नई दिल्ली। भारतीय राजनीति के क्षितिज पर एक धूमकेतु की तरह उभरी आम आदमी पार्टी आज अपने अस्तित्व के सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही है। कभी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की कोख से जन्मी इस पार्टी के भीतर मचे घमासान ने अब एक नया मोड़ ले लिया है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में शुमार और राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा के पार्टी से अलग होने के संकेतों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। यह केवल एक नेता का अलगाव नहीं है, बल्कि उस कोर टीम के बिखरने की निरंतरता है जिसने कभी 'स्वराज' का सपना देखा था।

आम आदमी पार्टी का इतिहास जितना गौरवशाली रहा है, उतनी ही चौंकाने वाली इसकी आंतरिक टूट की आवृत्ति रही है। एक युवा और ऊर्जावान संगठन के लिए इतनी कम अवधि में इतने दिग्गज चेहरों का साथ छोड़ना किसी बड़े संगठनात्मक संकट की ओर इशारा करता है। राघव चड्ढा, जो पार्टी के राष्ट्रीय विस्तार और विशेष रूप से पंजाब फतह के प्रमुख रणनीतिकार माने जाते थे, उनका अचानक हाशिए पर जाना या स्वयं को दूर कर लेना राजनीति के पंडितों के लिए शोध का विषय बन गया है। जानकारों का मानना है कि पार्टी के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया और नेतृत्व शैली में आए बदलावों ने पुराने और निष्ठावान साथियों के बीच असुरक्षा का भाव पैदा किया है।

यदि हम अतीत के पन्नों को पलटें तो यह सिलसिला साल 2015 से ही शुरू हो गया था, जब केजरीवाल ने दिल्ली में ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। पार्टी की वैचारिक नींव रखने वाले प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को जिस तरह से बाहर का रास्ता दिखाया गया, उसने पहली बार पार्टी के लोकतांत्रिक ढांचे पर सवाल उठाए थे। इसके बाद कुमार विश्वास, आशुतोष, आशीष खेतान, मयंक गांधी, अलका लांबा और कपिल मिश्रा जैसे नाम इस सूची में जुड़ते गए। इनमें से कुछ ने वैचारिक मतभेदों के कारण किनारा किया, तो कुछ केजरीवाल की कार्यशैली से क्षुब्ध थे। कुछ नेताओं का यह भी मानना था कि पार्टी में बढ़ती महत्वाकांक्षाओं के बीच उनकी अनदेखी की जा रही है।

हालिया घटनाक्रमों ने इस संकट को और अधिक गहरा दिया है। राघव चड्ढा से पहले राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल के साथ हुए विवाद और उसके बाद उभरी कड़वाहट ने पार्टी की छवि को खासा नुकसान पहुँचाया है। अब चड्ढा के संभावित निकास की खबरों ने आप के कैडर को भी असमंजस में डाल दिया है। क्या यह पार्टी के भीतर चल रही किसी बड़ी सत्ता संघर्ष का परिणाम है या फिर बाहरी दबावों के कारण नेता सुरक्षित ठिकानों की तलाश कर रहे हैं, यह सवाल अनुत्तरित है। कानूनी पेचीदगियों और जांच एजेंसियों के शिकंजे के बीच घिरी आप के लिए अपने सबसे चमकदार चेहरों को खोना आने वाले चुनावों में महंगा साबित हो सकता है।

इस पूरे प्रकरण का राजनीतिक प्रभाव अत्यंत व्यापक होने वाला है। एक ओर जहां विपक्षी दल इसे केजरीवाल की तानाशाही प्रवृत्ति का प्रमाण बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पार्टी के समर्थकों के बीच यह संदेश जा रहा है कि मिशन के बजाय अब पार्टी में व्यक्तिवाद हावी हो चुका है। यदि राघव चड्ढा जैसे कद्दावर और युवा नेता वास्तव में पार्टी से अलग होते हैं, तो यह न केवल दिल्ली बल्कि पंजाब और आगामी विधानसभा चुनावों में आप की रणनीतिक ताकत को कमजोर करेगा। भारतीय राजनीति के इस आधुनिक प्रयोग का भविष्य अब इस बात पर निर्भर है कि अरविंद केजरीवाल अपने पुराने साथियों को सहेजने और नए संकटों से निपटने के लिए किस प्रकार का संतुलन साधते हैं।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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