यूरोपीय संघ और पाकिस्तान के बीच हुई रणनीतिक वार्ता के बाद जारी साझा बयान में जम्मू-कश्मीर का उल्लेख होने से भारत के राजनयिक हलकों में चिंता बढ़ गई है।

यूरोपीय कमीशन की उपाध्यक्ष काजा कल्लास की इस्लामाबाद यात्रा के बाद भारत और यूरोपीय संघ के बीच कूटनीतिक तल्खी बढ़ने के आसार नजर आ रहे हैं। पाकिस्तान और यूरोपीय यूनियन के बीच आयोजित रणनीतिक वार्ता के समापन पर जारी एक साझा दस्तावेज ने नई दिल्ली के राजनीतिक रणनीतिकारों को सतर्क कर दिया है। इस्लामाबाद में संपन्न हुई इस द्विपक्षीय बैठक के बाद सामने आए आधिकारिक घोषणापत्र में खुले तौर पर जम्मू-कश्मीर के संवेदनशील भू-भाग का संदर्भ शामिल किया गया है। कूटनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि इस बार साझा वक्तव्य की रूपरेखा तय करने में जिस विशेष शब्दावली का प्रयोग किया गया है, वह सीधे तौर पर भारत की संप्रभुता और उसके स्थापित भू-राजनीतिक सिद्धांतों को चुनौती देने वाली है, जिससे सीमा पार के सियासी गलियारों में एक नई बहस छिड़ गई है।

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत यूरोपीय आयोग की वरिष्ठ राजनयिक काजा कल्लास के उस समय के उच्च-स्तरीय आधिकारिक दौरों से हुई, जब उन्होंने इस्लामाबाद में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और देश के सैन्य प्रतिष्ठान के प्रमुख आर्मी चीफ जनरल सैयद असीम मुनीर से बंद कमरों में लंबी मंत्रणा की। इस कूटनीतिक यात्रा का मुख्य उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच रणनीतिक संबंधों को प्रगाढ़ बनाना बताया जा रहा था। इसके बाद, सोमवार को काजा कल्लास और पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार ने आधिकारिक स्तर की रणनीति वार्ता की सह-अध्यक्षता की। इस वार्ता के समापन पर जारी किए गए विस्तृत संयुक्त बयान के ग्यारहवें बिंदु में जम्मू-कश्मीर का जो ब्यौरा दर्ज किया गया है, उसने भारतीय कूटनीतिक हलकों में गंभीर आपत्तिजनक स्थिति पैदा कर दी है।

विवादित दस्तावेज़ के संबंधित पैराग्राफ में लिखा गया है कि पाकिस्तानी पक्ष ने यूरोपीय प्रतिनिधिमंडल को जम्मू और कश्मीर के मुद्दे पर जमीनी वास्तविकताओं से अवगत कराया, जिसके जवाब में यूरोपीय संघ के पक्ष ने यूक्रेन के खिलाफ जारी रूसी सैन्य अभियान के संदर्भ में अपनी बात रखी। बयान में आगे कहा गया कि दोनों ही पक्ष संयुक्त राष्ट्र चार्टर के मूलभूत सिद्धांतों के अनुरूप, आपसी संवाद, कूटनीति और शांतिपूर्ण तरीकों से इन संघर्षों के समाधान का पुरजोर समर्थन करते हैं। अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों ने इस भाषा को भारतीय विदेश नीति के दृष्टिकोण से बेहद चिंताजनक करार दिया है। उनका तर्क है कि किसी तीसरे पक्ष के साथ मिलकर इस प्रकार का वक्तव्य जारी करके यूरोपीय संघ अनजाने में या जानबूझकर कश्मीर को एक वैश्विक और अनसुलझा क्षेत्रीय मुद्दा स्वीकार कर रहा है, जो कि पूरी तरह से पाकिस्तान के पुराने कूटनीतिक एजेंडे का हिस्सा है।

इस विवाद का सबसे संवेदनशील और कानूनी रूप से आपत्तिजनक पहलू यह है कि इसमें यूरोपीय संघ ने अप्रत्यक्ष रूप से पूर्वी यूरोप के पूर्ण-स्तरीय सैन्य युद्ध यानी यूक्रेन संकट और जम्मू-कश्मीर की आंतरिक स्थिति को एक ही पलड़े पर लाकर खड़ा कर दिया है। इस कूटनीतिक समानता को स्थापित करने का सीधा अर्थ यह निकलता है कि यूरोपीय संघ जम्मू-कश्मीर को एक सक्रिय वैश्विक संघर्ष क्षेत्र के रूप में मान्यता दे रहा है। भारत सरकार का इस विषय पर दशकों से अत्यंत स्पष्ट और दृढ़ रुख रहा है कि संपूर्ण जम्मू और कश्मीर, जिसमें पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला हिस्सा यानी पीओके भी शामिल है, भारत गणराज्य का एक अविभाज्य और आंतरिक अंग है। भारत हमेशा से ही इस मुद्दे पर किसी भी तीसरे देश, अंतरराष्ट्रीय संगठन या मध्यस्थ की भूमिका को सिरे से खारिज करता आया है।

इसके अलावा, अपनी इस यात्रा के दौरान काजा कल्लास ने पाकिस्तान की क्षेत्रीय भूमिका को लेकर भी बड़े बयान दिए हैं, जो दक्षिण एशियाई शक्ति संतुलन के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने इस्लामाबाद को एक प्रमुख क्षेत्रीय शक्ति और यूरोपीय संघ का एक अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार बताते हुए सोशल मीडिया पर इसकी जमकर सराहना की। इतना ही नहीं, उन्होंने रावलपिंडी स्थित पाकिस्तानी सेना के जनरल मुख्यालय (GHQ) का भी दौरा किया, जहां सैन्य कमांडर के साथ सुरक्षा और सामरिक मुद्दों पर लंबी चर्चा हुई। कल्लास द्वारा वैश्विक कूटनीति में पाकिस्तान की भूमिका की प्रशंसा करने से भारत की चिंताएं और अधिक न्यायसंगत प्रतीत होती हैं, क्योंकि यह कदम पाकिस्तान की धूमिल अंतरराष्ट्रीय छवि को चमकाने का काम करता है।

वैधानिक और आधिकारिक नियमों के अनुसार, भारत इस तरह के किसी भी साझा बयान को अपने आंतरिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप मानता रहा है। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि यूरोपीय संघ द्वारा इस तरह की शब्दावली को स्वीकार करना भारत के साथ उसके मजबूत आर्थिक और रणनीतिक संबंधों की दिशा के प्रतिकूल है। आगामी दिनों में भारत के विदेश मंत्रालय द्वारा इस संयुक्त बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दिए जाने की पूरी संभावना जताई जा रही है। दक्षिण एशिया के इस महत्वपूर्ण घटनाक्रम के बाद अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि नई दिल्ली इस कूटनीतिक हिमाकत का जवाब किस प्रकार देती है और आने वाले समय में भारत-यूरोपीय संघ के व्यापारिक समझौतों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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