बाबासाहेब के सपनों का भारत और'एक देश एक चुनाव' की चुनौती- ओएनओई पर छिड़ी नई बहस।
ओएनओई प्रस्ताव से प्रशासनिक दक्षता बढ़ने का दावा, लेकिन विशेषज्ञों ने संविधान की बुनियादी संरचना और राज्यों की विधायी स्वतंत्रता पर जताई गंभीर चिंता।

भारत में एक देश एक चुनाव के प्रस्ताव पर चर्चा के बीच मतदान की महत्ता रेखांकित करता एक प्रतीकात्मक चित्रण।
'एक देश एक चुनाव' और संवैधानिक मर्यादा: सुधार या संघीय ढांचे के लिए जोखिम?
भारत जैसे विविधतापूर्ण और विशाल लोकतांत्रिक राष्ट्र में 'एक देश एक चुनाव' (ONOE) का विचार केवल एक प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि एक गहरे संवैधानिक मंथन का विषय बन चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस एजेंडे को 'अधूरा कार्य' बताए जाने और पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की समिति द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट ने इस विमर्श को निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है। जहां सरकार इसे सुशासन, लागत में कमी और विकास की निरंतरता के रूप में प्रस्तुत कर रही है, वहीं संविधान विशेषज्ञ और विपक्षी दल इसे भारतीय संघवाद की नींव पर प्रहार मान रहे हैं।
संविधान के शिल्पकार डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने स्पष्ट किया था कि भारत का संविधान प्रकृति में संघीय है, जहाँ राज्य केंद्र के एजेंट मात्र नहीं हैं। संविधान सभा में उनके शब्द आज भी प्रासंगिक हैं कि राज्यों की अपनी स्वतंत्र सत्ता और संवैधानिक पहचान है। वर्तमान में प्रस्तावित संविधान (129वां संशोधन) विधेयक 2024 के माध्यम से लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने की तैयारी है। इसके लिए कई राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल को समय से पूर्व समाप्त करने या विस्तार देने की आवश्यकता होगी, जो सीधे तौर पर अनुच्छेद 172 का उल्लंघन प्रतीत होता है। यह अनुच्छेद प्रत्येक राज्य विधानसभा को पांच वर्ष का स्वतंत्र कार्यकाल प्रदान करता है।
प्रशासनिक दृष्टिकोण से देखें तो निरंतर चुनावी मोड में रहने के कारण आदर्श आचार संहिता लागू होने से विकास कार्य बाधित होते हैं और सरकारी खजाने पर भारी बोझ पड़ता है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई जैसे समर्थकों का तर्क है कि ओएनओई से बुनियादी ढांचे को कोई खतरा नहीं है क्योंकि 1967 तक देश में चुनाव साथ ही होते थे। उनके अनुसार, अविश्वास प्रस्ताव जैसे लोकतांत्रिक उपकरण अभी भी सुरक्षित रहेंगे, जिससे सरकार की जवाबदेही पर कोई आंच नहीं आएगी। हालांकि, इस तर्क के विपरीत पूर्व लोकसभा महासचिव पी.डी.टी. आचारी जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि यह राज्यों की स्वायत्तता को समाप्त कर उन्हें केंद्र के अधीन कर देगा।
लोकतांत्रिक जवाबदेही के पहलू पर गौर करना भी आवश्यक है। भारत में बार-बार होने वाले चुनाव नेताओं को जनता के बीच जाने और जमीनी मुद्दों से जुड़ने के लिए विवश करते हैं। यदि सभी चुनाव एक साथ होते हैं, तो स्थानीय और क्षेत्रीय मुद्दे अक्सर राष्ट्रीय विमर्श और बड़े चेहरों की चकाचौंध में दब जाते हैं। यह न केवल क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व के लिए चुनौती है, बल्कि मतदाताओं के पास उपलब्ध विकल्पों को भी सीमित कर सकता है। अंततः, चुनाव केवल लागत और समय बचाने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र का वह संवाद है जो विविधता को जीवित रखता है। भारत की एकता इसकी एकरूपता में नहीं, बल्कि इसकी बहुलता के सामंजस्य में निहित है।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
