लैंड फॉर जॉब स्कैम: 'निजी जागीर' की तरह रेल मंत्रालय के इस्तेमाल पर लालू परिवार पर आरोप तय, शुरू होगा ऐतिहासिक ट्रायल
लैंड फॉर जॉब घोटाले में लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव समेत 46 आरोपियों पर दिल्ली की अदालत ने आरोप तय किए हैं। जज ने इसे 'क्रिमिनल एंटरप्राइज' और रेल मंत्रालय को 'निजी जागीर' बनाने वाला मामला बताया। 29 जनवरी से शुरू होगा ट्रायल। पूरी रिपोर्ट यहाँ पढ़ें।

नई दिल्ली: भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित और विवादित कानूनी मामलों में से एक, 'लैंड फॉर जॉब' (जमीन के बदले नौकरी) घोटाले में आज दिल्ली की एक विशेष अदालत ने निर्णायक कदम उठाया है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सुप्रीमो और पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक साम्राज्य पर कानूनी शिकंजा कसता नजर आ रहा है। राउज एवेन्यू कोर्ट ने शुक्रवार को भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश के तहत लालू परिवार के सदस्यों के खिलाफ औपचारिक रूप से आरोप तय कर दिए हैं, जिससे इस बहुचर्चित मामले में ट्रायल का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।
यह मामला उस समय का है जब 2004 से 2009 के बीच लालू प्रसाद यादव संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA-1) सरकार में रेल मंत्री थे। जांच एजेंसियों का आरोप है कि इस कार्यकाल के दौरान रेलवे के 'ग्रुप-डी' पदों पर नियुक्तियों के बदले उम्मीदवारों से पटना और अन्य प्रमुख स्थानों पर बेशकीमती जमीनें उपहार में या बाजार दर से बहुत कम कीमत पर ली गईं। अदालत ने आज इस पूरे प्रकरण पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि तत्कालीन रेल मंत्री ने सरकारी पद का दुरुपयोग करते हुए रेल मंत्रालय को अपनी 'निजी जागीर' की तरह इस्तेमाल किया।
विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने अपना आदेश सुनाते हुए कहा कि साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है कि लालू यादव और उनके परिवार के सदस्य एक 'क्रिमिनल एंटरप्राइज' (आपराधिक उपक्रम) की तरह काम कर रहे थे। अदालत ने माना कि सार्वजनिक रोजगार को जमीन हड़पने के सौदे के रूप में इस्तेमाल करना एक गहरी और सोची-समझी साजिश का हिस्सा था। इस मामले में सीबीआई की चार्जशीट में नामजद 98 जीवित आरोपियों में से अदालत ने लालू प्रसाद यादव, पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव, तेज प्रताप यादव, मीसा भारती और हेमा यादव समेत कुल 46 लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाने का आदेश दिया है।
कानूनी प्रक्रिया के तहत अदालत ने जहां लालू परिवार की मुश्किलों को बढ़ाया है, वहीं साक्ष्यों के अभाव में 52 अन्य आरोपियों को इस मामले से आरोप मुक्त (डिस्चार्ज) कर दिया है। सीबीआई की रिपोर्ट के अनुसार, 103 मूल आरोपियों में से 5 की मृत्यु हो चुकी है। जांच में खुलासा हुआ कि जबलपुर स्थित वेस्ट सेंट्रल रेलवे जोन सहित विभिन्न क्षेत्रों में की गई इन अवैध नियुक्तियों में नियमों की धज्जियां उड़ाई गईं। जमीन के हस्तांतरण अक्सर नकद लेनदेन के माध्यम से बेनामी संपत्तियों के रूप में किए गए थे।
लालू परिवार ने हमेशा इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है और इसे राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित बताया है। हालांकि, कोर्ट ने डिस्चार्ज की याचिकाओं को 'अनुचित' करार देते हुए ट्रायल के लिए 29 जनवरी की तारीख मुकर्रर की है। यह मामला न केवल एक परिवार की कानूनी लड़ाई है, बल्कि यह भारतीय राजनीति में शुचिता और सत्ता के दुरुपयोग के विरुद्ध एक बड़ी नजीर पेश करने की क्षमता रखता है। अब देश की नजरें 29 जनवरी पर टिकी हैं, जब इस 'जमीन के बदले नौकरी' के मायाजाल की परतें अदालत के सामने खुलेंगी।

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