मर्चेंट शिपिंग एक्ट के तहत भारतीय ध्वज वाले जहाजों को मिलने वाली संप्रभु सुरक्षा और आर्थिक लाभों की विस्तृत जानकारी।

पश्चिम एशिया और विशेषकर मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा को लेकर एक गंभीर विमर्श को जन्म दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक मार्गों पर जहाजों के खिलाफ बढ़ते हमलों ने दुनिया का ध्यान एक ऐसे तकनीकी पहलू की ओर खींचा है जिसे अक्सर आम लोग अनदेखा कर देते हैं—वह है जहाज पर लहराने वाला 'झंडा'। किसी भी कमर्शियल जहाज के लिए उसकी 'फ्लैगिंग' केवल एक पहचान नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में उसकी सुरक्षा, नियमन और संप्रभुता का कानूनी दस्तावेज होती है।

समुद्री कानूनों के परिप्रेक्ष्य में 'फ्लैगिंग' का अर्थ उस देश से है जहाँ वह जहाज पंजीकृत (Registered) है। जब कोई जहाज किसी विशिष्ट देश के झंडे के नीचे पंजीकृत होता है, तो वह उस राष्ट्र के समुद्री नियमों और कानूनों के दायरे में आ जाता है। भारत के संदर्भ में, जो भी वाणिज्यिक जहाज डायरेक्टरेट जनरल ऑफ शिपिंग (DGS) में पंजीकृत होते हैं, उन्हें भारतीय राष्ट्रीय ध्वज फहराने का अधिकार प्राप्त होता है। ये जहाज 'मर्चेंट शिपिंग एक्ट' द्वारा संचालित होते हैं, जिसका अर्थ है कि खुले समुद्र में भी ये जहाज भारत की एक संप्रभु इकाई के रूप में माने जाते हैं। भारत में फ्लैगिंग के लिए अनिवार्य शर्त यह है कि जहाज की मालिक कंपनी का भारत में ही पंजीकृत होना आवश्यक है।

हाल ही में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव के दौरान भारतीय फ्लैग वाले जहाजों की अहमियत स्पष्ट रूप से दिखाई दी। जब होर्मुज जलडमरूमध्य के पश्चिम में दर्जनों भारतीय जहाज फंसे हुए थे, तब भारतीय नौसेना और कूटनीतिक तंत्र ने उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए त्वरित कार्रवाई की। विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय झंडे वाले जहाजों पर सीधे हमलों की अनुपस्थिति का मुख्य कारण भारत का संतुलित अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण और उसकी मजबूत समुद्री उपस्थिति है। जबकि कई अन्य देशों के जहाज, जो अक्सर पनामा या सेंट किट्स जैसे देशों से 'फ्लैग ऑफ कन्वीनियंस' (FoC) प्राप्त करते हैं, सुरक्षा के मोर्चे पर उतने प्रभावी नहीं रह पाते। भारत जैसे देश में फ्लैगिंग करवाने पर नियमों का अनुपालन अधिक कठोर होता है, लेकिन इसके बदले में जहाज को भारतीय नौसेना का सुरक्षा कवच और कूटनीतिक समर्थन प्राप्त होता है।

आर्थिक दृष्टि से भी भारतीय फ्लैग वाले जहाजों को कई लाभ प्राप्त होते हैं। भारत के बंदरगाहों पर आने वाले इन जहाजों को बंदरगाह शुल्क और करों में विशेष छूट दी जाती है। इसके अतिरिक्त, सरकारी माल ढुलाई और सार्वजनिक क्षेत्र के चार्टरिंग अनुबंधों में इन जहाजों को प्राथमिकता दी जाती है, जो इन्हें वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूती प्रदान करती है। हालांकि, यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी जहाज पर भारतीय झंडा होने का अर्थ यह नहीं है कि सरकार उसके टैरिफ या गंतव्य को नियंत्रित करती है; सरकार केवल उन पर नागरिक, आपराधिक और नियामक नियमों को लागू करती है ताकि सुरक्षा और पर्यावरणीय मानकों का उल्लंघन न हो।

भविष्य की ओर देखें तो भारत अपनी समुद्री शक्ति को अभूतपूर्व स्तर पर ले जाने की तैयारी कर रहा है। 'मैरीटाइम अमृत काल विजन 2047' के तहत सरकार का लक्ष्य भारतीय फ्लैग वाले जहाजों के बेड़े की वैश्विक हिस्सेदारी को वर्तमान के लगभग 7 प्रतिशत से बढ़ाकर 30-40 प्रतिशत तक ले जाना है। मार्च 2026 तक भारतीय बेड़े का ग्रॉस टनेज (GT) 1.42 करोड़ तक पहुंच चुका है और वित्त वर्ष 2025-26 में इसमें 15 लाख GT के 92 नए जहाजों के जुड़ने की संभावना है। यह विकास न केवल भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता को दर्शात है, बल्कि वैश्विक समुद्री सुरक्षा में एक जिम्मेदार और शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में भारत की उभरती छवि को भी पुख्ता करता है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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