नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश कैडर के चर्चित भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी अजय पाल शर्मा की पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में बतौर पर्यवेक्षक नियुक्ति अब कानूनी विवादों के घेरे में आ गई है। अपनी सख्त कार्यशैली के लिए 'सिंघम' के नाम से पहचाने जाने वाले इस अधिकारी के खिलाफ देश की सर्वोच्च अदालत में एक याचिका दायर की गई है। इस याचिका में चुनाव आयोग द्वारा उन्हें दी गई जिम्मेदारी को तुरंत रद्द करने की मांग की गई है, जिससे प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है।

मामले की जड़ एक वायरल वीडियो बताया जा रहा है, जिसमें अजय पाल शर्मा कथित तौर पर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के एक प्रत्याशी को समझाते हुए नजर आए थे। इस घटना के बाद से ही उन पर पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने के आरोप लगने शुरू हो गए थे। अब यह विवाद सुप्रीम कोर्ट की दहलीज तक जा पहुंचा है, जहां उनके आचरण को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया है कि आईपीएस अधिकारी का व्यवहार एक तटस्थ चुनाव पर्यवेक्षक की गरिमा और जिम्मेदारियों के विपरीत है।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित याचिका में जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धाराओं और संवैधानिक मूल्यों का हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त 'पर्यवेक्षक' एक ऐसी संस्थागत सुरक्षा कवच की तरह होता है, जिसका मुख्य कार्य चुनावों के पारदर्शी और भयमुक्त संचालन को सुनिश्चित करना है। पर्यवेक्षक की उपस्थिति का उद्देश्य ही जनता के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति विश्वास को मजबूत करना होता है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि अजय पाल शर्मा राजनीतिक उम्मीदवारों को कथित तौर पर धमका रहे हैं और उनका रवैया पूरी तरह से एकपक्षीय है, जो निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।

कानूनी पक्ष की बात करें तो याचिका में चुनाव आयोग के उस आदेश को सीधे तौर पर चुनौती दी गई है जिसके तहत उन्हें पश्चिम बंगाल में चुनाव पर्यवेक्षक नियुक्त किया गया था। याचिका में कहा गया है कि यदि ऐसे विवादित अधिकारी को चुनावी प्रक्रिया की निगरानी का जिम्मा सौंपा जाता है, तो इससे चुनाव की पवित्रता भंग होने का खतरा है। यह मामला इसलिए भी संवेदनशील हो जाता है क्योंकि पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान अक्सर हिंसा और प्रशासनिक पक्षपात की खबरें आती रहती हैं, ऐसे में केंद्रीय पर्यवेक्षकों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर क्या रुख अपनाया है, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। आईपीएस अजय पाल शर्मा का ट्रैक रिकॉर्ड उत्तर प्रदेश में कई महत्वपूर्ण ऑपरेशनों और मुठभेड़ों से भरा रहा है, जिससे उनकी छवि एक दबंग पुलिस अधिकारी की बनी है। हालांकि, चुनाव जैसे लोकतांत्रिक उत्सव में 'दबंगई' के बजाय 'धैर्य और तटस्थता' को प्रधानता दी जाती है। यदि अदालत इस याचिका पर कड़ा रुख अपनाती है, तो यह न केवल अजय पाल शर्मा के लिए बल्कि चुनाव आयोग के चयन मानकों के लिए भी एक बड़ा संदेश होगा। इस घटनाक्रम ने बंगाल की चुनावी तपिश को और अधिक बढ़ा दिया है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

Next Story