अमेरिका से रियायत और ईरान से गारंटी: चाबहार के चक्रव्यूह को भेदने के लिए भारत की 'टू-वे' डिप्लोमेसी।
अमेरिका की प्रतिबंधों में छूट की मियाद खत्म होने से पहले भारत ने तैयार किया 'प्लान-बी', ईरान की स्थानीय कंपनी के साथ लीगल गारंटी पर चर्चा।

चाबहार पोर्ट पर भारत का कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक: अमेरिका और ईरान के साथ समानांतर बातचीत जारी
पश्चिम एशिया के धधकते रेगिस्तान में जहाँ एक ओर मिसाइलें और प्रतिबंधों की धमकियाँ हवा में तैर रही हैं, वहीं दूसरी ओर भारत एक ऐसी कूटनीतिक बिसात बिछा रहा है जिसने दुनिया के बड़े रणनीतिकारों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। भारत इस समय एक अत्यंत जटिल लेकिन संतुलित मिशन पर है, जहाँ वह एक ही समय में एक-दूसरे के धुर विरोधी देशों—अमेरिका और ईरान—के साथ चाबहार बंदरगाह के भविष्य को लेकर गहन चर्चा कर रहा है। यह केवल एक व्यापारिक सौदा नहीं, बल्कि भारत के राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखने का एक बड़ा दांव है, जिसे कूटनीति की भाषा में 'मास्टरस्ट्रोक' कहा जा रहा है।
भारत की इस सक्रियता के पीछे की मुख्य चिंता वह डेडलाइन है जो इसी महीने समाप्त होने वाली है। दरअसल, अमेरिका ने ईरान पर लगे कड़े आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद भारत को चाबहार बंदरगाह के संचालन और विकास के लिए विशेष छूट दे रखी है। यह छूट भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुँच प्रदान करती है, जो पाकिस्तान को रणनीतिक रूप से दरकिनार करने के लिए अनिवार्य है। हालांकि, ईरान-इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने इस बात की आशंका बढ़ा दी है कि वाशिंगटन इस मियाद को आगे बढ़ाएगा या नहीं। इसी संकट को भांपते हुए नई दिल्ली ने अपनी 'डबल-ट्रैक' कूटनीति को गति दे दी है।
जानकार सूत्रों के अनुसार, भारत सरकार वाशिंगटन के साथ निरंतर संपर्क में है ताकि इस प्रतिबंध छूट (Sanctions Waiver) को कम से कम अगले छह महीनों के लिए और बढ़ाया जा सके। इससे पहले अक्टूबर 2025 में भी भारत छह महीने की विस्तार अवधि प्राप्त करने में सफल रहा था। लेकिन इस बार चुनौती दोहरी है; एक तरफ युद्ध का साया है और दूसरी तरफ अमेरिका के भीतर बदलता राजनीतिक मिजाज। यही कारण है कि भारत ने केवल अमेरिका के भरोसे रहने के बजाय ईरान के साथ एक 'प्लान-बी' पर भी काम शुरू कर दिया है।
ईरान के साथ हो रही इस गुप्त लेकिन महत्वपूर्ण बातचीत का मुख्य केंद्र एक 'लोकल कंपनी' और 'लीगल गारंटी' है। इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL), जिसने साल 2024 में ईरान के साथ 10 साल के प्रबंधन समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, अब एक कानूनी सुरक्षा कवच तैयार कर रही है। योजना यह है कि यदि अमेरिका प्रतिबंधों में विस्तार नहीं देता है, तो बंदरगाह के प्रबंधन का अधिकार अस्थायी रूप से एक स्थानीय ईरानी फर्म को सौंप दिया जाएगा। इस कानूनी समझौते में यह स्पष्ट प्रावधान होगा कि जैसे ही प्रतिबंधों की स्थिति सामान्य होगी या भारत को पुनः छूट प्राप्त होगी, प्रबंधन का नियंत्रण वापस भारत को हस्तांतरित कर दिया जाएगा।
चाबहार भारत के लिए सामरिक रूप से स्वर्ण द्वार (Golden Gate) की तरह है। पिछले महीने विदेश मामलों की संसदीय समिति ने भी सरकार के इन बहुपक्षीय कूटनीतिक प्रयासों की सराहना की थी। समिति ने रेखांकित किया कि देशहित की सुरक्षा के लिए सभी संबंधित पक्षों—चाहे वे आपस में युद्धरत ही क्यों न हों—के साथ मेज पर बैठना ही एक परिपक्व वैश्विक शक्ति की पहचान है। 2034 तक के दीर्घकालिक विजन के साथ, भारत का निवेश यहाँ न केवल बुनियादी ढांचे में है, बल्कि उस क्षेत्रीय प्रभाव में भी है जो भारत को यूरेशिया के केंद्र तक ले जाता है।
अंततः, चाबहार पर भारत की यह रणनीति स्पष्ट करती है कि नई दिल्ली अब अपनी विदेश नीति की शर्तों पर चलता है। जहाँ विश्व के कई देश किसी एक गुट का हिस्सा बनने के दबाव में होते हैं, वहीं भारत ने यह साबित किया है कि वह युद्ध के दौरान भी अपने सामरिक हितों के लिए दोनों पक्षों के साथ समानांतर सेतु बना सकता है। आने वाले कुछ दिन न केवल चाबहार के भविष्य के लिए, बल्कि भारत की इस संतुलित कूटनीति की सफलता के लिए भी निर्णायक साबित होंगे।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
