जी7 सम्मेलन में पीएम मोदी के हिंदी नोट्स का उपयोग: सोशल मीडिया पर छिड़ी भाषाई बहस
फ्रांस के एवियान-ले-बां में आयोजित सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा हिंदी दस्तावेजों का उपयोग करने पर इंटरनेट यूजर्स के बीच वैचारिक मतभेद खुलकर सामने आए।

फ्रांस के एवियान-ले-बां में आयोजित जी7 शिखर सम्मेलन के एक सत्र के दौरान विचार-विमर्श करते विभिन्न वैश्विक राजनेता।
PM Modi Hindi Speech G7 : अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के सबसे बड़े मंच जी7 शिखर सम्मेलन से आई एक वीडियो क्लिप ने इस समय भारतीय सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में एक अभूतपूर्व वैचारिक युद्ध छेड़ दिया है। फ्रांस के सुरम्य शहर एवियान-ले-बां में 15 से 17 जून 2026 तक आयोजित इस हाई-प्रोफाइल वैश्विक सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा एक महत्वपूर्ण सत्र में हिंदी भाषा में लिखे नोट्स का उपयोग करने का मामला सामने आया है। इस सत्र में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सहित दुनिया के कई शीर्ष वैश्विक नेता मौजूद थे। वीडियो के सार्वजनिक होते ही इंटरनेट जगत स्पष्ट रूप से दो धड़ों में बंट गया है, जहां एक तरफ कूटनीतिक मंचों पर राष्ट्रीय भाषा के उपयोग को लेकर तीखे सवाल उठाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ इसे वैश्विक स्तर पर भारत के बढ़ते सांस्कृतिक गौरव और संप्रभुता के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है। इस मामूली घटनाक्रम ने देश के भीतर की गहरी राजनीतिक और भाषाई खाई को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर लाकर खड़ा कर दिया है।
इस पूरे विवाद की मुख्य कड़ियों और घटनाक्रम पर नजर डालें तो जी7 शिखर सम्मेलन के एक विशेष कार्यकारी सत्र के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अन्य राष्ट्राध्यक्षों के साथ गंभीर चर्चा कर रहे थे। इसी दौरान सामने आए वीडियो विजुअल्स में प्रधानमंत्री को अपनी बात रखने के लिए हिंदी में तैयार किए गए लिखित दस्तावेजों और नोट्स को पढ़ते हुए देखा गया। इस वीडियो के वायरल होते ही आलोचकों और विपक्षी खेमे ने इंटरनेट पर प्रधानमंत्री की अंग्रेजी भाषा की दक्षता को लेकर तीखे सवाल दागने शुरू कर दिए। देखते ही देखते इस भाषाई विवाद ने एक पुराना रूप अख्तियार कर लिया और आलोचकों द्वारा प्रधानमंत्री की दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए (BA) और गुजरात विश्वविद्यालय से एमए (MA) की शैक्षणिक डिग्रियों की वैधता को लेकर पुराने दावों और संदेहों को सोशल मीडिया पर फिर से हवा दी जाने लगी।
इस विवाद के कानूनी और विनियामक पहलुओं को देखें तो प्रधानमंत्री की शैक्षणिक योग्यता से जुड़े इस मामले पर देश की सर्वोच्च न्यायपालिका और विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा पहले ही अत्यंत स्पष्ट और ऐतिहासिक कानूनी फैसले दिए जा चुके हैं। पूर्व में अदालतों ने अपने विनियामक फैसलों में प्रधानमंत्री की शैक्षणिक डिग्रियों की वैधता को पूरी तरह बरकरार रखा है और सूचना के अधिकार (RTI) के तहत इन्हें किसी की 'व्यक्तिगत जानकारी' (Personal Information) मानते हुए इस संदर्भ में दायर की गई अनावश्यक याचिकाओं को खारिज कर दिया था। इसके बावजूद, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के एक सामान्य वीडियो को आधार बनाकर कानूनी रूप से सुलझ चुके इस विनियामक और व्यक्तिगत मुद्दे को दोबारा तूल दिया जाना भारत की राजनीति में चल रहे तीखे ध्रुवीकरण को स्पष्ट रूप से उजागर करता है।
Ha haha he is such a shame! A complete moron. https://t.co/ZRubiyJrDi
— Aditya Nigam (@AdityaN98576880) June 18, 2026
दूसरी तरफ, सोशल मीडिया पर इस हमले के खिलाफ प्रधानमंत्री के समर्थकों और राष्ट्रवादियों का एक विशाल जनसैलाब भी खुलकर सामने आ गया है। समर्थकों ने आलोचकों के इन दावों को पूरी तरह से औपनिवेशिक मानसिकता से प्रेरित और एक स्थापित 'दोगुना मानदंड' (डबल स्टैंडर्ड) करार दिया है। राष्ट्रवादी विचारकों ने वैश्विक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए तर्क दिया कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जैसे दुनिया के सबसे शक्तिशाली नेता भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हमेशा अपनी मातृभाषा का ही प्रयोग करते हैं और लिखित नोट्स की सहायता लेते हैं, लेकिन उन पर कभी कोई सवाल नहीं उठाया जाता। समर्थकों ने प्रधानमंत्री की लगातार तीन आम चुनावों में मिली ऐतिहासिक जीतों और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा उन्हें एक 'बेहद सख्त और कुशल वार्ताकार' (Tough Negotiator) बताए जाने वाले बयानों का हवाला देते हुए कहा कि कूटनीति में भाषा से ज्यादा देश का प्रभाव और नेता की राजनीतिक इच्छाशक्ति मायने रखती है।
जी7 शिखर सम्मेलन के इस सामान्य से दिखने वाले घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि आधुनिक दौर में डिजिटल मीडिया के उभार के कारण कूटनीतिक मंचों की हर छोटी हलचल भी घरेलू राजनीति का एक बड़ा हथियार बन जाती है। विदेशी धरती पर वैश्विक नेताओं के बीच भारत का प्रतिनिधित्व करने की इस कूटनीतिक प्रक्रिया को देश के भीतर भाषाई और शैक्षणिक विवादों के चश्मे से देखा जाना यह दर्शाता है कि आंतरिक राजनीतिक मतभेद किस कदर गहरे हो चुके हैं। इस विवाद का प्रभाव चाहे जो भी हो, लेकिन इसने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर राष्ट्रीय भाषा के गौरव और वैश्विक कूटनीति में देश के बढ़ते कद को लेकर एक गंभीर और दीर्घकालिक विमर्श की शुरुआत अवश्य कर दी है, जिसकी गूंज आने वाले समय में भी भारतीय राजनीति में सुनाई देती रहेगी।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
