हम हिटलर नहीं, बातचीत जरूरी है, पाकिस्तान के आम लोगों के लिए धड़कता है संघ प्रमुख मोहन भागवत का दिल, दिया बड़ा बयान
आरएसएस के शताब्दी समारोह के दौरान नई दिल्ली में मंच से संगठन की नीतियों और पाकिस्तान के संदर्भ में विचार रखते संघ प्रमुख मोहन भागवत।

पीले कुर्ते में मंच पर भाषण देते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के पीछे भारत का नक्शा दिख रहा है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ संबंधों और कूटनीतिक संवाद को लेकर संगठन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और वैचारिक दृष्टिकोण सामने रखा है। आरएसएस के शताब्दी समारोह के अंतर्गत आयोजित एक विशेष संवाद सत्र को संबोधित करते हुए संघ प्रमुख ने संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारी और महासचिव दत्तात्रेय होसबाले के उस विवादित बयान का पुरजोर बचाव किया, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान के साथ संवाद का एक विकल्प खुला रखने की वकालत की थी। मोहन भागवत ने स्पष्ट और दो टूक शब्दों में कहा कि होसबाले की टिप्पणी का संदर्भ पाकिस्तान की सत्ता या राज्य के बजाय वहां के आम नागरिकों और समाज से था। इसके साथ ही उन्होंने रेखांकित किया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की किसी भी देश के बारे में कोई स्वतंत्र विदेश नीति नहीं है और संगठन इस मामले में सदैव केंद्र सरकार के आधिकारिक रुख का पूरी तरह पालन करता है।
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपनी बात को दार्शनिक और रणनीतिक गहराई देते हुए कहा कि पाकिस्तान के भीतर आज भी ऐसे कई लोग और प्रबुद्ध वर्ग मौजूद हैं, जो यह स्पष्ट रूप से मानते हैं कि वर्ष 1947 में भारत का विभाजन एक ऐतिहासिक भूल थी। उन्होंने संवाद सत्र में जानकारी दी कि पड़ोसी देश के कई पत्रकार और बुद्धिजीवी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के धरातलीय कार्यों और उसकी विचारधारा की सराहना करते हैं। वहां ऐसे नागरिकों की एक बहुत बड़ी संख्या है जो पाकिस्तान की स्थापना के आधार यानी 'दो-राष्ट्र सिद्धांत' (टू-नेशन थ्योरी) का मुखर विरोध करते हैं और सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार करते हैं कि दोनों देशों का एक साथ मिलकर रहना ही बेहतर और व्यावहारिक था।
वैचारिक सत्र के दौरान मोहन भागवत ने भविष्य की रणनीतिक संभावनाओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यदि किसी आगामी युद्ध में भारत द्वारा पाकिस्तान को पूरी तरह परास्त कर दिया जाता है, तो उसके बाद मुख्य रूप से दो ही विकल्प शेष रहेंगे। प्रथम विकल्प के तहत वहां के लोगों को भारत के भौगोलिक और सांस्कृतिक ताने-बाने में शामिल करना होगा, अथवा द्वितीय विकल्प के रूप में उन्हें उसी देश के भीतर एक शांतिपूर्ण और सह-अस्तित्व वाले समाज के रूप में रहने लायक बनाना होगा। इन दोनों ही परिस्थितियों को आकार देने के लिए संवाद और कूटनीति के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं किए जा सकते। उन्होंने इतिहास का उदाहरण देते हुए कड़े शब्दों में कहा कि भारत की प्रकृति जर्मनी के तानाशाह हिटलर जैसी नहीं है, क्योंकि अन्याय और अत्याचार को समाप्त करना हमारी संस्कृति का हिस्सा है, लेकिन समाज में जो कुछ भी सकारात्मक और श्रेष्ठ है, उसे बचाकर रखना भी हमारा परम कर्तव्य है।
उल्लेखनीय है कि इस संपूर्ण वैचारिक बहस की शुरुआत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महासचिव दत्तात्रेय होसबाले द्वारा समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए गए एक विशेष साक्षात्कार के बाद हुई थी। होसबाले ने अपने बयान में कहा था कि भारत को पाकिस्तान के साथ रणनीतिक बातचीत के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं करने चाहिए, जिसके बाद देश के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया था। अब स्वयं संघ प्रमुख ने इस पर संगठन की स्थिति स्पष्ट करते हुए विवाद को शांत करने का प्रयास किया है। रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि मोहन भागवत का यह बयान दर्शाता है कि संघ जहां एक ओर सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ केंद्र सरकार की जीरो-टॉलरेंस की नीति का समर्थन करता है, वहीं दूसरी ओर वह भविष्य के कूटनीतिक और सामाजिक विकल्पों को भी पूरी तरह खारिज नहीं करना चाहता।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
