नई दिल्ली। लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर, संसद भवन में आज गूंज केवल नीतिगत बहसों की नहीं, बल्कि उन करोड़ों फेफड़ों की सिसकियों की थी जो हर दिन ज़हरीली हवा पीने को मजबूर हैं। देश के विभिन्न हिस्सों, विशेषकर उत्तर भारत और दिल्ली-एनसीआर में छाये दमघोंटू स्मॉग को लेकर आज संसद में तीखी और अभूतपूर्व चर्चा हुई। शीतकालीन सत्र के दौरान नियम 193 के तहत आयोजित इस विशेष बहस ने तब और अधिक सनसनीखेज मोड़ ले लिया जब विपक्षी नेताओं और सरकार के बीच आंकड़ों और जवाबदेही को लेकर सीधा टकराव देखने को मिला। प्रदूषण अब केवल एक मौसमी समस्या नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय आपातकाल के रूप में सदन के पटल पर उभरा है।

बहस की शुरुआत करते हुए लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सरकार को घेरते हुए कहा कि प्रदूषण एक ऐसा मुद्दा है जिस पर पूरी संसद को राजनीति से ऊपर उठकर एक सुर में बोलना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि हमें एक ऐसी 'मेथोडिकल एप्रोच' अपनानी होगी जो कम से कम नागरिकों की पीड़ा को कम कर सके। वहीं, संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सरकार का पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया कि केंद्र चर्चा से कभी पीछे नहीं हटा है और इस गंभीर संकट के समाधान के लिए एक ठोस ढांचा तैयार किया जा रहा है। सदन में चर्चा तब और विस्तृत हो गई जब कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा, डीएमके की कनिमोझी एनवीएम सोमू और भाजपा की बांसुरी स्वराज ने वायु गुणवत्ता में सुधार के लिए कड़े उपायों और फंड आवंटन की मांग की।

संसदीय कार्यवाही के दौरान आधिकारिक पक्ष रखते हुए केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने स्वीकार किया कि प्रदूषण एक "बड़ी समस्या" है और सरकार इसके समाधान के लिए जागरूकता और प्रवर्तन (Enforcement) दोनों स्तरों पर काम कर रही है। उन्होंने सदन को जानकारी दी कि 'नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम' (NCAP) के तहत 130 शहरों में सुधार की पहल की जा रही है। विशेष रूप से औद्योगिक उत्सर्जन को कम करने के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। दूसरी ओर, डॉ. कनिमोझी ने प्रदूषित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर एयर प्यूरीफायर लगाने के लिए विशेष बजट की मांग की, जिस पर सरकार ने शहरी स्थानीय निकायों को सशक्त बनाने की बात दोहराई। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) को लगाई गई फटकार और सीजेआई सूर्यकांत की टिप्पणियों का भी सदन में उल्लेख किया गया, जिसने बहस की गंभीरता को और बढ़ा दिया।

संसद की इस विशेष चर्चा का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि वायु प्रदूषण से निपटने के लिए राज्यों और केंद्र के बीच एक 'एयर्सहेड' आधारित समन्वित रणनीति बनाई जाएगी। पर्यावरण सचिव तन्मय कुमार और अन्य अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे 2026 के लिए एक 'एक्शन प्लान' तैयार करें जिसमें औद्योगिक इकाइयों पर रियल-टाइम निगरानी (OCEMS) और पराली प्रबंधन के लिए मशीनीकरण पर जोर दिया जाएगा। संसद में हुई यह चर्चा केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि उस कड़वे सच का स्वीकार है कि अगर आज कड़े फैसले नहीं लिए गए, तो कल की सुबह और भी धुंधली होगी। इस ऐतिहासिक बहस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब प्रदूषण नियंत्रण की नीतियां केवल कागजों तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि उन्हें जमीन पर उतारना सरकार की अनिवार्य जवाबदेही होगी।

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