मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहीं कांग्रेस की वरिष्ठ नेता मीनाक्षी नटराजन को उस समय बड़ा झटका लगा, जब सुप्रीम कोर्ट ने उनके नामांकन पत्र खारिज किए जाने के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि चुनाव शुरू हो जाने के बाद ऐसे विवादों का समाधान चुनाव कानून के तहत उपलब्ध वैधानिक उपायों के माध्यम से ही किया जाना चाहिए।

यह मामला उस समय सुर्खियों में आया जब 9 जून को राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन पत्रों की जांच के दौरान रिटर्निंग ऑफिसर ने मीनाक्षी नटराजन का नामांकन खारिज कर दिया। उनके खिलाफ यह आपत्ति उठाई गई थी कि उन्होंने अपने चुनावी हलफनामे यानी फॉर्म-26 में हैदराबाद की एक अदालत से जुड़े लंबित आपराधिक मामले का खुलासा नहीं किया। इसी आधार पर उनके नामांकन को अमान्य घोषित कर दिया गया।

नामांकन रद्द होने के बाद मीनाक्षी नटराजन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और इस फैसले को चुनौती दी। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत में दलील दी कि ऐसा कोई आपराधिक मामला नहीं था, जिसका खुलासा चुनावी नियमों के तहत अनिवार्य हो। उन्होंने कहा कि संबंधित मामले में अदालत ने केवल प्री-कॉग्निजेंस नोटिस जारी किया था और अभी तक किसी अपराध का संज्ञान नहीं लिया गया था। न तो आरोप तय हुए थे और न ही कोई विधिक प्रक्रिया उस स्तर तक पहुंची थी, जहां खुलासा करना आवश्यक माना जाए। इसी वजह से फॉर्म-26 के संबंधित कॉलम में “नॉट एप्लिकेबल” दर्ज किया गया था।

मीनाक्षी नटराजन ने भी सार्वजनिक रूप से कहा कि उन्हें केवल एक कानूनी नोटिस प्राप्त हुआ था और उन्होंने किसी भी अनिवार्य जानकारी को छिपाया नहीं है। उनका दावा था कि नामांकन खारिज करने का निर्णय तथ्यों और कानून की गलत व्याख्या पर आधारित है।

हालांकि, न्यायमूर्ति पी.के. मिश्रा और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि चुनावी विवादों से संबंधित कानून पूरी तरह स्थापित है और चुनाव प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद न्यायालय सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं करते। पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 329(बी) का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान अनुच्छेद 32 या अनुच्छेद 226 के तहत अदालतों से राहत मांगने के कई प्रयास पहले भी किए गए हैं, लेकिन संवैधानिक व्यवस्था को देखते हुए न्यायालयों ने ऐसे मामलों में दखल देने से परहेज किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नामांकन पत्र खारिज किए जाने जैसे विवादों को चुनाव संपन्न होने के बाद चुनाव याचिका और अन्य वैधानिक उपायों के माध्यम से चुनौती दी जा सकती है। अदालत ने इस बात पर कोई टिप्पणी नहीं की कि नामांकन रद्द किया जाना सही था या गलत। उसका निर्णय केवल इस आधार पर था कि चुनावी प्रक्रिया जारी रहने के दौरान न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं माना जा सकता।

इस फैसले के बाद कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। पार्टी ने नामांकन खारिज किए जाने को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए गंभीर झटका बताया और आरोप लगाया कि रिटर्निंग ऑफिसर ने मनमाने ढंग से फैसला लिया। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि एक जटिल कानूनी प्रश्न का निपटारा पर्याप्त विचार-विमर्श के बिना कर दिया गया, जिससे उनकी उम्मीदवार को चुनावी दौड़ से बाहर होना पड़ा।

राजनीतिक दृष्टि से यह फैसला कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण झटका माना जा रहा है। मध्य प्रदेश में 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव से ठीक पहले मीनाक्षी नटराजन का चुनावी मैदान से बाहर होना पार्टी की रणनीति को प्रभावित कर सकता है। वहीं यह मामला चुनावी हलफनामों में खुलासे की सीमा और उम्मीदवारों की कानूनी जिम्मेदारियों को लेकर नई बहस भी खड़ी कर रहा है।

पूरे विवाद का मूल प्रश्न यही है कि क्या केवल एक कानूनी नोटिस या प्रारंभिक न्यायिक कार्यवाही को चुनावी हलफनामे में अनिवार्य रूप से दर्ज किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील प्रश्न पर फिलहाल कोई निर्णय नहीं दिया है, लेकिन उसका यह फैसला स्पष्ट करता है कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाएं संविधान द्वारा निर्धारित हैं। ऐसे में अब इस विवाद की अगली कानूनी लड़ाई चुनावी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही संभव होगी।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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