महाराष्ट्र सरकार ने 1 मई से चालकों के लिए मराठी भाषा की परीक्षा की अनिवार्य, उत्तर भारतीय ड्राइवरों और यूनियनों ने फैसले के खिलाफ खोला मोर्चा।

मुंबई में भाषा पर बढ़ा संग्राम: ऑटो-टैक्सी चालकों के लिए मराठी अनिवार्य, 1 मई से लागू होगा सख्त नियम

महाराष्ट्र की आर्थिक राजधानी मुंबई एक बार फिर भाषाई अस्मिता और आजीविका के संघर्ष के केंद्र में खड़ी है। राज्य सरकार के नए आदेश ने मुंबई महानगर क्षेत्र (MMR) में टैक्सी और ऑटो रिक्शा चलाने वाले लाखों ड्राइवरों के सामने अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है। परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक द्वारा घोषित इस निर्णय के अनुसार, 1 मई से सभी सार्वजनिक परिवहन चालकों के लिए मराठी भाषा में संवाद करना अनिवार्य होगा। इस आदेश का सबसे कठोर पहलू यह है कि यदि कोई चालक मराठी बोलने या समझने में सक्षम नहीं पाया जाता है, तो उसका ड्राइविंग परमिट तत्काल प्रभाव से रद्द किया जा सकता है। यह फैसला उन हजारों प्रवासियों के लिए बिजली गिरने जैसा है जो दशकों से मुंबई की सड़कों पर काली-पीली टैक्सी और ऑटो के जरिए शहर की धड़कन को जिंदा रखे हुए हैं।

इस निर्णय की पृष्ठभूमि में राजनीतिक और सांस्कृतिक तर्क दिए जा रहे हैं, लेकिन धरातल पर इसकी प्रतिक्रिया काफी तीखी है। मुंबई में ऑटो और टैक्सी चलाने वाले ड्राइवरों का एक बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से आता है। इनमें से कई चालकों का कहना है कि वे वर्षों से महाराष्ट्र में रह रहे हैं और उन्हें मराठी समझ में आती है, लेकिन धाराप्रवाह बोलना उनके लिए एक बड़ी चुनौती है। टैक्सी ड्राइवरों के बीच यह सुगबुगाहट तेज है कि यह नियम केवल भाषा प्रेम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पारंपरिक काली-पीली टैक्सी को व्यवस्था से बाहर करने की एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है। ड्राइवरों का आरोप है कि सरकार निजी कैब एग्रीगेटर्स जैसे ओला और उबर को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय टैक्सी चालकों पर इस तरह के बोझिल नियम थोप रही है।

कानूनी और संगठनात्मक दृष्टिकोण से देखें तो यूनियनों ने इस फैसले के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। मुंबई टैक्सीमैन यूनियन और मुंबई ऑटो रिक्शा-टैक्सी मेन्स यूनियन ने सरकार के इस कदम की कड़ी निंदा की है। यूनियन नेताओं का तर्क है कि यदि भाषा की अनिवार्यता इतनी ही आवश्यक थी, तो इसे परमिट देते समय ही लागू क्यों नहीं किया गया। अब, जब लोग सालों से अपनी सेवा दे रहे हैं, तब परीक्षा की शर्त रखना उनके मौलिक अधिकारों और आजीविका के अधिकार का हनन है। यूनियन के प्रतिनिधियों ने सवाल उठाया है कि यदि कोई ड्राइवर परीक्षा में असफल हो जाता है, तो उसके परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी कौन उठाएगा। यह विवाद अब केवल प्रशासनिक आदेश तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि भारत की 'विविधता में एकता' और संघीय ढांचे की अवधारणा पर भी सवाल खड़े कर रहा है।

सड़कों पर संघर्ष कर रहे ड्राइवरों का दर्द उनकी बातों में साफ झलकता है। सुलेमान खान और उजैर खान जैसे चालकों का कहना है कि वे मराठी भाषा का सम्मान करते हैं और उसे सीखना भी चाहते हैं, लेकिन उसे अनिवार्य परीक्षा के रूप में थोपना अनुचित है। उनका मानना है कि मुंबई एक वैश्विक शहर है जहां हर प्रांत के लोग बसते हैं और भाषा को विभाजन का जरिया नहीं बनाया जाना चाहिए। जैसे-जैसे 1 मई की समयसीमा नजदीक आ रही है, शहर में अनिश्चितता का माहौल गहराता जा रहा है। यदि सरकार अपने रुख पर अडिग रहती है और यूनियनें विरोध प्रदर्शन तेज करती हैं, तो आने वाले दिनों में मुंबई की परिवहन व्यवस्था ठप हो सकती है। अंततः, यह संघर्ष केवल एक भाषा के अस्तित्व का नहीं, बल्कि उन हजारों हाथों की रोटी का है जो स्टीयरिंग थामकर इस महानगर को गति देते हैं।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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