने बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में मंडल आयोग का गठन किया था। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में देश की ओबीसी आबादी का अनुमान लगभग 52 प्रतिशत बताया था और उनके लिए सरकारी सेवाओं तथा शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण की सिफारिश की थी।

उन्होंने कहा कि जैसे ही इन सिफारिशों को लागू करने की घोषणा हुई, देश के कई हिस्सों में छात्र विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। विशेष रूप से उत्तर भारत के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में आंदोलन तेज हो गया। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि इससे योग्यता आधारित अवसर प्रभावित होंगे, जबकि सरकार और आरक्षण समर्थकों ने इसे सामाजिक प्रतिनिधित्व और समान अवसर सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।

प्रियंका चतुर्वेदी ने सितंबर 1990 की एक प्रमुख घटना का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि दिल्ली में 20 वर्षीय छात्र राजीव गोस्वामी ने आत्मदाह का प्रयास किया था। यह घटना उस समय राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी थी। उन्होंने कहा कि इसके बाद देश के विभिन्न हिस्सों में 200 से अधिक छात्रों ने आत्मदाह का प्रयास किया और इनमें 60 छात्रों की जलने से मौत हुई। उनके अनुसार यह दौर युवाओं और सरकार के बीच गंभीर टकराव के रूप में दर्ज हुआ।

उन्होंने आगे बताया कि यह मामला अंततः सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा। प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि वर्ष 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को बरकरार रखा। साथ ही अदालत ने 'क्रीमी लेयर' का सिद्धांत लागू करते हुए आर्थिक रूप से संपन्न वर्गों को आरक्षण के लाभ से बाहर रखने का प्रावधान भी जोड़ा।

अपने वीडियो में प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि मंडल आंदोलन ने भारतीय राजनीति की दिशा पर भी गहरा प्रभाव डाला। उनके अनुसार इस आंदोलन के बाद देश में पहचान आधारित राजनीति को नई मजबूती मिली और सामाजिक न्याय तथा आरक्षण जैसे मुद्दे लंबे समय तक राजनीतिक विमर्श के केंद्र में बने रहे।

उन्होंने मौजूदा छात्र आंदोलनों का भी जिक्र किया। प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि देश के विश्वविद्यालय और कॉलेज लंबे समय से युवाओं की आवाज उठाने का मंच रहे हैं। उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में भी विभिन्न मुद्दों को लेकर छात्र लगातार अपनी बात लोकतांत्रिक तरीके से रखते रहे हैं। उन्होंने वर्तमान छात्र आंदोलनों का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा व्यवस्था, पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही जैसे विषय आज भी युवाओं के लिए महत्वपूर्ण बने हुए हैं।

अपने संदेश के अंत में प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि 1990 का मंडल आंदोलन केवल एक राजनीतिक घटना नहीं था, बल्कि यह भारतीय छात्र आंदोलनों, शिक्षा व्यवस्था और लोकतांत्रिक विमर्श के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। उन्होंने कहा कि समय बदलने के बावजूद छात्र परिसर आज भी देश में विचार-विमर्श, संवाद और लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के प्रमुख केंद्र बने हुए हैं।

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Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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