विदेश नीति विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी का दावा है कि अमेरिकी विदेश मंत्री ने स्थापित राजनयिक परंपरा के विपरीत सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुख्य वार्ता की।

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और द्विपक्षीय दौरों के स्थापित नियमों को लेकर भारतीय राजनीतिक गलियारों में एक नया बहस छिड़ गई है। भारत यात्रा पर आए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हुई मैराथन बैठक के बाद यह विवाद गहराया है। प्रख्यात रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ और विदेश नीति के विश्लेषक ब्रह्मा चेलानी ने दावा किया है कि अमेरिकी विदेश मंत्री ने भारत पहुंचने के बाद स्थापित और सामान्य राजनयिक प्रोटोकॉल को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया। राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में आयोजित इस उच्च स्तरीय बैठक में भारत के विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) भी मौजूद थे, लेकिन बैठक के स्वरूप ने स्थापित कूटनीतिक परंपराओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

राजनयिक और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के तय नियमों के अनुसार, जब भी किसी संप्रभु राष्ट्र का विदेश मंत्री या समकक्ष अधिकारी किसी अन्य देश के आधिकारिक दौरे पर जाता है, तो कूटनीतिक शिष्टाचार की एक लंबी प्रक्रिया का पालन किया जाता है। नियमानुसार, मेहमान मंत्री सबसे पहले मेजबान देश के अपने समकक्ष यानी विदेश मंत्री के साथ प्रतिनिधिमंडल स्तर की आधिकारिक और कामकाजी बैठक करता है। इसी प्राथमिक मंच पर दोनों देशों के बीच असल रणनीतिक, आर्थिक और द्विपक्षीय मुद्दों पर गहन चर्चा होती है तथा समझौतों को अंतिम रूप दिया जाता है। इस मुख्य प्रक्रिया के संपन्न होने के बाद ही मेहमान मंत्री मेजबान देश के सरकार के प्रमुख यानी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति से एक औपचारिक शिष्टाचार भेंट करता है, जिसका उद्देश्य केवल संदेश देना और समझौतों को अंतिम संस्तुति प्रदान करना होता है।

इस स्थापित व्यवस्था के विपरीत, वर्तमान घटनाक्रम में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने कूटनीतिक प्रक्रिया को पूरी तरह उलट दिया। ब्रह्मा चेलानी के अनुसार, रूबियो ने मेजबान समकक्ष के साथ अलग से कामकाजी द्विपक्षीय वार्ता करने के बजाय सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ विस्तार से चर्चा शुरू कर दी। यह बैठक सामान्य शिष्टाचार भेंट के समय को पार करते हुए एक घंटे से भी अधिक समय तक चलती रही। हालांकि इस बैठक के दौरान भारत के विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी कक्ष में उपस्थित रहे, लेकिन कामकाजी स्तर की मुख्य वार्ता का मंच सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय के स्तर पर केंद्रित हो गया, जिसने विदेश मंत्रालय के पारंपरिक बाईपास की स्थिति उत्पन्न कर दी।

वैधानिक और आधिकारिक कूटनीतिक दृष्टिकोण से, किसी भी देश के पास अपने दौरों के दौरान बैठकों के प्रारूप को तय करने का संप्रभु अधिकार होता है, लेकिन स्थापित कूटनीतिक संहिताओं का उल्लंघन अंतरराष्ट्रीय मीडिया और विश्लेषकों के बीच चर्चा का कारण बनता है। इस उच्च स्तरीय बैठक के नीतिगत प्रभाव बेहद व्यापक माने जा रहे हैं, क्योंकि इसने यह संकेत दिया है कि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक विमर्श का स्तर अब सीधा और शीर्ष केंद्रित हो चुका है। रणनीतिक मामलों के जानकारों का मानना है कि समकालीन भू-राजनीतिक वास्तविकताओं और वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए इस बैठक के दूरगामी परिणाम सामने आएंगे, जिसने पारंपरिक औपचारिकताओं को पीछे छोड़ते हुए सीधे निर्णय लेने की प्रक्रिया को प्राथमिकता दी है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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