हसीना युग के बाद 'हैंडशेक' की तैयारी: क्या यूनुस के असहज दौर को पीछे छोड़ भारत-बांग्लादेश रचेंगे नया इतिहास?
शेख हसीना के मुद्दे और शुरुआती कड़वाहट के बाद, नई दिल्ली और ढाका अब व्यावहारिक कूटनीति के जरिए द्विपक्षीय रिश्तों को नए सिरे से संवारने में जुटे हैं।

दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ दिखाई दे रहा है, जहाँ भारत और बांग्लादेश के बीच बीते कुछ महीनों से जमी बर्फ पिघलती नजर आ रही है। ढाका में सत्ता परिवर्तन और उसके बाद उपजी कूटनीतिक कड़वाहट के बाद, अब नई दिल्ली और ढाका दोनों ही परिपक्वता दिखाते हुए एक नए अध्याय की शुरुआत कर रहे हैं। हालिया कूटनीतिक कार्यक्रमों में दिखी अधिकारियों की सहज 'बॉडी लैंग्वेज' और संवाद के बदलते सुर इस बात की तस्दीक कर रहे हैं कि दोनों देश यूनुस प्रशासन के शुरुआती तनावपूर्ण दौर को पीछे छोड़ आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं।
रिश्तों में आए इस बदलाव का सबसे बड़ा प्रतिबिंब हाल ही में बांग्लादेश के नेशनल डे (राष्ट्रीय दिवस) के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में देखने को मिला। इस दौरान बांग्लादेश के राजदूत रियाज हमीदुल्लाह, भारत के विदेश राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह और विदेश सचिव विक्रम मिस्री के बीच जो सहजता और तालमेल दिखा, उसने विश्लेषकों को हैरान कर दिया। कुछ महीनों पहले तक, जब ढाका और दिल्ली के बीच बयानों के तीर चल रहे थे, ऐसी किसी सौहार्दपूर्ण तस्वीर की कल्पना करना भी कठिन था। इस कार्यक्रम में न केवल 'पुचका डिप्लोमेसी' का रंग दिखा, बल्कि राजदूत के भाषण में प्रसिद्ध गायक जुबीन गर्ग का जिक्र होना सांस्कृतिक सेतु बनाने की एक सोची-समझी कोशिश मानी जा रही है।
अगस्त 2024 में शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद से दोनों देशों के बीच कूटनीतिक असहजता अपने चरम पर थी। भारत में शेख हसीना की मौजूदगी को यूनुस प्रशासन ने बार-बार द्विपक्षीय रिश्तों के लिए एक बाधा की तरह पेश किया। ढाका की ओर से लगातार प्रत्यर्पण की मांग उठाई गई, जिसने रिश्तों को 'डेंजर जोन' में धकेल दिया था। इसके साथ ही, मोहम्मद यूनुस द्वारा अपने चीन दौरे के दौरान 'चिकन नेक' कॉरिडोर और पूर्वोत्तर भारत (सेवेन सिस्टर्स) को लेकर दिए गए विवादित बयानों ने नई दिल्ली को सतर्क कर दिया था। बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हुए हमले और भारतीय मिशन के बाहर हुई नारेबाजी ने स्थिति को और अधिक जटिल बना दिया था।
हालांकि, भारतीय विदेश नीति ने इस बार अपनी रणनीतिक गलतियों से सबक लेते हुए बेहद सधे हुए कदम उठाए हैं। भारत ने इस बार बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति के प्रति 'प्रतिक्रिया' देने के बजाय 'तैयारी' पर जोर दिया। जब बांग्लादेश में चुनावी हलचल शुरू हुई, तब भारत केवल एक पक्ष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जमात-ए-इस्लामी और बीएनपी जैसे विपक्षी दलों के साथ भी संपर्क के रास्ते खुले रखे। विदेश मंत्री एस. जयशंकर का खालिदा जिया के निधन पर शोक व्यक्त करने के लिए स्वयं ढाका जाना इस बात का संकेत था कि भारत अब बांग्लादेश की दो-ध्रुवीय राजनीति की हकीकत को स्वीकार कर चुका है और शेख हसीना के बिना भी रिश्तों को सुचारू रखने के लिए तैयार है।
वर्तमान में, बीएनपी के नेता तारिक रहमान का रुख भी कूटनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। परंपरागत रूप से पाकिस्तान समर्थक माने जाने वाले बीएनपी के नेता ने हाल ही में पाक फौज को लेकर जो सख्त टिप्पणी की है, वह उनकी बदली हुई 'प्रैक्टिकल' राजनीति को दर्शाती है। ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक हितों को देखते हुए बांग्लादेश यह भली-भांति जानता है कि भारत जैसे बड़े पड़ोसी को लंबे समय तक नजरअंदाज करना उसके अपने आर्थिक भविष्य के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
आगामी समय में बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान की भारत यात्रा इस दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकती है। इस दौरे में जल बंटवारे जैसे संवेदनशील मुद्दों से लेकर आर्थिक सहयोग तक पर विस्तृत चर्चा होने की उम्मीद है। भारत इस दौरे को केवल एक औपचारिक मुलाकात के रूप में नहीं, बल्कि रिश्तों में आए 'यू-टर्न' को मजबूती देने के अवसर के रूप में देख रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कूटनीति की यह नई पिच दोनों देशों के बीच के पुराने जख्मों को भर पाएगी और दक्षिण एशिया में स्थिरता का नया दौर शुरू होगा।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
